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रिश्तेदारी के भरोसे मिला लाखों का कर्ज चेक बाउंस पर अदालत ने सुनाई सख्त सजा

काशीपुर। न्यायालय परिसर से सामने आए एक महत्वपूर्ण और चर्चित फैसले ने वित्तीय लेन-देन में विश्वास, पारिवारिक रिश्तों और कानूनी जवाबदेही को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एवं एन०आई० एक्ट के विशेष न्यायालय, काशीपुर ने चेक अनादर (चेक बाउंस) से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में आरोपी को दोषी ठहराते हुए न केवल छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई, बल्कि परिवादी को आर्थिक क्षति की भरपाई के लिए कुल 6,35,000 रुपये प्रतिकर एवं जुर्माना अदा करने का भी आदेश दिया। न्यायालय के इस निर्णय को कानूनी विशेषज्ञ वित्तीय अनुशासन और व्यापारिक विश्वसनीयता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संदेश मान रहे हैं। फैसले के बाद शहर के व्यापारिक वर्ग, अधिवक्ताओं तथा सामाजिक संगठनों के बीच इस मामले की व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि यह निर्णय उन लोगों के लिए स्पष्ट चेतावनी है जो आर्थिक लेन-देन में भरोसे का दुरुपयोग करते हुए ऐसे चेक जारी करते हैं जिनके खातों में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं होती। न्यायालय ने उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों, बैंक अभिलेखों, गवाहों के कथनों तथा दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद यह निर्णय पारित किया, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया कि आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में कानून किसी भी प्रकार की लापरवाही या छल को स्वीकार नहीं करता और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करता है।

घटनाक्रम की शुरुआत परिवादी राकेश कुमार सक्सेना पुत्र प्रेम प्रकाश सक्सेना द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से हुई। उन्होंने अपने अधिवक्ता सूरज कुमार के माध्यम से धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम (एन०आई० एक्ट) के तहत आपराधिक शिकायत प्रस्तुत करते हुए न्यायालय को बताया कि आरोपी अजय सक्सेना पुत्र बुलाकी प्रसाद सक्सेना, निवासी किलाबंधर रामपुर मोड़ के पास, सुल्तानपुर पट्टी, थाना बाजपुर, उनके निकट संबंधी हैं। शिकायत के अनुसार पारिवारिक विश्वास और रिश्तेदारी का हवाला देते हुए आरोपी ने फरवरी 2024 में स्वयं को गंभीर आर्थिक संकट में बताया तथा तत्काल वित्तीय सहायता की आवश्यकता व्यक्त की। परिवादी ने रिश्तों की मर्यादा और आपसी भरोसे को सर्वोपरि मानते हुए बिना किसी लिखित विवाद या संदेह के आरोपी की मदद करना उचित समझा। शिकायत में कहा गया कि आरोपी ने भरोसा दिलाया था कि निर्धारित समयावधि के भीतर संपूर्ण धनराशि लौटा दी जाएगी और किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। रिश्तेदारी और वर्षों के विश्वास को देखते हुए परिवादी ने आरोपी की बात पर भरोसा किया और उसे बड़ी धनराशि उधार उपलब्ध करा दी। बाद में यही विश्वास कानूनी विवाद का कारण बन गया और मामला न्यायालय तक पहुंच गया।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि आरोपी अजय सक्सेना ने कुल 6,15,000 रुपये ऋण के रूप में प्राप्त किए थे। धनराशि लेते समय उसने आश्वासन दिया था कि छह माह के भीतर संपूर्ण रकम बिना किसी विवाद के वापस कर देगा। समय बीतने के बाद जब परिवादी राकेश कुमार सक्सेना ने अपनी मेहनत की कमाई वापस मांगी तो शुरुआत में आरोपी ने विभिन्न कारण बताते हुए समय मांगा और बाद में लगातार टालमटोल का रवैया अपनाने लगा। शिकायत के अनुसार कई बार संपर्क और भुगतान की मांग के बाद आरोपी ने स्वयं को दायित्व निभाने वाला बताते हुए दो अलग-अलग बैंक खातों से जारी चेक परिवादी को सौंप दिए। आरोपी ने यह विश्वास भी दिलाया कि दोनों चेक बैंक में प्रस्तुत करते ही भुगतान हो जाएगा और पूरा विवाद समाप्त हो जाएगा। परिवादी ने रिश्तेदारी और आरोपी के आश्वासन पर एक बार फिर विश्वास जताया तथा चेकों को भुगतान प्राप्त करने के उद्देश्य से संबंधित बैंक शाखाओं में जमा करा दिया। लेकिन बैंक से जो परिणाम सामने आया, उसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया और परिवादी को कानूनी कार्रवाई के लिए विवश होना पड़ा।

बैंकिंग प्रक्रिया पूरी होने के दौरान परिवादी को उस समय बड़ा झटका लगा जब दोनों चेक भुगतान के बजाय अनादरित होकर वापस लौट आए। न्यायालय में प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार पहला चेक संख्या 000629 बैंक ऑफ बड़ौदा, सुल्तानपुर पट्टी शाखा का था, जिसकी राशि 6,00,000 रुपये थी, जबकि दूसरा चेक संख्या 104517 उधम सिंह नगर डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, बाजपुर शाखा का 15,000 रुपये का था। दोनों चेक बैंक द्वारा “FUNDS INSUFFICIENT” अर्थात खाते में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध न होने की टिप्पणी के साथ वापस कर दिए गए। परिवादी के लिए यह स्थिति अप्रत्याशित थी क्योंकि उन्हें विश्वास था कि आरोपी अपने वचन का पालन करेगा। चेक बाउंस होने के बाद उन्होंने आरोपी से संपर्क कर भुगतान का कारण पूछा तथा तत्काल धनराशि लौटाने का अनुरोध किया, लेकिन शिकायत के अनुसार आरोपी ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया और न ही भुगतान की दिशा में कोई ठोस पहल की। लगातार असहयोग और भुगतान से बचने के प्रयासों के बाद परिवादी ने यह महसूस किया कि अब विवाद का समाधान केवल विधिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।

कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए परिवादी ने अपने अधिवक्ता सूरज कुमार के माध्यम से आरोपी अजय सक्सेना को विधिक नोटिस भेजा। नोटिस में कानून के अनुरूप निर्धारित अवधि के भीतर संपूर्ण बकाया राशि अदा करने का अवसर प्रदान किया गया ताकि बिना मुकदमे के विवाद का समाधान हो सके। किंतु शिकायत के अनुसार आरोपी ने न तो नोटिस का कोई संतोषजनक उत्तर दिया और न ही भुगतान करने की कोई गंभीर पहल की। इसके बाद परिवादी ने धारा 138 एन०आई० एक्ट के अंतर्गत काशीपुर न्यायालय में औपचारिक आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की। न्यायालय ने प्रारंभिक परीक्षण के उपरांत मामले का संज्ञान लिया तथा आरोपी को समन जारी किए। समन प्राप्त होने के बाद आरोपी न्यायालय में उपस्थित हुआ, जमानत प्राप्त की और नियमित सुनवाई प्रारंभ हुई। इसके बाद अदालत में दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने पक्ष में दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, विधिक तर्क और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूरे घटनाक्रम का विस्तृत परीक्षण करते हुए प्रत्येक तथ्य का कानूनी दृष्टि से मूल्यांकन किया, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि निर्णय केवल प्रमाणों और कानून के आधार पर ही दिया जाए।

लंबी न्यायिक सुनवाई के दौरान परिवादी की ओर से अधिवक्ता सूरज कुमार ने विस्तृत एवं तथ्यपरक बहस प्रस्तुत की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष बैंक अभिलेख, चेक, अनादर मेमो, विधिक नोटिस तथा अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि आरोपी ने पहले आर्थिक सहायता प्राप्त की, उसके बाद भुगतान के लिए चेक जारी किए, लेकिन उन खातों में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं थी। बहस के दौरान यह भी कहा गया कि चेक जारी करना स्वयं देनदारी स्वीकार करने का प्रमाण है और चेक अनादरित होना एन०आई० एक्ट की दृष्टि से गंभीर कानूनी परिणाम उत्पन्न करता है। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों, दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया। सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य विश्वसनीय और पर्याप्त हैं तथा आरोपी के विरुद्ध आरोप सिद्ध होते हैं। इसी आधार पर विशेष न्यायालय ने आरोपी को धारा 138 एन०आई० एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई। साथ ही परिवादी को आर्थिक हानि एवं मुकदमे से उत्पन्न परिस्थितियों की भरपाई के लिए आरोपी को 6,35,000 रुपये प्रतिकर एवं जुर्माना अदा करने का निर्देश दिया। 24 जुलाई 2026 को इस निर्णय की जानकारी अधिवक्ता सूरज कुमार द्वारा जारी सूचना के माध्यम से सार्वजनिक की गई। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय चेक बाउंस से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जाएगा और वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता तथा कानूनी जिम्मेदारी को और अधिक मजबूत करेगा।

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