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पेपर लीक मंदिर में चोरी पीएम मोदी इस बढ़ते भ्रष्टाचार पर आखिर क्यों हैं खामोश

परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णयों, सार्वजनिक संस्थानों, सरकारी जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे लगातार सवालों ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है, जिससे सुशासन, नैतिक राजनीति और संस्थागत विश्वसनीयता पर गंभीर चिंतन तेज हो गया है।

भारत(सुनील कोठारी)। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास माना जाता है। जब नागरिकों को यह भरोसा होता है कि शासन व्यवस्था निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह है, तब लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों तक सीमित नहीं रहता बल्कि लोगों के जीवन का जीवंत हिस्सा बन जाता है। लेकिन जब समाज के अलग-अलग वर्गों में यह चर्चा तेज होने लगे कि व्यवस्था के भीतर पारदर्शिता कम हो रही है, जवाबदेही कमजोर पड़ रही है और सार्वजनिक संस्थानों पर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं, तब यह केवल एक राजनीतिक बहस नहीं रह जाती बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा गंभीर विषय बन जाती है। पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रणाली, सरकारी ठेकों, पर्यावरणीय मंजूरियों, सार्वजनिक परियोजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर जिस प्रकार की चर्चाएं और विवाद सामने आए हैं, उन्होंने आम नागरिक के मन में अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह जरूरी नहीं कि हर आरोप अंततः न्यायालय में सिद्ध हो, लेकिन जब लगातार एक जैसी खबरें सामने आने लगती हैं तो जनता के भीतर व्यवस्था को लेकर संदेह का वातावरण बनने लगता है। लोकतंत्र में यह स्थिति किसी भी सरकार, किसी भी राजनीतिक दल और किसी भी प्रशासनिक ढांचे के लिए गंभीर चेतावनी मानी जाती है, क्योंकि विश्वास टूटने की शुरुआत अक्सर वहीं से होती है जहां लोगों को यह महसूस होने लगता है कि उनकी आवाज पहले जैसी प्रभावी नहीं रही।

समाजशास्त्रियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने या देने तक सीमित विषय नहीं है। इसका दायरा उससे कहीं अधिक व्यापक है। यदि किसी निर्णय में पारदर्शिता नहीं है, यदि संसाधनों के वितरण में निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, यदि सरकारी पदों का दुरुपयोग होने की आशंका व्यक्त की जाती है अथवा यदि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समान अवसर का अभाव दिखाई देता है, तो यह भी शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रभाव डालता है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा होता है और यह भरोसा वर्षों में बनता है, जबकि कुछ घटनाएं इसे बहुत कम समय में कमजोर कर सकती हैं। यही कारण है कि आज भ्रष्टाचार का प्रश्न केवल आर्थिक नुकसान का विषय नहीं रह गया है बल्कि यह संस्थागत विश्वसनीयता, प्रशासनिक नैतिकता और राजनीतिक उत्तरदायित्व से जुड़ा व्यापक विमर्श बन चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब जनता के बीच यह धारणा बनने लगे कि नियम सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हो रहे हैं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति सम्मान भी धीरे-धीरे प्रभावित होने लगता है।

बीते वर्षों में शासन व्यवस्था में डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग ने निश्चित रूप से कई सकारात्मक बदलाव भी किए हैं। ऑनलाइन सेवाओं, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ई-टेंडरिंग और तकनीक आधारित निगरानी प्रणालियों ने अनेक क्षेत्रों में पारदर्शिता को बढ़ावा दिया है। आम नागरिक को कई सरकारी सेवाएं पहले की तुलना में अधिक सरलता से मिलने लगी हैं। इससे छोटे स्तर पर होने वाली कई अनियमितताओं में कमी आने का दावा भी किया गया है। लेकिन इसके समानांतर यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या केवल तकनीकी सुधार पर्याप्त हैं। यदि बड़े स्तर पर निर्णय प्रक्रिया, संसाधनों के आवंटन और नीतिगत फैसलों में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं तो तकनीकी सुधारों का प्रभाव सीमित हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि डिजिटल व्यवस्था के साथ-साथ संस्थागत जवाबदेही, स्वतंत्र जांच तंत्र और समयबद्ध कार्रवाई भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र में केवल व्यवस्था बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उस व्यवस्था पर जनता का विश्वास बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

राजनीतिक जीवन में नैतिकता का प्रश्न हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। प्रत्येक राजनीतिक दल सत्ता में आने से पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, पारदर्शी शासन और जवाबदेह प्रशासन का वादा करता है। जनता भी इन्हीं अपेक्षाओं के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है। लेकिन समय बीतने के साथ जब विभिन्न प्रकार के आरोप, विवाद और प्रशासनिक निर्णयों पर प्रश्न उठने लगते हैं तो जनता स्वाभाविक रूप से यह जानना चाहती है कि घोषित सिद्धांतों और वास्तविक कार्यप्रणाली के बीच कितना सामंजस्य है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि नागरिक सरकार से सवाल पूछ सकते हैं और सरकार उन सवालों का उत्तर देने के लिए बाध्य होती है। यही जवाबदेही लोकतांत्रिक प्रणाली को अन्य व्यवस्थाओं से अलग बनाती है। यदि यह संवाद कमजोर पड़ने लगे तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी प्रभावित होने लगती है। इसलिए किसी भी सरकार के लिए आवश्यक है कि वह केवल विकास कार्यों का दावा ही न करे बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति भी उतनी ही स्पष्ट प्रतिबद्धता दिखाए।

आज यह भी देखा जा रहा है कि भ्रष्टाचार को लेकर जनता की सोच पहले की तुलना में बदल चुकी है। पहले सामान्य नागरिक का ध्यान मुख्यतः दैनिक जीवन से जुड़े छोटे-छोटे अनुभवों पर केंद्रित रहता था, लेकिन अब सूचना के व्यापक प्रसार और डिजिटल माध्यमों के कारण लोग बड़े नीतिगत निर्णयों, सार्वजनिक परियोजनाओं और आर्थिक नीतियों पर भी नजर रखने लगे हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल पत्रकारिता और सूचना तक आसान पहुंच ने नागरिकों को अधिक जागरूक बनाया है। अब लोग केवल यह नहीं देखते कि उनके व्यक्तिगत कार्य समय पर हो रहे हैं या नहीं, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि सार्वजनिक धन का उपयोग किस प्रकार हो रहा है, सरकारी निर्णय किन आधारों पर लिए जा रहे हैं और सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली कितनी पारदर्शी है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत भी माना जा सकता है क्योंकि जागरूक नागरिक ही बेहतर शासन व्यवस्था की मांग करते हैं।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जांच एजेंसियां, न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाएं और स्वतंत्र मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी भी मामले में निष्कर्ष तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। केवल आरोप लग जाना किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी सिद्ध नहीं करता। यही कारण है कि कानून के शासन को लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता माना जाता है। लेकिन दूसरी ओर यदि किसी मामले में लंबे समय तक स्पष्टता नहीं आती, जांच में विलंब होता है या जवाबदेही को लेकर अस्पष्टता बनी रहती है तो जनता के मन में संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसलिए समयबद्ध और निष्पक्ष जांच भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

देश के आर्थिक विकास, निवेश और उद्योग जगत के लिए भी पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। निवेशक हमेशा ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहां नियम स्पष्ट हों, प्रतिस्पर्धा निष्पक्ष हो और सभी को समान अवसर मिले। यदि कारोबारी माहौल को लेकर लगातार विवाद उत्पन्न होते हैं या नीतिगत निर्णयों पर प्रश्न उठते हैं तो उसका प्रभाव निवेश के वातावरण पर भी पड़ सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत अर्थव्यवस्था केवल पूंजी निवेश से नहीं बनती बल्कि विश्वास, स्थिरता और पारदर्शिता पर भी आधारित होती है। यही कारण है कि दुनिया के सफल लोकतांत्रिक देशों में संस्थागत मजबूती और जवाबदेही को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि उसमें आत्मसुधार की क्षमता होती है। यदि किसी व्यवस्था में कमियां दिखाई देती हैं तो उन्हें दूर करने के लिए संवैधानिक संस्थाएं, न्यायपालिका, संसद, मीडिया और जागरूक नागरिक सभी अपनी-अपनी भूमिका निभा सकते हैं। यही लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति भी है। जनता की अपेक्षा केवल इतनी होती है कि शासन निष्पक्ष दिखाई भी दे और निष्पक्ष तरीके से कार्य भी करे। जब निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी होगी, जांच निष्पक्ष होगी, दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई होगी और ईमानदार अधिकारियों तथा संस्थाओं को संरक्षण मिलेगा, तभी लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास और मजबूत होगा।

वर्तमान समय में यह स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं रह गया है। यह शासन की गुणवत्ता, संस्थाओं की विश्वसनीयता और नागरिकों के विश्वास से जुड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन चुका है। आने वाले वर्षों में किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा केवल विकास योजनाओं की संख्या नहीं होगी, बल्कि यह भी होगी कि वह पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन के मानकों पर कितना खरा उतरती है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय हमेशा जनता के हाथ में होता है और जनता उसी व्यवस्था पर सबसे अधिक भरोसा करती है जो निष्पक्षता, ईमानदारी और जवाबदेही को केवल भाषणों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी सिद्ध करती है। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है और यही किसी भी राष्ट्र की स्थायी शक्ति भी।

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