केदारनाथ। हिमालय की गोद में स्थित बाबा के पावन धाम से एक ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक भूचाल सामने आया है जिसने पूरे उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। साल 2025 में केदारनाथ मंदिर समिति द्वारा वीआईपी मेहमानों की आवभगत, उनके आलीशान रहने और खान-पान की व्यवस्था पर श्रद्धालुओं के चढ़ावे से लाखों रुपये फूंकने के गंभीर आरोप लगे थे। चौतरफा दबाव के बाद बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने इस पूरे मामले की लीपापोती करने या सच सामने लाने के लिए आनन-फानन में एक आंतरिक जांच समिति का गठन कर दिया था। नियम और तय शर्तों के अनुसार इस संवेदनशील जांच की अंतिम रिपोर्ट महज बीस दिनों के भीतर जनता और बोर्ड के सामने आ जानी चाहिए थी, लेकिन कई महीनों के लंबे इंतजार और रहस्यमयी खामोशी के बाद जब यह दस्तावेज छनकर बाहर आया तो इसने पूरी व्यवस्था पर ही गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। इस बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट के एक-एक पन्ने और उस पर लिखी गई इबारत का गहराई से बारीकी से अध्ययन करने पर साफ तौर पर यह आभास होता है कि यह पूरी कवायद सच को उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि संगठन के भीतर किसी खास रसूखदार को बचाने और कुछ चुनिंदा अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर फंसाने के इरादे से तैयार की गई है।
इस सरकारी दस्तावेज को पहली नजर में देखने से ही यह साफ तौर पर प्रतीत होता है कि जिन लोगों ने इस तथाकथित निष्पक्ष जांच को अंजाम दिया है, वास्तव में अब उनके खुद के आचरण और मंशा की एक उच्च स्तरीय जांच की जानी बेहद जरूरी हो गई है। यह विवादित रिपोर्ट प्रथम दृष्टया इस चौंकाने वाले और एकतरफा निष्कर्ष पर पहुंची है कि केदारनाथ धाम में वीआईपी कल्चर के नाम पर भारी वित्तीय अनियमितता और गबन हुआ है, और जो भी लाखों रुपये का भुगतान बीकेटीसी के खजाने से किया गया, उसकी सक्षम प्राधिकारी से कोई पूर्व अनुमति या प्रशासनिक स्वीकृति नहीं ली गई थी। इस कथित वित्तीय गड़बड़ी का ठीकरा फोड़ते हुए जांच दल ने तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), तत्कालीन मुख्य प्रभारी अधिकारी और तत्कालीन व्यवस्थापक को सीधे तौर पर मुख्य दोषी करार दे दिया है। हालांकि, रिपोर्ट के भीतर पेश किया गया यह तथ्य कानूनी और व्यावहारिक धरातल पर बेहद कमजोर, खोखला और पूरी तरह से भ्रामक नजर आता है, जो न केवल प्रशासनिक नियमों की अनदेखी करता है बल्कि केदारनाथ की स्थानीय विधायक आशा नौटियाल और भारतीय जनता पार्टी की तेजतर्रार युवा नेत्री नेहा जोशी के पूर्व में दिए गए सार्वजनिक बयानों को भी पूरी तरह से झूठा और मनगढ़ंत साबित कर देता है।
दस्तावेजी सबूतों के साथ अगर इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण किया जाए तो यह रिपोर्ट खुद इस बात पर पक्की मुहर लगाती है कि वीआईपी मेहमानों की सुख-सुविधाओं पर हुआ तमाम तामझाम वाला खर्च किसी निजी जेब से नहीं बल्कि सीधे तौर पर मंदिर समिति के सरकारी खाते से किया गया था। जांच रिपोर्ट के भीतर इस बात का स्पष्ट और साफ अक्षरों में उल्लेख किया गया है कि पिछले बीते वर्षों की स्थापित परंपरा के समान ही इस साल भी आने वाले विशिष्ट महानुभावों के स्वागत-सत्कार के लिए बकायदा बजट की अग्रिम व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी। यानी बीकेटीसी का यह सरकारी कागज चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि नेताओं और रसूखदारों को जो शाही सुविधाएं दी गईं, उनका पूरा वित्तीय भार मंदिर समिति ने खुद वहन किया था, जिससे अब यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या ये दोनों प्रमुख महिला भाजपा नेता जनता के सामने बोले गए अपने सफेद झूठ के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगी। इस रिपोर्ट के भीतर जो दूसरा सबसे बड़ा तकनीकी और प्रशासनिक तथ्य बुना गया है, वह यह है कि इस भारी-भरकम खर्च की कोई औपचारिक वित्तीय स्वीकृति नहीं ली गई थी, जिसके जरिए यह दिखाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है कि तत्कालीन अधिकारियों ने मनमाने ढंग से समिति के बोर्ड या अध्यक्ष को अंधेरे में रखकर यह सारा पैसा उड़ाया।

इस पूरे प्रशासनिक विवाद का सबसे महत्वपूर्ण और कानूनी पहलू यह है कि वर्ष 2025 में 2 मई को केदारनाथ धाम के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले गए थे, और यह तमाम वीआईपी व्यवस्थाएं इसी कपाट खुलने के समय और उससे ठीक पहले की गई थीं। उस विशिष्ट समय अवधि के दौरान बीकेटीसी के अध्यक्ष या उनके बोर्ड से किसी भी प्रकार की प्रशासनिक अनुमति अथवा वित्तीय स्वीकृति लेने का व्यावहारिक रूप से कोई सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि उस समय मंदिर समिति के नए बोर्ड का कानूनी तौर पर गठन ही नहीं हुआ था। वास्तविकता यह है कि उस दौर में मंदिर समिति में न तो कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष तैनात था और न ही कोई बोर्ड अस्तित्व में था, क्योंकि हेमंत द्विवेदी को अध्यक्ष पद पर नियुक्त करने की आधिकारिक सरकारी अधिसूचना ही इसके बाद 4 मई को जारी की गई थी और उन्होंने स्वयं 6 मई को देहरादून में कार्यभार ग्रहण किया था। ऐसे में बोर्ड से मंजूरी न मिलने की आड़ में अधिकारियों को दोषी ठहराना हास्यास्पद है, क्योंकि बोर्ड बनने के बाद 9 जुलाई को आयोजित हुई आधिकारिक बैठक में इन सभी आवश्यक खर्चों को सर्वसम्मति से पारित और स्वीकृत करवा लिया गया था।
इतना ही नहीं, प्रशासनिक बारीकियों को खंगालने पर यह भी पता चलता है कि मई के शुरुआती सप्ताह में अध्यक्ष का पद खाली रहने के कारण पैदा हुए संकट को देखते हुए, उत्तराखंड शासन से कपाट उद्घाटन के पावन अवसर पर होने वाले तमाम अनिवार्य और आवश्यक व्ययों की विधिवत प्रशासनिक स्वीकृति 8 मई 2025 को ही अग्रिम रूप से प्राप्त कर ली गई थी। इसके अतिरिक्त, साल 2012 का एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी शासनादेश (सरकारी आदेश) इस बात की स्पष्ट कानूनी अनुमति देता है कि जब तक नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक मंदिर समिति का मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ किसी भी बड़े नीतिगत फैसले को छोड़कर, सुचारू संचालन के लिए सभी आवश्यक वित्तीय और प्रशासनिक निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और अधिकृत है। यह तमाम पुख्ता और अकाट्य सरकारी नियम-कायदे साफ तौर पर रेखांकित करते हैं कि इस जांच रिपोर्ट में अधिकारियों के खिलाफ लगाया गया एकमात्र और मुख्य आरोप कानून एवं नियमों की कसौटी के सामने कहीं भी टिक नहीं पाता है और इसे केवल दबाव में बनाया गया प्रतीत होता है।
वर्तमान में जो जांच रिपोर्ट सामने आकर गलियारों में घूम रही है, उसे देखकर निष्पक्ष विश्लेषकों का मानना है कि जांचकर्ताओं ने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए जांच के कई बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील पक्षों को जानबूझकर और सोची-समझी रणनीति के तहत अछूता छोड़ दिया है। इस पूरी विस्तृत जांच प्रक्रिया के दौरान केदारनाथ क्षेत्र की मौजूदा विधायक आशा नौटियाल से एक बार भी आमने-सामने बैठकर कोई पूछताछ नहीं की गई और न ही उनका कोई आधिकारिक बयान दर्ज करने की जहमत उठाई गई। इसी तरह, भाजपा की राष्ट्रीय स्तर की युवा नेता नेहा जोशी के पूरे प्रकरण में उनके पक्ष को रखने के लिए महज एक औपचारिक पत्र का सरसरी हवाला तो दिया गया है, लेकिन उस पत्र के भीतर उन्होंने अपने बचाव में क्या-क्या ठोस तथ्य और दलीलें पेश की हैं, इसका पूरी रिपोर्ट में कहीं कोई जिक्र तक नहीं किया गया है। अलबत्ता, एक बात को यह सरकारी रिपोर्ट बहुत ही चालाकी से और प्रमुखता के साथ जरूर रेखांकित करती है कि इन भाजपा नेताओं ने अपने निजी प्रवास या भुगतान के पक्ष में किसी भी प्रकार का कोई वैध बिल अथवा रसीद जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं की है।

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा विरोधाभास तब खुलकर सामने आता है जब हम नेहा जोशी के उस पुराने दावे को याद करते हैं जिसमें उन्होंने सीना ठोककर कहा था कि केदारनाथ यात्रा के दौरान उन्होंने अपने रहने और खाने का पूरा भुगतान खुद अपनी जेब से किया था और वे वहां के प्रसिद्ध गायत्री भवन में ठहरी थीं। लेकिन इस जांच समिति ने अपनी रहस्यमयी कार्यप्रणाली के तहत गायत्री भवन के प्रबंधन का पक्ष जानने या उनके रिकॉर्ड खंगालने की कोई कोशिश ही नहीं की, जबकि इसी जांच रिपोर्ट के खातों से यह साबित होता है कि गायत्री भवन को मंदिर समिति की तरफ से बकायदा साठ हजार रुपये की भारी-भरकम राशि का गुप्त भुगतान किया गया है। एक और बेहद गंभीर और बुनियादी सवाल इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर यह भी खड़ा हो रहा है कि जिन तीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से कुसूरवार और दोषी बनाकर पेश किया गया है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाते हुए उन तीनों से भी उनका पक्ष जानने या स्पष्टीकरण लेने का कोई न्यूनतम प्रयास तक नहीं किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे मजेदार और हास्यास्पद बात यह है कि यह जांच रिपोर्ट खुद अपने ही पन्नों पर यह स्वीकार करती है कि यह पूरी जांच अभी अधूरी है और इसे आनन-फानन में किसी खास एजेंडे के तहत पेश कर दिया गया है। रिपोर्ट के अंत में साफ तौर पर लिखा गया है कि, “इसी प्रकार मंदिर समिति द्वारा अन्य अतिथियों हेतु होटलों एवं विश्राम गृहों में आरक्षित कमरों तथा उनके भुगतान के संबंध में भी भौतिक सत्यापन की कार्यवाही वर्तमान में प्रचलित है।” कुल मिलाकर यह सरकारी दस्तावेज खुद अपनी जुबान से यह कह रहा है कि अभी जांच का एक बहुत बड़ा हिस्सा परदे के पीछे है, जिससे यह साफ झलकता है कि यह अधकचरी रिपोर्ट केवल और केवल किसी रसूखदार को जानबूझकर क्लीन चिट देने और सीधे-सादे अधिकारियों को सूली पर चढ़ाने के लिए बुनी गई एक प्रशासनिक साजिश है।
इस पूरे केदारनाथ विवाद का सबसे संवेदनशील और करोड़ों सनातनी हिंदुओं की आस्था से जुड़ा सबसे बड़ा पहलू यह था कि क्या देश-विदेश से आने वाले आम भक्तों के खून-पसीने की कमाई और चढ़ावे के पैसे से सत्ताधारी दल के नेताओं की शाही सेवा-सुश्रूषा की जा रही है। यह बहुचर्चित रिपोर्ट इस मुख्य और बुनियादी सवाल के मामले में पूरी तरह से मौन साधे हुए है और कुछ भी ठोस बताने के बजाय गोलमोल बातें कर सत्ताधारी दल के नेताओं को बचाती हुई और उनके रसूख के आगे नतमस्तक होती हुई नजर आती है। हालांकि, तमाम लीपापोती के बावजूद एक कड़वा सच जो इस रिपोर्ट के पन्नों से पूरी तरह साफ और उजागर हो चुका है, वह यह है कि भाजपा नेताओं की आवभगत में मंदिर समिति के फंड का बेजा इस्तेमाल हुआ, जिससे अब यह बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है कि क्या केदारनाथ विधायक आशा नौटियाल और भाजपा नेता नेहा जोशी बाबा के दरबार और जनता के सामने अपने इस महाझूठ के लिए सार्वजनिक रूप से घुटने टेककर माफी मांगेंगी।





