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गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी की नाराजगी से धनगढ़ी पुल उद्घाटन विवाद पर प्रशासनिक महकमे में मचा हड़कंप

धनगढ़ी नाले पर बने राष्ट्रीय राजमार्ग पुल के उद्घाटन में सांसद अनिल बलूनी को आमंत्रण न मिलने से विवाद गहराया, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक तनाव को लेकर उत्तराखंड में जोरदार हलचल तेज हो गई है।

रामनगर। रामनगर और राजधानी देहरादून के राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमों तक इस समय एक बेहद चौंकाने वाला और तीखा विवाद पूरी तरह से गरमा गया है, जिसने शासन तंत्र की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रामनगर स्थित कुख्यात धनगढ़ी नाले पर नवनिर्मित राष्ट्रीय राजमार्ग पुल के भव्य उद्घाटन समारोह को लेकर गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी की जबरदस्त और तीखी नाराजगी खुलकर सतह पर आ गई है। सत्ता के बेहद विश्वसनीय और उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से जो बड़ी खबर छनकर बाहर आ रही है, उसके मुताबिक सांसद ने इस महत्वपूर्ण और बहुप्रतीक्षित उद्घाटन कार्यक्रम का निमंत्रण और सूचना समय पर न दिए जाने को लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर महेंद्र कुमार को आड़े हाथों लिया है और उनके प्रति अपनी बेहद कड़क और तीखी नाराजगी जाहिर की है। इस पूरे मामले ने देखते ही देखते एक बड़ा सियासी मोड़ ले लिया है, क्योंकि जिस पुल के निर्माण के लिए सांसद ने सालों तक एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, उसी के लोकार्पण उत्सव से उन्हें प्रशासनिक लापरवाही के चलते दूर रहना पड़ा, जिसने अब एक बड़े विवाद का रूप अख्तियार कर लिया है।

प्रशासनिक स्तर पर हुई इस इतनी बड़ी और अक्षम्य कोताही के पीछे की जो कड़वी हकीकत सामने आ रही है, वह वास्तव में किसी को भी हैरान करने के लिए काफी है क्योंकि जनभावनाओं से जुड़े इतने बड़े मंच पर जनप्रतिनिधि की इस तरह अनदेखी की गई है। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, गढ़वाल क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद अनिल बलूनी को इस बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पुल के उद्घाटन कार्यक्रम का आधिकारिक बुलावा समारोह शुरू होने से महज कुछ चंद घंटे पहले ही आनन-फानन में थमाया गया था। इतने कम समय में और ऐन वक्त पर सूचना मिलने के कारण अपनी पूर्व निर्धारित व्यस्तताओं और कड़े शेड्यूल की वजह से वह अपने ही व्यक्तिगत और अथक प्रयासों से धरातल पर उतरे इस अति-महत्वपूर्ण पुल के भव्य उद्घाटन समारोह में प्रत्यक्ष रूप से शिरकत नहीं कर सके। इस बेहद शर्मनाक और बड़ी प्रशासनिक चूक की खबर जैसे ही शासन के उच्च स्तर तक पहुंची, वैसे ही पूरे लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग के शीर्ष अधिकारियों के बीच हड़कंप और अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है, और सभी जिम्मेदार अधिकारी अब अपनी खाल बचाने के लिए बहाने तलाशने में जुट गए हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को अपने संसदीय क्षेत्र की जनता और एक जनप्रतिनिधि के तौर पर अपने विशेषाधिकारों का खुला अपमान मानते हुए सांसद अनिल बलूनी ने अब इस मामले में बेहद कड़ा और आक्रामक रुख अपनाने का पूरा मन बना लिया है। भीतर से आ रही बेहद पक्की और पुख्ता खबरों के अनुसार, सांसद इस पूरे लापरवाही के मामले को अत्यंत गंभीरता से ले रहे हैं और वे इस प्रशासनिक ढिलाई को कतई भी ठंडे बस्ते में डालने के मूड में नहीं दिखाई दे रहे हैं। चर्चाएं तो यहाँ तक बहुत तेज हैं कि वे इस घोर लापरवाही के लिए संसद की विशेषाधिकार समिति के माध्यम से संबंधित लापरवाह अधिकारियों को सीधे विशेषाधिकार हनन का कानूनी और कड़ा नोटिस भेजने पर भी बहुत ही गंभीरता के साथ विचार कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है, तो राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के उन तमाम अधिकारियों की मुश्किलें आने वाले दिनों में बेहद बढ़ने वाली हैं, जिन्होंने इतने बड़े और संवेदनशील मुद्दे को बेहद हल्के में लिया और एक सांसद के प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाने का काम किया।

यहाँ इस पूरे विवाद के बीच यह जानना बेहद जरूरी और दिलचस्प है कि रविवार के दिन सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रामनगर पहुंचकर इस बहुप्रतीक्षित धनगढ़ी नाले पर बने राष्ट्रीय राजमार्ग पुल का पूरे विधि-विधान और लाव-लश्कर के साथ औपचारिक उद्घाटन कर इसे जनता को समर्पित किया था। लेकिन परदे के पीछे की कहानी यह है कि यह वही ऐतिहासिक पुल है जिसकी पुरजोर और मजबूत मांग को लेकर सांसद अनिल बलूनी ने साल 2019 में खुद आगे बढ़कर देश के केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से एक विशेष और लंबी मुलाकात की थी और उनके समक्ष इस पुल की अनिवार्यता का पूरा खाका रखा था। उस दौर में धनगढ़ी नाले के उफान में चार बेकसूर लोगों के पानी के तेज बहाव में बह जाने की एक बेहद दर्दनाक, हृदयविदारक और खौफनाक घटना सामने आई थी, जिसने पूरी देवभूमि को हिलाकर रख दिया था। इसी भीषण हादसे के तुरंत बाद भावुक और उद्वेलित होकर बलूनी ने इस खूनी नाले पर एक मजबूत और स्थाई ऑलवेदर पुल निर्माण की मांग को केंद्र सरकार के सामने बेहद आक्रामकता से उठाया था, जिसके बाद ही इस पूरी बेहद जटिल पुल निर्माण की सरकारी और तकनीकी प्रक्रिया को हरी झंडी मिल सकी थी।

इतने लंबे संघर्ष, अनगिनत बैठकों और व्यक्तिगत प्रयासों के बाद बनकर तैयार हुए इस लाइफलाइन पुल के उद्घाटन कार्यक्रम की सूचना देने में हुई इस कथित और सुनियोजित देरी को लेकर अब पूरे उत्तराखंड के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म हो गया है और तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक पंडित इस बात को लेकर हैरान हैं कि आखिर इतने बड़े कद के सांसद को उनके ही ड्रीम प्रोजेक्ट के उद्घाटन से दूर रखने के पीछे राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग की क्या मंशा थी या फिर यह किसी बड़ी सोची-समझी साजिश का हिस्सा था। हालांकि, इस पूरे विवाद पर और सांसद की ओर से उठी तीखी नाराजगी के बाद भी, अभी तक राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के किसी भी छोटे या बड़े अधिकारी की ओर से कोई भी आधिकारिक सफाई, बयान या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे विभाग की चुप्पी और उनकी भूमिका पर शक का दायरा और ज्यादा गहरा होता जा रहा है।

इस पूरे मामले ने अब केवल रामनगर या देहरादून ही नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को छेड़ दिया है कि कैसे सरकारी बाबू और इंजीनियर जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज करने का दुस्साहस कर रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा कल किए गए इस उद्घाटन के बाद जहां जनता को इस खतरनाक नाले के डर से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई है और लोग राहत की सांस ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस उद्घाटन की पूरी प्रक्रिया के पीछे की इस कड़वाहट ने सरकार और संगठन के भीतर भी एक असहज स्थिति पैदा कर दी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या एक्जीक्यूटिव इंजीनियर महेंद्र कुमार और उनके अधीनस्थ अधिकारी इस इतनी बड़ी और अक्षम्य गलती के लिए सांसद अनिल बलूनी से लिखित में माफी मांगते हैं, या फिर यह मामला देश की संसद तक पहुंचकर उत्तराखंड के प्रशासनिक अमले के लिए एक बहुत बड़ी और सबक सिखाने वाली नजीर बनने जा रहा है।

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