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द्रोणा सागर की बदहाली उजागर करती प्रशासनिक लापरवाही, पर्यटन संकट और ऐतिहासिक धरोहर की अनदेखी

सदियों पुरानी आस्था और इतिहास से जुड़ा द्रोणा सागर आज गंदगी, सूखे जलाशय, सुरक्षा संकट और प्रशासनिक उदासीनता के बीच अपनी पहचान खोता जा रहा है, जिससे स्थानीय लोग गहरी निराशा और आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं।

काशीपुर। उत्तराखंड के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले स्थलों की दुर्दशा इन दिनों जागरूक नागरिकों के लिए गहरी चिंता का सबब बनी हुई है, जहां प्रशासनिक उदासीनता के चलते पर्यटन की असीम संभावनाएं दम तोड़ रही हैं। इसी कड़ी में काशीपुर के सुप्रसिद्ध और पौराणिक द्रोणा सागर (द्रौणा सागर) परिसर से एक बेहद चौंकाने वाली ज़मीनी हकीकत सामने आई है, जिसने स्थानीय प्रशासन के रख-रखाव के तमाम दावों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। पिछले करीब पंद्रह साल (15 साल) से लगातार इस परिसर में भ्रमण के लिए आने वाले पर्यटकों और प्रबुद्ध नागरिकों का दर्द अब सरेआम छलकने लगा है। यहाँ आने वाले लोगों का स्पष्ट कहना है कि इतने लंबे समय में इस ऐतिहासिक धरोहर के विकास या कायाकल्प में कोई भी ठोस परिवर्तन या सकारात्मक बदलाव दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया है। स्थिति जस की तस बनी हुई है और सुरक्षा के मोर्चे पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं, क्योंकि इस ऐतिहासिक किले और परिसर में उमड़ने वाली भीड़ के बीच कभी भी कोई बड़ी अनहोनी या अप्रिय घटना घटित हो सकती है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सोए हुए हैं।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य से जुड़े इस द्रोणा सागर की पहचान कभी इसके विशाल और स्वच्छ जलाशय के कारण एक भव्य किले के रूप में होती थी, लेकिन आज यह अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। स्थानीय निवासी पिछले दो-तीन साल से इस मुख्य ऐतिहासिक स्थल की उपेक्षा से बेहद आहत हैं और उनका कहना है कि अब यहाँ आने का मन तक नहीं करता। नियमित रूप से सुबह-शाम दोनों टाइम यहाँ भ्रमण के लिए आने वाली महिला पर्यटक ने परिसर की इस दुर्दशा के लिए किसी एक को नहीं, बल्कि सीधे तौर पर व्यवस्था और जनता दोनों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को कसूरवार ठहराया है। उनका मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाना है, तो खुद जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा और अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। हालाँकि, सरकार की तरफ से जो सतही व्यवस्थाएँ यहाँ की गई हैं, उन्हें लेकर आम जनता में गहरा असंतोष व्याप्त है, क्योंकि कागजी दावों के विपरीत धरातल पर बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव साफ नज़र आता है।

द्रोणा सागर का नाम सुनते ही मानस पटल पर एक ऐसे विशाल सागर या झील की कल्पना उभरती है जो लबालब पानी से भरी हो, लेकिन आज इस सरोवर में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। बुजुर्ग पर्यटकों का कहना है कि एक दौर था जब हमारे बच्चे-बच्चियों ने यहाँ बकायदा पानी से लबालब भरी झील देखी थी और उस ज़माने में इस तालाब के भीतर कछुए स्वच्छंद रूप से तैरते हुए दिखाई देते थे। लेकिन अब सालों बीत गए हैं और इस सूखे पड़े तालाब को देखकर यहाँ आने वाले हर एक सैलानी का दिल बैठ जाता है। स्थानीय लोगों का पुरज़ोर मानना है कि यदि इस विशाल तालाब में दोबारा से पानी भरने का पुख्ता इंतज़ाम किया जाए, तो न केवल पर्यावरण सुधरेगा बल्कि बच्चों और सैलानियों के लिए यह स्थल बेहद आकर्षक और मनोरंजक बन जाएगा। पानी के बिना इस तथाकथित सागर का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है, जो कि यहाँ के पूरे इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा झटका साबित हो रहा है।

इस ऐतिहासिक परिसर की सबसे बड़ी समस्या यहाँ फैली गंदगी और कचरे का अंबार है, जिसे देखकर कोई भी सभ्य नागरिक दंग रह जाएगा। बड़े तालाब की सफाई न होने के कारण चारों तरफ दुर्गंध का साम्राज्य कायम हो चुका है और यहाँ बैठने के लिए आने वाले चार लोग भी गंदगी के कारण बैठने में असमर्थ महसूस करते हैं। पर्यटकों का खुला आरोप है कि उच्च अधिकारियों और विभागों के हाथ में सरकार द्वारा विकास के लिए भारी-भरकम बजट और पैसा तो आता है, लेकिन वह पैसा कहाँ गायब हो जाता है, इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। तालाब के चारों तरफ चिप्स के पैकेट, खाली बोतलें और प्रतिबंधित प्लास्टिक का कचरा बिखरा पड़ा है। जागरूक नागरिकों का सुझाव है कि यहाँ बकायदा एक सख्त चौकीदार या सुरक्षाकर्मी को बैठाया जाना चाहिए, जो गंदगी फैलाने वाले किसी भी इंसान पर भारी जुर्माना लगाए, क्योंकि चंद लापरवाह लोगों की वजह से पूरी सफाई व्यवस्था का जनाज़ा निकल जाता है और नालियों में प्लास्टिक फंसने से पूरी सड़क पर गंदा पानी जमा हो जाता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था के इस बड़े केंद्र को स्थानीय लोगों ने ही अपनी नासमझी के कारण कूड़ेदान में तब्दील कर दिया है, क्योंकि पूजा-पाठ के बाद बची हुई विसर्जन सामग्री को सीधे इस परिसर में फेंक दिया जाता है। इस कृत्य को रोकने के लिए प्रशासन को कड़े नियम और बैरिकेडिंग की व्यवस्था करनी होगी, तभी इस ऐतिहासिक धरोहर को पूरी तरह प्रदूषित होने से बचाया जा सकेगा। हालांकि, धार्मिक स्थलों के सुंदरीकरण को लेकर हाल के दिनों में मंदिर, पेड़-पौधे लगाने और बैठने की थोड़ी-बहुत व्यवस्थाएँ शुरू तो की गई हैं, लेकिन वे नाकाफी हैं। पुराने दिनों को याद करते हुए लोग बताते हैं कि पहले तो यहाँ इतनी भी सुविधा नहीं थी, लेकिन आज के दौर में जब भारी संख्या में लोग यहाँ आते हैं, तो प्रशासनिक ढिलाई के कारण असामाजिक तत्वों का जमावड़ा भी यहाँ पैर पसारने लगा है, जिससे महिलाओं की सुरक्षा भगवान भरोसे हो गई है।

द्रोणा सागर परिसर में कभी गुंडागर्दी और मनचलों की भारी दहशत हुआ करती थी, जिसमें पुलिस की सख्ती के बाद कुछ कमी ज़रूर आई थी, लेकिन आज भी यहाँ का माहौल पूरी तरह से भयमुक्त नहीं कहा जा सकता। आज भी दिन के उजाले में बेखौफ घूम रहे लड़के-लड़कियों और मनचलों की वजह से यहाँ आने वाले सभ्य परिवारों और बच्चों को भारी असहजता का सामना करना पड़ता है। परिसर की सुरक्षा के नाम पर यहाँ बकायदा कागज़ों पर तो हज़ार कैमरे लगाने के बड़े-बड़े दावे ठोंके जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन कैमरों का कोई आउटपुट या नियंत्रण दिखाई नहीं देता, जिससे छेड़खानी की वारदातें बदस्तूर जारी हैं। प्रबुद्ध नागरिकों की सरकार से पुरज़ोर मांग है कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल की गरिमा बनाए रखने के लिए यहाँ पुलिस की एक स्थाई पिकेट या विशेष पुलिस ड्यूटी (पुलिस का भी यहां पर सबसे बड़ा ड्यूटी लगनी चाहिए) तैनात की जानी चाहिए, ताकि यहाँ आने वाले असामाजिक तत्वों पर नकेल कसी जा सके और आम जनता बिना किसी खौफ के इस ऐतिहासिक धरोहर का दीदार कर सके।

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