काशीपुर। काशीपुर में खेल और खिलाड़ियों के प्रोत्साहन को लेकर प्रशासनिक दावों की जमीनी हकीकत बयां करती एक बेहद चौंकाने वाली और खेल जगत में खलबली मचा देने वाली खबर सामने आई है। यहाँ की स्थानीय जूडो एकेडमी का संचालन करने वाली मुख्य कोच प्रीति सागर, जिन्हें खेल के प्रति उनके अटूट समर्पण और जज्बे के कारण काशीपुर की ‘पीटी उषा’ (पंट उषा) के नाम से भी पुकारा जाता है, ने खेल संसाधनों और स्थानीय स्टेडियम की दुर्दशा पर गहरे दर्द के साथ कई बड़े खुलासे किए हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी प्रतिभाओं को निखारने में जुटी इस महिला कोच ने बताया कि वे सीमित संसाधनों में बच्चों को जूडो और आत्मरक्षा यानी सेल्फ डिफेंस की कड़ाके की ट्रेनिंग दे रही हैं ताकि बेटियां और युवा हर चुनौती का डटकर मुकाबला कर सकें। उनके नाम की तुलना उड़नपरी पीटी उषा से किए जाने पर उन्होंने काशीपुर की खेल प्रतिभाओं को निखारने का अपना संकल्प दोहराया, लेकिन साथ ही सरकारी सिस्टम की उस बेरुखी को भी बेनकाब किया जिसके चलते आज काशीपुर का खेल जगत और युवा खिलाड़ी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसने को पूरी तरह से मजबूर हो गए हैं।
अकादमी में बच्चों की संख्या और उनके प्रशिक्षण के संघर्षों पर खुलकर बात करते हुए प्रीति सागर ने बताया कि एक समय उनके पास प्रशिक्षण लेने के लिए पैंतीस (35) से भी अधिक बच्चे नियमित रूप से आते थे, जिनमें से अधिकांश बच्चे बहुत दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों और गांवों से ताल्लुक रखते थे। दूर से आने वाले इन नन्हे और होनहार खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी समस्या रोजाना आने-जाने के भारी-भरकम किराए और परिवहन के साधनों की थी, जिसके चलते कई गरीब परिवारों के बच्चों के लिए यह खर्च उठा पाना नामुमकिन हो गया था। कोच प्रीति सागर ने बेहद भारी मन से बताया कि कुछ वित्तीय मजबूरियों और किराए की दिक्कतों के कारण उन्हें मजबूरन दूर से आने वाले बच्चों को मना करना पड़ा, क्योंकि स्वयं उनके लिए भी इन बच्चों के यात्रा खर्च का प्रबंधन करना बेहद कठिन साबित हो रहा था। वर्तमान समय में उनके पास काशीपुर के स्थानीय और नजदीकी इलाकों के छह बच्चे पूरी तरह प्रजेंट हैं जो नियमित रूप से मैट पर पसीना बहा रहे हैं, जबकि कॉलेज के चार अन्य बच्चों को मिलाकर लगभग दस बच्चों का दल इस समय एकेडमी से जुड़ा हुआ है जो छुट्टियों और充स्कूलों के खुलने-बंद होने के चक्र के बीच लगातार अपनी ट्रेनिंग पूरी करने में जुटा है।
काशीपुर की इस जुझारू महिला कोच का कार्यक्षेत्र केवल उनकी निजी एकेडमी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे क्षेत्र की सुरक्षा और बेटियों के स्वावलंबन के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रही हैं। प्रीति सागर ने बताया कि वे काशीपुर के कई प्रतिष्ठित स्कूलों, मवाड़ा क्षेत्र और मुख्य डाकखाना रोड जैसे विभिन्न संवेदनशील इलाकों में जाकर वहां की छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को सेल्फ डिफेंस के गुर सिखा रही हैं ताकि वे समाज में पूरी तरह सुरक्षित और आत्मनिर्भर महसूस कर सकें। जूडो की बारीकियों और दांव-पेचों के माध्यम से वे बच्चों के भीतर एक नया आत्मविश्वास फूंकने का प्रयास कर रही हैं, जिससे वे न केवल आत्मरक्षा में माहिर हो सकें बल्कि खेल के मैदान पर भी देश का नाम रोशन कर सकें। स्वयं उनके खेल करियर और उपलब्धियों की बात करें तो उन्होंने बताया कि वे राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं से पहले आयोजित होने वाले बेहद कठिन ट्रेनिंग कैंपों का हिस्सा रह चुकी हैं, जिसके बाद उदयपुर में आयोजित हुए एक बड़े और प्रतिष्ठित नेशनल ट्रायल के दौरान उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल (कांस्य पदक) हासिल किया था।

राष्ट्रीय फलक पर पदक जीतने के बावजूद वर्ष 2025 से लगातार काशीपुर में बच्चों को कोचिंग दे रही इस प्रतिभावान महिला ट्रेनर को स्थानीय प्रशासन और खेल विभाग से वह सहयोग नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं, जो कि सरकारी तंत्र पर एक बड़ा सवालिया निशान है। प्रीति सागर ने काशीपुर के स्पोर्ट्स स्टेडियम की कड़वी हकीकत को उजागर करते हुए बताया कि उन्होंने बच्चों के बेहतर भविष्य और अच्छी मैट सुविधाओं के लिए कई बार स्थानीय स्टेडियम में जगह पाने की पुरजोर कोशिश की और अधिकारियों के चक्कर काटे। मगर प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि पिछले तीन साल से लगातार अथक प्रयास करने के बाद भी उन्हें स्टेडियम के भीतर प्रशिक्षण देने के लिए एक छोटा सा स्थान तक आवंटित नहीं हो सका है, और हर बार जगह खाली न होने का बहाना बनाकर उनकी फाइल को दबा दिया जाता है। उन्होंने बेहदअफसोस जताते हुए कहा कि काशीपुर के स्पोर्ट्स स्टेडियम में खिलाड़ियों को निखारने के लिए किसी योग्य कोच (खच) की भी भारी आवश्यकता है, लेकिन इसके बावजूद विभाग किसी को नियुक्त करने या स्थानीय स्तर पर काम कर रहे प्रशिक्षकों को मौका देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है।
स्टेडियम की इस अंतहीन बेरुखी के बीच कोच प्रीति सागर ने अपने इस व्यक्तिगत और खुले मैदानी क्षेत्र को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया है, क्योंकि उनके अनुसार यहाँ का शांत और खुला माहौल बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बेहद शानदार है। उन्होंने बताया कि स्टेडियम के बंद कमरों की तुलना में यह खुली जगह उनके बच्चों को दौड़ने, जंप करने और वॉर्म-अप करने की असीमित आजादी देती है, जिससे बच्चों की सहनशक्ति और स्टेमिना में भारी इजाफा देखने को मिल रहा है। हालांकि, आधुनिक सुविधाओं और जूडो मैट की अनुपलब्धता के कारण वे आज भी अपने बच्चों को खुले मैदान की हरी घास पर ही जूडो की खतरनाक फॉलिंग और थ्रोइंग तकनीक का अभ्यास कराने को पूरी तरह मजबूर हैं। घास पर ट्रेनिंग करने की इस भीषण असुविधा और चोट लगने के भारी जोखिम के बावजूद बच्चों के हौसले आसमान छू रहे हैं, और इसी घास के मैदान से ट्रेनिंग पाकर इन नन्हे खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर ऐसी सफलताएं हासिल की हैं जिसने बड़े-बड़े खेल दिग्गजों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया है।
सीमित और अभावों भरे संसाधनों के बीच जीतोड़ मेहनत करने वाले इन बच्चों ने विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में पदकों की ऐसी झड़ी लगाई है कि काशीपुर का नाम पूरे खेल जगत में सम्मान के साथ लिया जाने लगा है। प्रीति सागर ने गर्व से लबरेज होकर बताया कि उनकी एकेडमी के बच्चों ने जिला स्तर (डिस्ट्रिक्ट लेवल) की प्रतियोगिताओं में अनगिनत गोल्ड मेडल (स्वर्ण पदक) जीतकर अपनी बादशाहत साबित की है, और हाल ही में बाईस तारीख से लेकर पच्चीस तारीख तक आयोजित हुई एक बड़ी राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भी उनके बच्चों का जलवा पूरी तरह कायम रहा। रो की की रैंकिंग में नंबर वन पायदान पर चल रही इस बेहद कड़े मुकाबले वाली चैंपियनशिप में उनकी एकेडमी के तीन होनहार बच्चों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल पर अपना कब्जा जमाया, जबकि एक बच्चे ने विरोधी को कड़ी शिकस्त देते हुए सिल्वर मेडल (रजत पदक) अपने नाम किया। इसके अतिरिक्त, एक अन्य बच्चा कड़े मुकाबले के बाद मेडल्स के लिए क्वालीफाई करने में पूरी तरह सफल रहा, जिसके चलते इस पूरी प्रतियोगिता में भाग लेने गए कुल पांच बच्चों के इस छोटे से दल ने शत-प्रतिशत सफलता हासिल कर काशीपुर की खेल प्रतिभा का परचम लहरा दिया।





