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पासपोर्ट की नागरिकता पर सवाल से देशभर में मचा संवैधानिक भ्रम और गहरी बहस

सरकार के हालिया बयान के बाद पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को लेकर उठे सवालों ने आम नागरिकों में पहचान और नागरिकता को लेकर अनिश्चितता, बहस और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर चर्चा शुरू कर दी है।

भारत(सुनील कोठाार)। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इन दिनों नागरिकता और पहचान के बुनियादी दस्तावेजों को लेकर एक ऐसा भूचाल आया हुआ है, जिसने देश के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों नागरिकों को गहरी चिंता और कशमकश में डाल दिया है। सत्ता के गलियारों से छनकर बाहर आए एक ताजा और बेहद चौंकाने वाले आधिकारिक बयान ने समूचे राष्ट्र को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर इस देश में किसी भी व्यक्ति के भारतीय होने का अंतिम और अचूक पैमाना क्या है। सरकार की तरफ से अचानक यह दलील पेश की गई है कि वर्षों से देश का सबसे प्रतिष्ठित और अकाट्य दस्तावेज माना जाने वाला पासपोर्ट असल में नागरिकता का कोई कानूनी प्रमाण है ही नहीं, बल्कि यह तो केवल सरहदों के पार आने-जाने के लिए जारी किया गया एक साधारण यात्रा दस्तावेज मात्र है। इस एकलौते बयान के सार्वजनिक होते ही देश के प्रबुद्ध समाज, आम जनमानस, विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है और हर कोई हतप्रभ होकर हुक्मरानों से यही पूछ रहा है कि अगर खून-पसीने की कमाई और कड़े पुलिस सत्यापन के बाद बनने वाला पासपोर्ट भी नागरिकता की गारंटी नहीं दे सकता, तो फिर आम आदमी किस कागज के टुकड़े को अपनी देशभक्ति और राष्ट्रीयता का साक्ष्य मानकर सीने से लगाए।

दशकों से देश का आम नागरिक इसी मुगालते और अटूट विश्वास में जीता रहा है कि नीले रंग की वह छोटी सी पासपोर्ट पुस्तिका उसकी राष्ट्रीय पहचान का सबसे सर्वोच्च और निर्विवाद किला है, जिसे कोई भी चुनौती नहीं दे सकता। किसी भी आम या खास व्यक्ति को जब यह पासपोर्ट हासिल करना होता है, तो उसे अपनी जिंदगी भर की संचित पूंजी में से मोटी फीस चुकानी पड़ती है, दर्जनों सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर जन्म, निवास और पहचान के प्रमाण पत्र जमा करने होते हैं और खुफिया महकमे व स्थानीय पुलिस की बेहद सख्त, बारीक और कई स्तरों की जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इतनी लंबी अग्निपरीक्षा और सरकार की अपनी सर्वोच्च मुहर के बाद जारी होने वाले इस दस्तावेज को जब खुद वही सरकार एक झटके में अंतिम प्रमाण मानने से इनकार कर देती है, तो व्यवस्था पर से जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। यह विरोधाभासी रुख देश के भीतर एक अजीबोगरीब भ्रम, अविश्वास और असुरक्षा की भावना को जन्म दे रहा है, जिससे लोग अब अपने ही वजूद को लेकर आशंकित होने लगे हैं।

इस पूरे विवाद में जो सबसे बुनियादी और तीखा यक्ष प्रश्न उभरकर सामने आता है, वह यह है कि जब कोई भी हिंदुस्तानी दुनिया के किसी दूसरे मुल्क की धरती पर कदम रखता है, तो वहां की विदेशी सरकारें और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां उसे किस आधार पर मान्यता देती हैं। इसका बेहद साफ और सीधा जवाब यही है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों और सरहदों पर भारत सरकार स्वयं इसी पासपोर्ट के जरिए उस व्यक्ति को आधिकारिक रूप से अपना नागरिक घोषित करती है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेती है। ऐसे में यह बात गले नहीं उतरती कि जो दस्तावेज सात समंदर पार दुनिया के हर देश में किसी व्यक्ति के विशुद्ध रूप से भारतीय होने की अकाट्य गवाही देता है, वही दस्तावेज अपने ही देश की भौगोलिक सीमा के भीतर आते ही नागरिकता साबित करने के लिए अपर्याप्त और कमजोर मान लिया जाता है। यह विडंबना केवल एक कानूनी दस्तावेज की वैधता का संकट नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर रहने वाले नागरिकों के उस संवैधानिक विश्वास पर भी एक बहुत बड़ा प्रहार है जो वे अपनी संप्रभु सरकार पर करते हैं।

पिछले कुछ सालों के इतिहास को देखा जाए तो देश के भीतर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी, नागरिकता संशोधन कानून और विभिन्न प्रकार के पहचान पत्रों को लेकर पहले ही कई तरह की सामाजिक और राजनीतिक बहसें गरम रही हैं, जिससे आम जनता का एक बड़ा हिस्सा मानसिक रूप से बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। ऐसे तनावपूर्ण और संवेदनशील माहौल में शासन के शीर्ष स्तर से आने वाले इस प्रकार के अस्पष्ट बयान जलती हुई आग में घी डालने का काम करते हैं और जनमानस की चिंताओं को कई गुना बढ़ा देते हैं। देश का एक साधारण और सीधा-साधा नागरिक आज यह सोचने के लिए विवश हो गया है कि यदि कल को किसी प्रशासनिक पेचदगी या राजनीतिक उठापटक के कारण उसकी राष्ट्रीयता पर कोई उंगली उठा दे, तो वह ऐसा कौन सा जादुई दस्तावेज पेश करेगा जिसे देश की अदालतें और सरकार बिना किसी नानुकुर या विवाद के सहर्ष स्वीकार कर लें। सरकार भले ही इसे विशुद्ध रूप से एक कानूनी और तकनीकी व्याख्या मानकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करे, लेकिन धरातल पर रहने वाली देश की अनपढ़ और मध्यमवर्गीय आबादी कानून की इन बारीक परिभाषाओं को समझने में पूरी तरह असमर्थ है।

जनता तो केवल उस सरल और स्पष्ट व्यवस्था पर यकीन करती है जो उसे एक वैध सरकारी खिड़की से राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, विशिष्ट पहचान पत्र और पासपोर्ट जैसी चीजें उपलब्ध कराती है और उन पर सरकारी मुहर लगाकर देश का नागरिक होने का अहसास कराती है। देश के करोड़ों लोग पीढ़ियों से इन दस्तावेजों को अपनी संप्रभुता का प्रतीक मानते आए हैं, और यदि अब इन्हें सिर्फ सीमित महत्व वाले कागजात या महज यात्रा की पर्चियां घोषित किया जा रहा है, तो यह मौजूदा हुकूमत की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि वह देश के सामने आकर बिल्कुल साफ और दो टूक शब्दों में यह घोषणा करे कि आखिर वह कौन सा सर्वमान्य और निर्विवाद दस्तावेज है जो हर परिस्थिति में नागरिकता का अंतिम सच होगा। भारत जैसे विशाल और विकासशील देश की जमीनी हकीकत यह भी है कि यहां आज भी एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जिसके पास अपना कोई आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र मौजूद नहीं है, विशेष रूप से देश के ग्रामीण अंचलों, आदिवासी क्षेत्रों और पुरानी पीढ़ी के बुजुर्गों के पास ऐसे दस्तावेजों का सर्वथा अभाव है।

समय के थपेड़ों के साथ कई गरीब परिवारों के पुराने कागजात बाढ़, आग या विस्थापन के कारण नष्ट हो चुके हैं या फिर उस दौर की व्यवस्थाओं के ढीलेपन के कारण वे कभी बन ही नहीं पाए थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में यदि सरकार पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र या विशिष्ट पहचान पत्र (आधार कार्ड) जैसे बुनियादी और व्यापक रूप से प्रचलित दस्तावेजों की कानूनी हैसियत को इस कदर सीमित और कमतर आंकने लगेगी, तो देश के एक बहुत बड़े हिस्से के सामने अपनी भारतीयता और पहचान को सिद्ध करने का एक अभूतपूर्व और भयावह संकट खड़ा हो जाएगा। किसी भी जीवंत और मजबूत लोकतंत्र की सबसे असली और बड़ी ताकत वहां की जनता का अपनी चुनी हुई सरकार और उसकी प्रशासनिक प्रणालियों पर अटूट और अडिग विश्वास होता है। जब देश के आम बाशिंदों को खुद के पास मौजूद सर्वोच्च सरकारी दस्तावेजों की वैधानिकता और ताकत पर ही संदेह होने लगे, तो यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं रह जाती, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक बेहद गंभीर और विचारणीय चिंता का विषय बन जाती है।

इस बेहद संवेदनशील और राष्ट्रव्यापी मुद्दे पर देश के विपक्षी दलों ने भी आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए सरकार को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है और तीखे सवालों की बौछार कर दी है। विपक्ष का साफ तौर पर यह आरोप है कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का पुख्ता प्रमाण नहीं है, तो पिछले कई दशकों से देश के करोड़ों नागरिकों को भारी-भरकम फीस लेकर जारी किए गए इन पासपोर्टों की वैधानिक और नैतिक स्थिति क्या रह जाती है और सरकार जानबूझकर जनता के बीच ऐसा खौफ और भ्रम का माहौल क्यों तैयार कर रही है। दूसरी तरफ, इस चौतरफा घेराबंदी से घबराई सरकार का यह रक्षात्मक तर्क है कि उसके बयानों को तोड़-मरोड़ कर और गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है, और देश के बुद्धिजीवी व राजनीतिक दल कानून की पेचीदा प्रक्रियाओं को समझे बिना ही जल्दबाजी में गलत निष्कर्ष निकाल रहे हैं। लेकिन अगर हम इस पूरे मामले से राजनीति के चश्मे को हटाकर बिल्कुल निष्पक्ष होकर देखें, तो यह पूरा विषय सीधे तौर पर देश के उस अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक से जुड़ा हुआ है जो पूरी ईमानदारी से सरकार को टैक्स देता है, हर चुनाव में कतारों में लगकर मतदान करता है, और सभी राष्ट्रीय नियमों का अक्षरशः पालन करता है।

उसे अपनी चुनी हुई सरकार से यह जानने का पूरा और संवैधानिक अधिकार है कि उसके पास उपलब्ध तमाम पहचान पत्रों में से सबसे विश्वसनीय और सर्वमान्य दस्तावेज कौन सा है जिसे वह अपना रक्षक मान सके। आज देश में इस बात की सख्त और फौरी जरूरत है कि सरकार और उसकी तमाम संबंधित संवैधानिक संस्थाएं देश के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ आएं और आम जनता को सरल, सुबोध और स्पष्ट भाषा में यह समझाएं कि भारत में नागरिकता सिद्ध करने की वास्तविक, कानूनी और अंतिम प्रक्रिया क्या है। सरकार को यह भी साफ करना चाहिए कि कौन-कौन से दस्तावेज किस विशिष्ट परिस्थिति में पूरी तरह से मान्य होंगे और उनके ऊपर किसी भी प्रकार का कोई प्रशासनिक संदेह नहीं किया जाएगा। सरकारी बयानों में दिखने वाली यह अस्पष्टता और विरोधाभासी संदेश केवल समाज में अराजकता, डर और भ्रम को बढ़ावा देते हैं, जबकि एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता और कथनी-करनी की स्पष्टता ही जनता के विश्वास की असली बुनियाद होती है।

आखिरकार, यह पूरा विवाद केवल पासपोर्ट या आधार कार्ड की कानूनी हैसियत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे और पवित्र भरोसे का इम्तिहान है जो एक आम नागरिक अपने राष्ट्र, अपने संविधान और अपनी चुनी हुई संस्थाओं पर आंख मूंदकर करता है। यदि एक वफादार नागरिक को सुबह उठकर अपने ही पास मौजूद सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता और खुद की नागरिकता पर प्रश्नचिह्न खड़े देखने पड़ें, तो यह बहस केवल अदालतों के कमरों और वकीलों की दलीलों तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने और राष्ट्रीय विश्वास की सबसे कठिन परीक्षा बन जाती है।

सरकार से देश के 5सुलगते और सीधे सवाल
इस गंभीर विषय पर देश का आम नागरिक आज वर्तमान सरकार के सामने अपनी चिंताओं को रखते हुए इन पांच बुनियादी और तीखे सवालों के स्पष्ट उत्तर की मांग कर रहा है:

सवाल 1: यदि पासपोर्ट और विशिष्ट पहचान पत्र (आधार कार्ड) नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हैं, तो पूर्व में इन बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेजों को बनाने का मूल आधार क्या तय किया गया था और इन्हें जारी करने के लिए नागरिकों से जन्म व निवास के पुख्ता प्रमाण क्यों मांगे गए थे?

सवाल 2: सरकार देश की जनता को यह स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताती कि जब करोड़ों रुपये खर्च करके इन व्यापक पहचान पत्रों का निर्माण किया गया, तो देश के भीतर राष्ट्रीयता को सिद्ध करने के लिए इनका उपयोग पूर्ण और निर्विवाद क्यों नहीं माना जा सकता?

सवाल 3: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब भारत सरकार स्वयं पासपोर्ट के माध्यम से किसी व्यक्ति को आधिकारिक तौर पर भारतीय नागरिक के रूप में पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है, तो देश की आंतरिक सीमाओं के भीतर उसी सरकारी दस्तावेज को नागरिकता साबित करने के लिए अपर्याप्त क्यों ठहराया जा रहा है?

सवाल 4: देश के उन करोड़ों गरीब, ग्रामीण और वंचित नागरिकों के लिए सरकार के पास क्या वैकल्पिक योजना है जिनके पास समय के साथ नष्ट हो जाने या कभी न बन पाने के कारण कोई आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र मौजूद नहीं है? वह अपनी नागरिकता कैसे साबित करेंगे?

सवाल 5: पहचान पत्रों की वैधता को लेकर बार-बार पैदा होने वाले इस प्रशासनिक विरोधाभास और अस्पष्टता के कारण आम जनता के भीतर पनप रहे गहरे अविश्वास, मानसिक तनाव और भ्रम के माहौल को दूर करने के लिए सरकार एक सरल, पारदर्शी और सर्वमान्य राष्ट्रीय नीति कब तक सामने लाएगी?

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