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विद्या के मंदिर में गुरु का अपमान छात्र राजनीति पर उठे गंभीर सवाल

शिक्षा के पवित्र मंदिर में छात्र राजनीति के नाम पर फैली अराजकता ने गुरु-शिष्य परंपरा को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिससे समाज में आक्रोश, चिंता और नैतिक मूल्यों के पतन की गंभीर बहस छिड़ गई है।

काशीपुर। देवभूमि के शांत माहौल और शिक्षा के प्रतिष्ठित केंद्रों को शर्मसार करने वाली एक बेहद सनसनीखेज घटना इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। काशीपुर के ऐतिहासिक और नामचीन राधे हरि महाविद्यालय से सामने आए एक हालिया घटनाक्रम ने सोशल मीडिया से लेकर आम जनता के बीच एक बड़ा भूचाल ला दिया है। कॉलेज परिसर के भीतर घटित हुई इस अप्रिय वारदात का एक वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह फैल रहा है, जिसे देखने के बाद हर कोई दंग है और समाज के प्रबुद्ध वर्ग में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। इस पूरे मामले में छात्र संगठन के एक शीर्ष पदाधिकारी की संलिप्तता और शिक्षकों के प्रति उनके व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आम नागरिकों से लेकर शिक्षा जगत से जुड़े तमाम लोगों का मानना है कि विद्या के मंदिर में इस तरह की अनुशासनहीनता और अमर्यादित आचरण किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है। घटना की गंभीरता को देखते हुए अब चारों तरफ से इस पूरे विवाद की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाने की मांग तेज हो गई है।

वायरल हो रहे इस विवादित वीडियो के केंद्र में छात्र संघ के अध्यक्ष जतिन शर्मा की भूमिका बताई जा रही है, जिनके एक कदम ने कॉलेज प्रशासन और छात्र राजनीति के बीच की खाई को और गहरा कर दिया है। बताया जा रहा है कि यह पूरा बखेड़ा उस समय शुरू हुआ जब कॉलेज प्रबंधन द्वारा नियमों के तहत एक छात्रा को उसकी अनिवार्य पात्रता पूरी न होने या किसी तकनीकी कारणवश परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। इस प्रशासनिक फैसले के विरोध में छात्र संघ के नेता जतिन शर्मा ने मोर्चा खोल दिया और वे सीधे कॉलेज के स्टाफ रूम में अध्यापकों से उलझ गए। जतिन शर्मा का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन जानबूझकर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है और एक छात्रा को परीक्षा देने से वंचित करके उसके अधिकारों का हनन किया जा रहा है। हालांकि, विरोध जताने के लिए जो तरीका अख्तियार किया गया, उसने पूरी छात्र राजनीति की साख पर एक बहुत बड़ा बट्टा लगा दिया है और लोग अब छात्र कल्याण के दावों के पीछे छिपी राजनीति को भांपने लगे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर काशीपुर के स्थानीय निवासियों और शिक्षाविदों में गहरी नाराजगी और तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। आम जनता का साफ तौर पर कहना है कि छात्र नेताओं द्वारा केवल अपना राजनीतिक चेहरा चमकाने और सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। कॉलेज के सम्मानित अध्यापकों के साथ सरेआम बदतमीजी करना, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और उन्हें जलील करते हुए मोबाइल से वीडियो बनाना बेहद निंदनीय कृत्य है। लोगों का मानना है कि गुरुओं से इस तरह अभद्रता से बात करना और उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना हमारी समृद्ध सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था और काशीपुर की ऐतिहासिक गरिमा के लिए कतई ठीक नहीं है। राजनीति के नाम पर मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ जाना और शिक्षकों को जनमानस के सामने नीचा दिखाने की यह कोशिश समाज को एक बहुत ही गलत और खतरनाक दिशा में ले जा रही है, जिसे वक्त रहते रोकना बेहद जरूरी है।

इस पूरे मामले का एक बेहद कड़वा और संवेदनशील पहलू यह भी है कि कई मामलों में कॉलेज के प्राध्यापक और शिक्षक सब कुछ सहकर भी चुप्पी साधने पर मजबूर हो जाते हैं। चूंकि ये शिक्षक सरकारी पदों पर आसीन हैं और पूरी तरह से विभागीय नियमों और आचार संहिता से बंधे हुए हैं, इसलिए वे इन उद्दंड तत्वों के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आ पाते हैं। सरकारी व्यवस्था में होने के कारण उन्हें हमेशा यह डर सताता है कि यदि कोई भी वीडियो आधा-अधूरा या तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, तो बिना किसी गहन जांच के सबसे पहले उन्हीं के ऊपर गाज गिर सकती है। वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा उन पर ही विभागीय जांच बैठा दी जाती है, जिससे उनकी बरसों की कमाई हुई साख और नौकरी दांव पर लग जाती है। इसी प्रशासनिक मजबूरी और नौकरी जाने के डर का फायदा उठाकर कुछ अराजक छात्र नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए इन सरकारी सेवकों को अपना आसान निशाना बनाते हैं और उन्हें सरेआम मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं।

समाज के जागरूक नागरिकों और छात्र समुदाय के एक बड़े हिस्से का यह स्पष्ट मत है कि लोकतंत्र में छात्रों की जायज समस्याओं और मांगों को उठाने के कई अन्य शालीन और प्रभावी रास्ते मौजूद हैं। यदि किसी छात्रा को परीक्षा में बैठने नहीं दिया जा रहा था, तो इस गंभीर मुद्दे को मीडिया के माध्यम से पूरी ताकत के साथ प्रमुखता से उठाया जा सकता था, जिससे शासन-प्रशासन पर एक नैतिक दबाव बनता। लोकतांत्रिक देश में अपनी बात मनवाने के लिए कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके मौजूद हैं, न कि पूजनीय अध्यापकों के साथ बदतमीजी करके कोई जंग जीती जा सकती है। गुरुओं का अपमान करके और उन्हें डरा-धमकाकर हासिल की गई कोई भी जीत कभी भी छात्रों के हित में नहीं हो सकती। काशीपुर के प्रबुद्ध नागरिकों ने अब सुर में सुर मिलाकर यह मांग की है कि कॉलेज परिसर के भीतर भयमुक्त और अनुशासित माहौल बहाल किया जाए ताकि देश का भविष्य सुरक्षित रह सके और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति दोबारा कभी न हो।

पुरातन काल से ही भारतीय संस्कृति में गुरुओं का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है, जहां शिष्य अपने गुरु के मान-सम्मान की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहते थे। इतिहास गवाह है कि इसी पावन धरती पर शिष्यों ने गुरु की एक आवाज पर अपना अंगूठा तक दान कर दिया था, क्योंकि वे जानते थे कि गुरु की डांट में भी उनका भविष्य और कल्याण छिपा होता है। आज काशीपुर के इस आधुनिक शिक्षण संस्थान में गुरु-शिष्य की उसी महान और पवित्र परंपरा का सरेआम चीरहरण होते देखना बेहद पीड़ादायक और चिंताजनक है। राधे हरि महाविद्यालय की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिकता और राजनीति की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों से कितने दूर आ चुके हैं। समय रहते अगर छात्र राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप और गुरुओं के प्रति गिरती मर्यादा को नहीं संभाला गया, तो वह दिन दूर नहीं जब विद्या के मंदिर केवल राजनीतिक अखाड़े बनकर रह जाएंगे और समाज अपनी नैतिक रीढ़ हमेशा के लिए खो देगा।

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