काशीपुर। हरिद्वार में कांवड़ यात्रा के समापन के बाद गंगा घाटों पर दिखाई देने वाली गंदगी ने एक बार फिर आस्था और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन को लेकर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। इसी मुद्दे को लेकर समाज सेविका उर्वशी दत्त बाली ने समाज के सामने एक ऐसा सवाल रखा है, जिसे केवल प्रशासन या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी मानकर टाला नहीं जा सकता। उनका कहना है कि हरिद्वार के पावन घाटों पर गूंजता ‘हर हर गंगे’ का जयघोष करोड़ों लोगों की श्रद्धा और सनातन आस्था का प्रतीक है, लेकिन यदि इसी आस्था के बाद गंगा के किनारे प्लास्टिक, पॉलीथिन, बोतलें, थर्माकोल और अन्य कचरा दिखाई दे, तो समाज को अपने व्यवहार पर आत्ममंथन करना चाहिए। कांवड़ यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचे और गंगाजल लेकर अपने-अपने गंतव्य लौटे। यात्रा के बाद घाटों और आसपास के क्षेत्रों में सफाई व्यवस्था को लेकर उठने वाले सवाल इस बात की ओर संकेत करते हैं कि धार्मिक आयोजनों की भव्यता के साथ पर्यावरणीय अनुशासन को भी उतनी ही प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। उर्वशी दत्त बाली ने इसी संदर्भ में सवाल उठाया कि यदि गंगा वास्तव में हमारी मां है, तो क्या हम अपनी मां के साथ वही व्यवहार कर सकते हैं जो आज कई घाटों पर देखने को मिलता है।
हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा आरती श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति और धार्मिक भावनाओं का केंद्र है, लेकिन आरती और बड़े धार्मिक आयोजनों के बाद घाटों पर जमा होने वाला कचरा उसी आस्था के सामने एक असहज तस्वीर भी पेश करता है। उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं की भावनाएं पूरी तरह पवित्र होती हैं, मगर कई बार पूजा सामग्री के निस्तारण का तरीका नदी और उसके आसपास के पर्यावरण के लिए नुकसानदायक बन जाता है। कांवड़ यात्रा के बाद भी घाटों, सीढ़ियों और नदी के आसपास सफाई का दबाव बढ़ जाता है। श्रद्धालुओं द्वारा छोड़ी गई प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन, खाद्य सामग्री के पैकेट, डिस्पोजेबल वस्तुएं, थर्माकोल के पात्र तथा अन्य अपशिष्ट न केवल घाटों की सुंदरता प्रभावित करते हैं, बल्कि नदी के पारिस्थितिक तंत्र पर भी असर डाल सकते हैं। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था को किसी भी प्रकार से कम करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि आस्था को जिम्मेदारी से जोड़ा जाए। जिस स्थान पर लोग पुण्य और शांति की तलाश में पहुंचते हैं, वहां से लौटते समय उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ छोड़ना ही वास्तविक श्रद्धा की पहचान होनी चाहिए। कांवड़ यात्रा जैसी विशाल धार्मिक गतिविधियों के बाद घाटों की सफाई के लिए प्रशासन और सफाई कर्मियों पर पूरा भार डालने के बजाय श्रद्धालुओं, स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों और धार्मिक संगठनों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी।
उर्वशी दत्त बाली ने अपने विचारों में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि गंगा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, संस्कृति, आस्था और आजीविका से जुड़ी महत्वपूर्ण नदी है, इसलिए इसकी स्वच्छता किसी अभियान का विषय भर नहीं हो सकती। उनके अनुसार गंगा के प्रति सम्मान केवल आरती करने, दीप जलाने या जल में स्नान करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति नदी के किनारे पूजा करने के बाद उसी स्थान पर प्लास्टिक या अन्य कचरा छोड़ देता है, तो उसके धार्मिक कर्म और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच बड़ा विरोधाभास पैदा हो जाता है। उनका सवाल इसी विरोधाभास पर केंद्रित है कि हम जिस जल को पवित्र मानकर अपने घरों तक ले जाते हैं, उसी जलधारा को प्रदूषित करने वाली वस्तुएं आखिर क्यों छोड़ देते हैं। कांवड़ यात्रा के बाद घाटों पर बढ़ने वाला कचरा इस चुनौती को और गंभीर बनाता है, क्योंकि लाखों लोगों की आवाजाही के दौरान उत्पन्न अपशिष्ट का प्रबंधन अपने आप में बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है। उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि आस्था और स्वच्छता को अलग-अलग विषय मानना उचित नहीं होगा। धार्मिक स्थलों की पवित्रता वहां के वातावरण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से भी जुड़ी होती है। इसलिए हर श्रद्धालु को यह संकल्प लेना चाहिए कि गंगा दर्शन के दौरान वह नदी को कुछ ऐसा नहीं देगा जो उसकी स्वच्छता और प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचाए। उनके अनुसार सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें पूजा के साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी दिखाई दे।
गंगा जल की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सामने आने वाली चिंताओं का उल्लेख करते हुए उर्वशी दत्त बाली ने सरकारी प्रयासों के साथ जनभागीदारी को निर्णायक बताया और कहा कि केवल योजनाओं के भरोसे नदी को पूरी तरह स्वच्छ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि नमामि गंगे जैसी सरकारी पहलें नदी संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं, लेकिन किसी भी योजना की सफलता तभी स्थायी हो सकती है, जब समाज अपने व्यवहार में बदलाव लाए। गंगा में प्रदूषण की चर्चा केवल आंकड़ों तक सीमित रखने के बजाय लोगों को यह समझना होगा कि नदी में जाने वाला प्रत्येक अनुपयोगी पदार्थ उसके जल, जलीय जीवों और आसपास के पर्यावरण पर प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने गंगा जल में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और बीओडी यानी बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड से जुड़ी चिंताओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि नदी की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक निगरानी और नियमित परीक्षण जरूरी हैं। साथ ही नागरिकों को भी यह देखना होगा कि उनके दैनिक व्यवहार से प्रदूषण बढ़ तो नहीं रहा। उनका मानना है कि प्रशासन सफाई व्यवस्था को मजबूत कर सकता है, घाटों पर कूड़ेदान और जागरूकता अभियान चला सकता है, धार्मिक संस्थाएं संदेश दे सकती हैं, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी व्यक्ति की अपनी आदतों से जुड़ी है। यदि श्रद्धालु स्वयं पूजा सामग्री, प्लास्टिक और अन्य कचरे को नदी में डालने से बचें तथा निर्धारित स्थानों पर ही उसका निस्तारण करें, तो गंगा संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।
इसी चिंता को आगे बढ़ाते हुए उर्वशी दत्त बाली ने श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों से घाटों पर साबुन तथा शैम्पू के इस्तेमाल से बचने और पूजा सामग्री के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने की अपील की है। उनका कहना है कि धार्मिक स्नान की परंपरा अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन नदी के जल को रासायनिक पदार्थों से प्रभावित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार पूजा के दौरान इस्तेमाल होने वाली ऐसी वस्तुओं को नदी में प्रवाहित करने से बचना चाहिए, जो आसानी से जैविक रूप से नष्ट नहीं होतीं। उन्होंने इको-फ्रेंडली और जैव-अपघटनीय सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उनका सुझाव है कि घाटों पर पूजा सामग्री के लिए अलग संग्रह व्यवस्था हो, ताकि फूल, पत्तियां और अन्य जैविक सामग्री को उचित तरीके से अलग किया जा सके और प्लास्टिक या अन्य गैर-जैविक कचरे को नदी में पहुंचने से रोका जा सके। कांवड़ यात्रा के बाद घाटों पर स्वच्छता की चुनौती को देखते हुए यह व्यवस्था और अधिक प्रभावी बनाए जाने की जरूरत महसूस होती है। उनका कहना है कि धार्मिक आयोजन जितने बड़े होते जा रहे हैं, उतनी ही बड़ी पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी समाज के सामने आती जा रही है। यदि श्रद्धालुओं को पहले से स्पष्ट संदेश दिया जाए कि गंगा में किसी प्रकार का कचरा नहीं डालना है और पूजा सामग्री के लिए निर्धारित व्यवस्था का उपयोग करना है, तो धार्मिक पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है। यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामूहिक संस्कार का विषय बनना चाहिए।
उर्वशी दत्त बाली के संदेश का सार यही है कि हरिद्वार की वास्तविक पवित्रता केवल उसकी पौराणिक पहचान, धार्मिक कथाओं और भव्य आयोजनों में नहीं बल्कि गंगा की स्वच्छ और निर्मल धारा में भी दिखाई देनी चाहिए। कांवड़ यात्रा के बाद घाटों पर फैली गंदगी को देखकर समाज को किसी एक व्यक्ति, संस्था या विभाग पर जिम्मेदारी डालने के बजाय अपनी भूमिका पर विचार करना होगा। श्रद्धालुओं की भारी संख्या, धार्मिक आयोजनों का विस्तार और बढ़ता पर्यटन निश्चित रूप से सफाई व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती पैदा करते हैं, लेकिन यही चुनौती सामूहिक अनुशासन के माध्यम से अवसर में बदली जा सकती है। उर्वशी दत्त बाली का कहना है कि अगली बार जब कोई श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचे तो केवल गंगा मैया से आशीर्वाद, सुख और समृद्धि की प्रार्थना न करे, बल्कि नदी को स्वच्छ रखने का संकल्प भी लेकर लौटे। गंगा के प्रति सम्मान का अर्थ यह होना चाहिए कि नदी में प्लास्टिक न डाला जाए, पूजा सामग्री निर्धारित स्थान पर जमा की जाए, रासायनिक पदार्थों के उपयोग से बचा जाए और घाटों को अपने घर की तरह साफ रखा जाए। यदि हर व्यक्ति यह सोच विकसित कर ले कि गंगा की सफाई केवल सरकार की नहीं बल्कि उसकी अपनी जिम्मेदारी भी है, तो बदलाव निश्चित रूप से दिखाई देगा। आस्था की शक्ति तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ जिम्मेदारी की भावना भी जुड़ी हो। गंगा को मां कहने का सबसे बड़ा प्रमाण शायद यही होगा कि हम उसकी रक्षा उसी संवेदनशीलता से करें, जैसी एक बीमार मां की देखभाल करने वाला बच्चा करता है। जय मां गंगे, जय उत्तराखंड।





