रामनगर। पहाड़ी अंचल अल्मोड़ा से उठी विरोध की चिंगारी अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन में तब्दील होती जा रही है। रामनगर और अल्मोड़ा के सीमावर्ती क्षेत्र मोहान में स्थित देश की एकमात्र सरकारी आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवा निर्माता कंपनी इंडियन मेडिसिंस फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) के विनिवेश के फैसले ने पूरे सूबे के गलियारों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। फैक्ट्री के मुख्य द्वार पर अपनी जायज मांगों को लेकर पिछले कई दिनों से धरने पर बैठे आंदोलित कर्मचारियों और मजदूरों को अब क्षेत्रीय ताकतों का पुरजोर साथ मिलने लगा है। इसी कड़ी में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और इंकलाबी मजदूर केंद्र जैसी जनपक्षधर ताकतों ने सीधे धरातल पर उतरकर इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ दे दिया है। दोनों ही संगठनों के शीर्ष नेताओं ने आंदोलनकारी कर्मचारियों के बीच पहुंचकर न सिर्फ उनके हौसले को बुलंद किया बल्कि इस निजीकरण की नीति के खिलाफ आर-पार की जंग लड़ने का खुला ऐलान भी कर दिया है। इस साझा मोर्चे ने साफ कर दिया है कि वे उत्तराखंड की इस अनमोल धरोहर को किसी भी कीमत पर कौड़ियों के दाम बिकने नहीं देंगे।
सल्ट विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मोहान में चल रहे इस ऐतिहासिक आंदोलन को गति देने के लिए उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी और इंकलाबी मजदूर केंद्र के महासचिव रोहित रूहेला के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल धरना स्थल पर पहुंचा। वहां मौजूद सैकड़ों आक्रोशित श्रमिकों ने गगनभेदी नारों के साथ इस संयुक्त मोर्चे का स्वागत किया, जिससे पूरा माहौल और अधिक ऊर्जावान हो उठा। दोनों संगठनों के प्रतिनिधियों ने आईएमपीसीएल कर्मचारी संघ के शीर्ष पदाधिकारियों और वरिष्ठ सदस्यों के साथ एक लंबी और बेहद गंभीर मंत्रणा की। इस दौरान नेताओं ने कारखाने के मौजूदा संकट और सरकार की इस गुप्त रणनीति के विभिन्न कानूनी व आर्थिक पहलुओं को गहराई से समझा। कर्मचारी संघ के जुझारू अध्यक्ष जयपाल सिंह रावत और ऊर्जावान सचिव भूपेंद्र सिंह अधिकारी ने संयुक्त रूप से प्रतिनिधिमंडल को एक विस्तृत मांग पत्र और ज्ञापन सौंपा, जिसमें इस पूरे विनिवेश सौदे के पीछे छिपे कथित खेल को उजागर किया गया था। इस मुलाकात के बाद श्रमिक नेताओं में यह भरोसा जागा है कि उनकी यह आवाज अब सिर्फ फैक्ट्री गेट तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि विधानसभा से लेकर संसद तक गूंजेगी।
इस पूरे घटनाक्रम पर गहरा आश्चर्य और तीव्र रोष प्रकट करते हुए उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी और इंकलाबी मजदूर केंद्र के महासचिव रोहित रूहेला ने केंद्र की वर्तमान सत्ता पर तीखा हमला बोला। नेताओं ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और हैरतअंगेज है कि जो सार्वजनिक उपक्रम साल 1978 में अपनी स्थापना के बाद से लगातार देश की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को मजबूती दे रहा है, उसे अचानक बेचने की तैयारी कर ली गई। यह कारखाना देश का अकेला ऐसा सरकारी संस्थान है जो पूरी तरह से शुद्ध आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं का निर्माण करता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह कभी भी घाटे में नहीं रहा। लगातार हर साल सरकारी खजाने को भारी मुनाफा देने वाला और कुमाऊं मंडल के सैकड़ों स्थानीय युवाओं, पहाड़ी किसानों और जड़ी-बूटी संग्राहकों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका देने वाले इस गौरवशाली कारखाने को मोदी सरकार ने अपने चुनिंदा कॉरपोरेट मित्रों के हाथों में सौंपने का आत्मघाती फैसला कर लिया है। नेताओं ने आरोप लगाया कि मुनाफे वाले उद्योगों को इस तरह निजी हाथों में बेचना सीधे तौर पर जनता की संपत्ति पर डाका डालने जैसा है।
पहाड़ की इस अमूल्य औद्योगिक धरोहर को कौड़ियों के भाव बेचे जाने के पीछे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष प्रभात ध्यानी ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों की घोर लापरवाही और नकारापन को मुख्य वजह बताया। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि आज उत्तराखंड की जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है क्योंकि जिन भाजपा विधायकों और सांसदों को जनता ने चुनकर सदन में भेजा था, वे आज अपने ही राज्य के संसाधनों की लूट पर पूरी तरह मौन साधे बैठे हैं। उत्तराखंड का आर्थिक ढांचा एक के बाद एक सरकारी उद्योगों के बंद होने और उनके निजीकरण से पूरी तरह चरमरा रहा है, लेकिन सत्ताधारी दल के माननीयों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इसी आक्रोश के तहत प्रभात ध्यानी और रोहित रूहेला ने सल्ट अल्मोड़ा के विधायक महेश जीना, रामनगर के विधायक दीवान सिंह बिष्ट, नैनीताल की विधायक सरिता आर्या सहित अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा, नैनीताल के सांसद अजय भट्ट और गढ़वाल के कद्दावर सांसद अनिल बलूनी का नाम लेकर उन्हें कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष सहित तमाम सामाजिक, राजनीतिक, व्यापारिक, छात्र, कर्मचारी, महिला और पूर्व सैनिक संगठनों से अपील की कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आईएमपीसीएल मोहान को बचाने के लिए इस महा-आंदोलन में आगे आएं।

फैक्ट्री परिसर के बाहर आयोजित इस विशाल सभा में आईएमपीसीएल मोहान कर्मचारी संघ के अध्यक्ष जयपाल सिंह रावत, सचिव भूपेंद्र सिंह अधिकारी के साथ उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के सचिव लालमणि और नगर संयोजक आसिफ भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों व मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बैठे नजर आए। सभा को संबोधित करते हुए कर्मचारी संघ के अध्यक्ष जयपाल सिंह रावत ने इस विनिवेश प्रक्रिया के तकनीकी और वित्तीय घपले को सबके सामने रखते हुए चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि यह पूरे देश के लिए गर्व का विषय होना चाहिए था कि हमारे पास सरकारी क्षेत्र की ऐसी कंपनी है जो प्रामाणिक आयुर्वेदिक और यूनानी औषधियों का निर्माण करती है, लेकिन सरकार ने इसका ठीक उल्टा किया। साल 1978 से निरंतर लाभ कमाने वाली इस नवरत्न जैसी कंपनी का सौदा केंद्र सरकार ने आनन-फानन में महज 121 करोड़ रुपये की मामूली रकम में स्काईमैप फार्मा नामक एक निजी कंपनी के साथ तय कर दिया है। यह सौदा पूरी तरह से तर्कहीन है क्योंकि अगर केवल कंपनी की जमीनों, भवनों और बुनियादी ढांचे यानी इसके अचल असेस्ट्स का ही मूल्यांकन किया जाए तो वह करीब 200 करोड़ रुपये से कहीं अधिक बैठता है।
औद्योगिक बाजार में आईएमपीसीएल की साख और इसकी वास्तविक ताकत का जिक्र करते हुए आंदोलनकारी कर्मचारियों ने बताया कि यह कोई साधारण कारखाना नहीं बल्कि अपने आप में एक बेहद प्रतिष्ठित और स्थापित ब्रांड है। इस सरकारी संस्थान के पास मौजूदा समय में 1200 से भी अधिक प्रकार की विशिष्ट एवं जीवनरक्षक आयुर्वेदिक तथा यूनानी दवाइयां बनाने का वैध फॉर्मूलेशन और लाइसेंस मौजूद है, जो देश के किसी भी अन्य निजी दवा निर्माता के पास नहीं है। इस अद्वितीय विशेषता और विशाल नेटवर्क के कारण यदि निष्पक्ष रूप से इस कंपनी की वास्तविक बाजार कीमत (मार्केट वैल्यू) का आकलन किया जाए, तो वह आसानी से 1000 करोड़ रुपये के आंकड़े को भी पार कर जाती है। ऐसे में एक हजार करोड़ की बहुमूल्य राष्ट्रीय संपत्ति को सिर्फ 121 करोड़ रुपये में किसी निजी हाथों में सौंप देना देश की जनता के पैसों का खुला अपमान है। कर्मचारी नेताओं ने साफ कहा कि इस तरह के फैसले यह साबित करते हैं कि सरकार का मकसद उद्योगों का विकास करना नहीं बल्कि सार्वजनिक संपत्तियों को निजी कंपनियों के हवाले करना है।
इस पूरे विनिवेश सौदे की कानूनी वैधता को चुनौती देते हुए आईएमपीसीएल कर्मचारी संघ के कर्मठ महामंत्री बी एस अधिकारी ने आंदोलनकारियों को एक बड़ी रणनीति की जानकारी दी। उन्होंने सार्वजनिक मंच से घोषणा की कि कर्मचारियों ने इस अन्यायपूर्ण और नियम विरुद्ध निजीकरण के फैसले के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया है और एक मजबूत केस फाइल कर दिया है। बी एस अधिकारी ने कानूनी खामियों को उजागर करते हुए बताया कि जिस विशाल भूमि पर यह पूरी फैक्ट्री और इसके प्लांट खड़े हैं, वह असल में वन विभाग (फॉरेस्ट डिपार्टमेंट) की है और इसे एक निश्चित लीज समझौते के तहत कारखाने को दिया गया था। नियम यह कहता है कि वन भूमि की लीज पर बनी किसी भी संपत्ति का मालिकाना हक बदलने या बेचने से पहले वन विभाग से औपचारिक और कानूनी अनुमति लेना अनिवार्य होता है, लेकिन इस पूरे सौदे में ऐसी किसी भी वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और न ही फॉरेस्ट विभाग से कोई अनुमति हासिल की गई। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन है और अदालत में सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा।
कर्मचारी संघ के महामंत्री बी एस अधिकारी ने इस सौदे को हासिल करने वाली कंपनी स्काईमैप फार्मा की साख और उसकी कार्यप्रणाली पर भी कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने हैरान करने वाला खुलासा करते हुए बताया कि जिस कंपनी को देश के इतने बड़े और एकमात्र सरकारी यूनानी व आयुर्वेदिक संस्थान को सौंपने की तैयारी की गई है, वह खुद बाजार में एक वित्तीय संकट और घाटे से जूझ रही कंपनी के रूप में जानी जाती है। सबसे बड़ी और तकनीकी चिंता की बात यह है कि इस निजी कंपनी के पास पारंपरिक आयुर्वेदिक पद्धतियों और जड़ी-बूटियों से दवाएं तैयार करने का कोई पूर्व अनुभव या विशेषज्ञता ही नहीं है। ऐसे में एक अनुभवीहीन और घाटे में चल रही निजी कंपनी को सौंपे जाने के बाद इस राष्ट्रीय महत्व के कारखाने का भविष्य पूरी तरह से अंधकार में डूब जाएगा और वहां काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों के परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गहरा संकट खड़ा हो जाएगा। आंदोलनकारियों ने अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करते हुए संकल्प लिया कि जब तक सरकार इस काले विनिवेश प्रस्ताव को पूरी तरह निरस्त नहीं करती, तब तक उनका यह गेट जाम धरना और उग्र आंदोलन अनवरत जारी रहेगा।





