नई दिल्ली। चिकित्सा जगत और देश के स्वास्थ्य गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी और बेहद सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने आधुनिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के बीच चल रही वैचारिक जंग को एक नया मोड़ दे दिया है। भारत सरकार के अधीन काम करने वाले राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग (NCH) के अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बोर्ड ऑफ एथिक्स एंड रजिस्ट्रेशन इन होम्योपैथी (BERH) ने देश भर में होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति और इससे जुड़े वैध डॉक्टरों के खिलाफ लंबे समय से सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर फैलाई जा रही अपमानजनक, भ्रामक और पूरी तरह से आधारहीन टिप्पणियों पर अब अपना सबसे कड़ा और ऐतिहासिक कानूनी शिकंजा कस दिया है। बोर्ड द्वारा जारी किए गए एक बेहद कड़क और अभूतपूर्व परिपत्र ने यह पूरी तरह से साफ कर दिया है कि देश के स्थापित कानूनों के तहत विधिवत रूप से पंजीकृत किसी भी होम्योपैथिक डॉक्टर के लिए “झोलाछाप” या “क्वैक” जैसे निकृष्ट और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना अब भारी कानूनी मुसीबत को न्योता दे सकता है। आयोग का मानना है कि इस तरह के बेतुके शब्दों का प्रयोग न केवल डॉक्टरों की सामाजिक और व्यावसायिक छवि को गहरी ठेस पहुँचाता है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत के संविधान और विभिन्न वैधानिक प्रावधानों द्वारा उन्हें दिए गए मौलिक अधिकारों का एक बहुत बड़ा और अक्षम्य उल्लंघन भी माना जाएगा।
इस पूरे मामले की कानूनी गहराई और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को खंगालें तो पता चलता है कि देश की संसद द्वारा पारित होम्योपैथी राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग अधिनियम, 2020 के लागू होने के बाद से ही इस चिकित्सा विधा को भारत में एक पूर्णतः मान्यता प्राप्त और वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति का दर्जा प्राप्त है। इसके तहत जितने भी डॉक्टर राष्ट्रीय रजिस्टर या फिर विभिन्न राज्यों की होम्योपैथिक परिषदों और बोर्डों में कानूनी रूप से अपनी डिग्री दर्ज करवा चुके हैं, उन्हें देश के किसी भी कोने में पूरी स्वतंत्रता और अधिकार के साथ मरीजों का इलाज करने और अपना क्लिनिक चलाने का अटूट वैधानिक अधिकार मिला हुआ है। ऐसे में कतिपय संगठनों, व्यक्तियों या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा बिना किसी पुख्ता कानूनी समझ के इन डॉक्टरों की योग्यता पर कीचड़ उछालना और उन्हें अप्रशिक्षित श्रेणी में डालना पूरी तरह से अवैध और दंडात्मक कृत्य की श्रेणी में आता है। राष्ट्रीय आयोग ने अपने इस बेहद सख्त रुख के जरिए यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि कानून की नजर में रजिस्टर्ड होम्योपैथ्स भी उतने ही सम्मानित और वैध हैं जितने कि अन्य किसी भी चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञ, और उनके आत्मसम्मान से खिलवाड़ को अब कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस ऐतिहासिक परिपत्र की सबसे बड़ी और धमाकेदार बात यह है कि इसके दायरे को केवल किसी बंद कमरे की चर्चा तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसके अंतर्गत आधुनिक संचार के सभी डिजिटल और प्रिंट माध्यमों को बहुत ही कड़ाई के साथ शामिल कर लिया गया है। बोर्ड ने साफ तौर पर रेखांकित किया है कि कोई भी मुख्यधारा की प्रेस विज्ञप्ति हो, समाचार पत्रों में छपने वाली खबरें हों, सोशल मीडिया के विभिन्न दिग्गज प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, यूट्यूब या ट्विटर की पोस्ट्स हों, किसी भी प्रकार की व्यावसायिक या निजी वेबसाइट सामग्री हो, या यहाँ तक कि किसी भी तरह के सरकारी दस्तावेज, पुलिस एफआईआर (FIR), अदालती शिकायत और किसी नेता या संगठन के सार्वजनिक वक्तव्य ही क्यों न हों—इनमें से किसी भी जगह पर पंजीकृत होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिए “क्वैक” या ऐसे ही मिलते-जुलते अन्य अपमानजनक व अमर्यादित शब्दों का प्रयोग पूर्ण रूप से प्रतिबंधित और अनुचित माना जाएगा। आयोग ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी से समाज में भ्रम फैलता है, डॉक्टरों की वर्षों की कड़ी मेहनत से कमाई गई पेशेवर प्रतिष्ठा मटियामेट हो जाती है और आम जनता के मन में चिकित्सा व्यवस्था के प्रति अविश्वास की एक बेहद खतरनाक भावना पैदा होती है।
बोर्ड ऑफ एथिक्स एंड रजिस्ट्रेशन इन होम्योपैथी (BERH) ने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह भी निर्देश जारी किया है कि इस नए परिपत्र का उद्देश्य किसी भी प्रकार की स्वस्थ वैज्ञानिक आलोचना को दबाना बिल्कुल नहीं है, बल्कि संवाद के भीतर छिपी दुर्भावना और अभद्रता पर लगाम लगाना है। आयोग का कहना है कि यदि समाज के किसी भी नागरिक, संस्था या अन्य किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट डॉक्टर की कार्यप्रणाली, उनके व्यक्तिगत आचरण, क्लिनिक के संचालन या उनकी डिग्री को लेकर किसी भी प्रकार का कोई वास्तविक संदेह या शिकायत है, तो उसे सड़कों पर या सोशल मीडिया पर तमाशा बनाने के बजाय देश में स्थापित वैधानिक, नियामक, अनुशासनात्मक या न्यायिक प्रक्रियाओं के उचित माध्यम से ही उठाया जाना चाहिए। समूचे होम्योपैथी समुदाय अथवा सभी पंजीकृत चिकित्सकों को एक ही लाठी से हांकते हुए उनके लिए सामान्यीकृत तरीके से अपमानजनक और घटिया टिप्पणियाँ करना किसी भी सभ्य समाज या कानूनी व्यवस्था के तहत स्वीकार्य नहीं किया जाएगा। यदि कोई इस तय प्रक्रिया का उल्लंघन करके मनमर्जी की बयानबाजी करता पाया गया, तो पीड़ित डॉक्टर या स्वयं बोर्ड उसके खिलाफ मानहानि और अन्य कड़े कानूनों के तहत त्वरित कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा।

इस अभूतपूर्व कदम के पीछे राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग का वह अटूट संकल्प और प्रतिबद्धता साफ दिखाई देती है, जो उसने इस चिकित्सा पद्धति के गौरवमयी इतिहास और इसके चिकित्सकों के सम्मान की रक्षा के लिए देश के सामने दोहराई है। आयोग ने अपने आधिकारिक बयान में यह बात पूरी तरह साफ कर दी है कि वह देश के कोने-कोने में स्वास्थ्य सेवाएँ दे रहे लाखों होम्योपैथी डॉक्टरों की गरिमा, उनकी वैधानिक वैधता और उनके पेशेवर सम्मान को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हर संभव प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। भविष्य में यदि किसी भी व्यक्ति, रसूखदार संस्था या किसी भी डिजिटल मंच द्वारा होम्योपैथी विधा या उसके डॉक्टरों की छवि को जानबूझकर धूमिल करने या उन्हें नीचा दिखाने का कोई भी कुत्सित प्रयास किया गया, तो देश में वर्तमान में प्रचलित कड़े दीवानी और फौजदारी कानूनों के अनुसार उनके खिलाफ बेहद सख्त और दंडात्मक कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जा सकती है, जिससे दूसरों को भी एक कड़ा सबक मिल सके।
इस कड़े और बहुप्रतीक्षित फैसले के आते ही देश भर के तमाम होम्योपैथिक चिकित्सकों, मेडिकल कॉलेजों के प्राध्यापकों और विभिन्न बड़े पेशेवर संगठनों के भीतर भारी खुशी की लहर दौड़ गई है और सभी ने इसका खुलकर और पुरजोर स्वागत किया है। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े तमाम चोटी के विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिपत्र केवल एक साधारण सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक और दशकों से लंबित चल रहा ऐसा बड़ा निर्णय है जो होम्योपैथी की वैधानिक स्थिति को समाज के सामने एक बार फिर पूरी ताकत और स्पष्टता के साथ री-इस्टैब्लिश करता है। इसके लागू होने से न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में एक दूसरे के प्रति सम्मानजनक संवाद और तथ्यों पर आधारित विमर्श को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि उन तत्वों के हौसले भी पूरी तरह से पस्त हो जाएंगे जो केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए पारंपरिक पद्धतियों पर कीचड़ उछालते रहते थे।
इस पूरे मामले के विशेष और सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहलू की बात करें तो यह बेहद प्रभावशाली परिपत्र बीते कल यानी 8 जून, 2026 को BERH की वर्तमान अध्यक्ष डॉ. हरचरणजीत कौर के हस्ताक्षरों के साथ आधिकारिक रूप से देश भर के लिए जारी किया गया है। इस आदेश के दूरगामी प्रभावों को सुनिश्चित करने के लिए इसकी मुख्य प्रतियां तुरंत प्रभाव से राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग के शीर्ष अधिकारियों, केंद्रीय आयुष मंत्रालय के सचिवों, देश के सभी राज्यों की होम्योपैथी परिषदों, देश भर में संचालित तमाम चिकित्सा शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं सरकार से मान्यता प्राप्त सभी बड़े पेशेवर संगठनों को आवश्यक और त्वरित अनुपालन हेतु प्रेषित कर दी गई हैं। माना जा रहा है कि इस आदेश के बाद अब सोशल मीडिया पर डॉक्टरों के खिलाफ जहर उगलने वाले कई पेजों और हैंडल्स पर बड़े पैमाने पर डिलीट करने की होड़ मचने वाली है और आने वाले दिनों में इसके कई बड़े कानूनी परिणाम भी अदालतों में देखने को मिल सकते हैं।





