काशीपुर। देवभूमि के सुरम्य आंचल में बसी शांत वादियों से उठकर सात समंदर पार तक गूंजने वाली यह दास्तां महज एक संयोग नहीं, बल्कि बिखरे हुए सपनों को सहेजकर बनाई गई आत्मनिर्भरता की एक बुलंद इबारत है। उत्तराखंड के इस छोटे से अंचल में जब धूप की पहली किरण पहाड़ों की चोटियों को छूती है, तो उसी के साथ पिथौरागढ़ जिले के चौकड़ी गांव में महिलाओं की उंगलियों की जादुई हरकत भी शुरू हो जाती है। यह पूरी यात्रा एक साधारण से पौधे पर खिले लाल गुलाब से शुरू होकर सीधे अमेरिका के आधुनिक फैशन और डिजाइनिंग बाजारों तक जा पहुंचती है। घुमक्कड़ी और फोटोग्राफी की बेहद शौकीन उर्वशी दत्त बाली, जिन्हें हमेशा से ही चमक-दमक वाली दुनिया से दूर बेहद साधारण और जमीन से जुड़े लोगों के बीच बैठना और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को बहुत गहराई से महसूस करना पसंद रहा है, इस कहानी की मुख्य सूत्रधार बनकर उभरती हैं। उनका साफ मानना है कि ईश्वर ने यदि किसी भी इंसान को मानसिक और शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम बनाया है, तो यह उसका परम कर्तव्य है कि वह बिना किसी स्वार्थ भावना के दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए आगे आए।
इसी निस्वार्थ और सकारात्मक सोच को अपने भीतर समेटे हुए जब उर्वशी दत्त बाली इस पहाड़ी क्षेत्र के चौकड़ी गांव के रास्तों से गुजर रही थीं, तो अचानक प्रकृति के एक अद्भुत नजारे ने उनके कदमों को वहीं ठिठकने पर पूरी तरह मजबूर कर दिया। रास्ते के किनारे पहाड़ों की ओट में बना एक बेहद खूबसूरत सा मकान था, जो चारों तरफ से खिले हुए लाल और गुलाबी गुलाबों से पूरी तरह घिरा हुआ था। प्रकृति के इस बेहद हसीन रूप को देखकर कैमरे से दुनिया को कैद करने वाली उर्वशी दत्त बाली खुद को रोक नहीं पाईं और उन्होंने शिष्टाचार के साथ सड़क से ही आवाज देकर उस सुंदर घर के मालिक गिरीश कुमार जी को पुकारा। उन्होंने बेहद आत्मीयता से उनसे कहा कि ‘‘भाईसाहब, आपके घर के आंगन में खिले ये फूल बेहद खूबसूरत और आकर्षक हैं, क्या मैं यहां खड़े होकर इनके साथ अपनी एक तस्वीर ले सकती हूं?’’ बस, फिर क्या था, एक अनजाने राहगीर और एक पहाड़ी गृहस्थ के बीच गुलाब के उस फूल से शुरू हुई यह संक्षिप्त सी बातचीत धीरे-धीरे एक ऐसे गहरे संवाद में बदल गई, जिसने आगे चलकर गांव की दर्जनों महिलाओं की पूरी तकदीर और उनके जीने के ढंग को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

गिरीश कुमार इसी दुर्गम और छोटे से पहाड़ी गांव में स्थित प्रसिद्ध हिमालयन स्कूल में बतौर वार्डन अपनी सेवाएं देते हैं और बेहद सरल स्वभाव के धनी हैं। उर्वशी दत्त बाली से बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक ऐसा अनसुना और प्रेरक किस्सा साझा किया जिसे सुनकर कोई भी दंग रह सकता था, क्योंकि इस सुदूर गांव की रहने वाली साधारण महिलाओं का हुनर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक मजबूत और अमिट पहचान दर्ज करा चुका है। इस अद्भुत सफर की शुरुआत दरअसल कई साल पहले हुई थी, जब संयुक्त राज्य अमेरिका से कैथलीन नाम की एक विदेशी महिला इस शांत पहाड़ी इलाके की खूबसूरती को निहारने और यहां घूमने के उद्देश्य से इस गांव में आई थीं। कैथलीन जब गांव की संकरी गलियों से गुजर रही थीं, तो अचानक उनकी पारखी नजरें उन स्थानीय महिलाओं पर जाकर टिक गईं, जो सुबह-सुबह अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों को स्कूल छोड़ने आई थीं और बच्चों के कक्षाओं में चले जाने के बाद वापस घर लौटने के बजाय स्कूल की ही ठंडी सीढ़ियों पर बैठकर आपस में बातें करते हुए बेहद तन्मयता से ऊन की बुनाई कर रही थीं।
उन साधारण ग्रामीण महिलाओं के हाथों की अभूतपूर्व गति, रंगों के चयन और बुनाई की उस अनूठी कलात्मकता को देखकर कैथलीन के भीतर का कलाप्रेमी जाग उठा और उन्होंने बिना एक पल गंवाए सीधा उन महिलाओं के पास जाकर कौतूहलवश एक बड़ा ही सीधा और व्यावसायिक सवाल पूछ लिया। उन्होंने पूछा कि क्या आप सभी महिलाएं मेरे लिए बड़े पैमाने पर इसी तरह की पारंपरिक बुनाई का काम करना पसंद करेंगी? बस, यही वह ऐतिहासिक और निर्णायक मोड़ था जहां से चौकड़ी गांव की उन घरेलू और बेहद सीधी-सादी महिलाओं की जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ, जो अब तक केवल अपने बच्चों की उंगली थामकर उन्हें स्कूल पहुंचाने आती थीं और फिर घंटों बाहर बैठकर केवल समय काटने के लिए स्वेटर बुनती रहती थीं। उन सीढ़ियों पर बैठकर साधारण तरीके से चलाए जा रहे ऊन के कांटों पर जब एक विदेशी जोहरी की नजर पड़ी, तो देखते ही देखते वह छुपा हुआ घरेलू हुनर रातों-रात पहाड़ों की संकरी वादियों से बाहर निकलकर सीधे अमेरिका के आलीशान शोरूम्स तक का सफर तय करने के लिए उड़ान भर गया।

समय का चक्र बदलता गया और आज इस सराहनीय प्रयास के सुखद परिणाम यह हैं कि चौकड़ी गांव की लगभग 63 से अधिक ग्रामीण महिलाएं पूरी तरह से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सशक्त बनकर समाज में सिर उठाकर जी रही हैं। पिछले लगातार 14 वर्षों से यह मूक क्रांति बिना किसी बड़े शोर-शराबे के इस सुदूर पहाड़ी अंचल में निरंतर चल रही है और यह व्यवस्था बेहद सुचारू रूप से गांव की इन मेहनती महिलाओं द्वारा तैयार किए गए उच्च गुणवत्ता वाले ऊनी उत्पादों को सीधे अमेरिकी बाजारों तक सुरक्षित पहुंचा रही है। अब स्थिति यह हो चुकी है कि सात समंदर पार अमेरिका के बड़े-बड़े डिजाइनर्स और फैशन एक्सपर्ट्स अपनी पसंद के अनुसार आधुनिक डिजाइनों, पैटर्न्स और अंतरराष्ट्रीय रंगों के विशेष ऑर्डर और खाके सीधे इस गांव में भेजते हैं, जिसके आधार पर ये महिलाएं अपनी पारंपरिक कला को आधुनिकता में ढालकर बेहद खूबसूरत बुनाई तैयार करती हैं। इन ग्रामीण महिलाओं द्वारा दिन-रात की मेहनत से तैयार किए गए इन कलात्मक प्रोडक्ट्स पर जब पूरी प्रामाणिकता के साथ ब्रांड का टैग लगाया जाता है, तो उन्हें बड़े चाव से पैकिंग के बाद सीधे अमेरिका के विभिन्न राज्यों में निर्यात के लिए भेज दिया जाता है।
जो हुनर कभी उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की संकरी और धूलभरी गलियों में गुमनाम था या जो केवल स्कूल के बाहर बनी कंक्रीट की ठंडी सीढ़ियों तक ही सिमटकर दम तोड़ रहा था, आज वही हुनर विदेशी धरती पर बड़े-बड़े मंचों और संभ्रांत परिवारों में बेहद सम्मान के साथ सराहा और उपयोग किया जा रहा है। इस पूरी जमीनी और अंतरराष्ट्रीय पहल की सबसे अनूठी और खूबसूरत बात यह है कि इसने इन बेसहारा और कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को न केवल रोजगार का एक स्थायी साधन उपलब्ध कराया है, बल्कि उन्हें समाज में एक नया सम्मान, विशिष्ट पहचान और भीतर से कभी न डगमगाने वाला अटूट आत्मविश्वास भी प्रदान किया है। इस पूरे वृहद और जटिल कार्य तंत्र को बेहद कुशलता के साथ उत्तराखंड की ही मूल निवासी ममता टाकुली जी धरातल पर संभालती हैं, जो न केवल इन महिलाओं के काम का प्रबंधन करती हैं बल्कि समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों की मांग के अनुसार इन ऊनी उत्पादों की बेहतरीन और आकर्षक डिजाइनिंग का काम भी खुद अपनी देखरेख में पूरा करती हैं।
चौकड़ी गांव की इस अभूतपूर्व और प्रेरणादायक सफलता की गवाह बनीं उर्वशी दत्त बाली इस पूरी स्थिति का विश्लेषण करते हुए बेहद भावुक और गर्वित मन से कहती हैं कि यह केवल धागों और ऊन की साधारण बुनाई का कोई काम नहीं है, बल्कि यह तो इन महिलाओं के दबे हुए बड़े-बड़े सपनों और उनकी उम्मीदों को आपस में मजबूती से जोड़ने की एक जीवंत कहानी है। उन्होंने समाज के समृद्ध और समर्थ वर्ग के लोगों से बेहद मार्मिक अपील करते हुए कहा कि यदि जीवन की दौड़ में आगे बढ़ चुके और हर तरह से संपन्न लोग समाज के ऐसे हुनरमंद लेकिन उचित अवसरों से पूरी तरह वंचित लोगों का हाथ थाम लें, तो निश्चित तौर पर हमारे देश की न जाने कितनी ही जिंदगी रातों-रात पूरी तरह से बदल सकती हैं। उर्वशी दत्त बाली के इस अनुभव से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि असली मानवीय खुशी और जीवन की सार्थकता सिर्फ अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए आलीशान जिंदगी जीने में बिल्कुल नहीं है, बल्कि असली आनंद तो किसी और के डूबते हुए जीवन की पतवार बनने और किसी असहाय की उम्मीदों का सबसे बड़ा संबल बनने में छुपा हुआ है। सच ही कहा गया है कि अपने भीतर छिपे हुए हुनर और ज्ञान को दुनिया के साथ बांटने से वह कभी कम नहीं होता, बल्कि समय के साथ उसकी चमक और उसका दायरा और ज्यादा बढ़ता चला जाता है।





