रामनगर। जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क की परिधि से सटे रामनगर वन प्रभाग के भण्डारपानी गेट पर मंगलवार की सूर्योदय की पहली किरण के साथ ही माहौल में भारी तनाव और गहमागहमी का संचार हो गया, जब सीतावनी नेचर गाइड एसोसिएशन के बैनर तले बड़ी संख्या में स्थानीय नेचर गाइड अपने हक की आवाज बुलंद करने के लिए रणभेरी फूंकते हुए एकजुट हो गए। शांत वादियों में यह उबाल तब आया जब वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए स्थानीय गाइडों ने बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और विभाग पर नियम-विरुद्ध तरीके से दूसरे द्वारों के गाइडों को यहाँ थोपने का संगीन आरोप जड़ दिया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना था कि विभाग की यह मनमानी न केवल स्थापित परंपराओं का उल्लंघन है, बल्कि उन स्थानीय युवाओं के भविष्य और पेट पर भी लात मारने जैसा है जो वर्षों से अपनी पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ इस गेट पर सैलानियों को प्रकृति की खूबियों से रूबरू करा रहे हैं। भण्डारपानी गेट पर हुई इस अचानक हलचल ने न केवल वन प्रशासन के हाथ-पांव फुला दिए, बल्कि मौके पर मौजूद हर शख्स को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या विभागीय दबाव में स्थानीय अधिकारों की बलि दी जा रही है।
इस विवाद की जड़ें उस प्रशासनिक फैसले में निहित हैं, जिसके तहत बिना किसी विधिवत चयन प्रक्रिया या पारदर्शी नीति के, एक अन्य गेट के नेचर गाइड को अचानक भण्डारपानी गेट पर तैनात कर दिया गया, जिसे स्थानीय गाइडों ने सीधे तौर पर अपने वजूद पर हमला करार दिया है। प्रदर्शन के दौरान उमड़े आक्रोश ने उस वक्त एक अलग मोड़ ले लिया जब सफारी के रोमांच के लिए देश-विदेश से पहुंचे पर्यटकों ने भी गाइडों के इस दर्द को महसूस किया और उनके सुर में सुर मिलाते हुए वन विभाग की इस भेदभावपूर्ण नीति की सार्वजनिक आलोचना शुरू कर दी। सैलानियों का स्पष्ट मत था कि जो गाइड यहाँ के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं और जिनका जीवन इस जंगल की सुरक्षा और पर्यटन पर निर्भर है, उन्हें दरकिनार कर बाहरी व्यक्तियों को प्राथमिकता देना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। पर्यटकों की इस सहानुभूति ने स्थानीय गाइडों के हौसलों को और अधिक बल प्रदान किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह लड़ाई अब केवल एसोसिएशन की नहीं, बल्कि न्याय और निष्पक्षता की एक बड़ी मुहिम बन चुकी है।
सीतावनी नेचर गाइड एसोसिएशन ने इस पूरे प्रकरण को लेकर वन विभाग के आला अधिकारियों को जो पत्र प्रेषित किया है, उसमें सिलसिलेवार तरीके से अपनी शिकायतों और पूर्व में दी गई चेतावनियों का उल्लेख करते हुए विभाग की सुस्ती पर कड़े प्रहार किए गए हैं। एसोसिएशन का दावा है कि उन्होंने इस संवेदनशील मुद्दे पर सबसे पहले 7 मई 2026 को उप प्रभागीय वनाधिकारी रामनगर के समक्ष अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी अप्रिय टकराव को टाला जा सके और विभाग अपनी गलती सुधार ले। इसके पश्चात जब विभाग की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखी, तो उन्होंने पुनः 11 मई 2026 को प्रभागीय वनाधिकारी रामनगर और वन क्षेत्राधिकारी कोटा रेंज के दरवाजे खटखटाए और उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराते हुए शीघ्र समाधान की अपील की थी। लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों की कथित बेरुखी और “दबाव में काम करने की नीति” ने गाइडों को उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ उनके पास शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अलावा अपनी बात मनवाने का कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचा था।

भण्डारपानी गेट पर मंगलवार की सुबह हुआ यह प्रदर्शन बेहद अनुशासित और रणनीतिक था, जहाँ गाइडों ने अपनी नाराजगी जाहिर करने के साथ-साथ पर्यटन व्यवसाय की गरिमा का भी पूरा ख्याल रखा और यह सुनिश्चित किया कि सैलानियों को किसी प्रकार की असुविधा न हो। प्रदर्शनकारियों ने पूर्व निर्धारित योजना के तहत केवल आधे घंटे तक ही अपनी सांकेतिक नारेबाजी और एकजुटता का प्रदर्शन किया, ताकि जंगल सफारी की निर्धारित समय सारणी में कोई व्यवधान न आए और आगंतुक समय पर अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकें। हालांकि, इस संक्षिप्त विरोध के माध्यम से उन्होंने वन विभाग को यह स्पष्ट चेतावनी भी दे डाली कि उनकी शालीनता को कमजोरी समझने की भूल कतई न की जाए। पत्र के माध्यम से विभाग को आगाह किया गया है कि यदि इस अनैतिक नियुक्ति को तुरंत निरस्त नहीं किया गया और स्थानीय गाइडों की मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह आंदोलन उग्र रूप धारण कर सकता है, जिसकी संपूर्ण जवाबदेही केवल और केवल वन प्रशासन की होगी।
कॉर्बेट के प्रवेश द्वारों पर नेचर गाइडों की भूमिका मात्र एक मार्गदर्शक की नहीं, बल्कि वे जंगल के सजग प्रहरी और पर्यटकों के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं, ऐसे में भण्डारपानी गेट पर पनपा यह असंतोष पर्यटन के सुचारू संचालन के लिए एक खतरे की घंटी साबित हो सकता है। अब जनता और पर्यटन जगत के बीच यह बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि आखिर विभाग ने किन गुप्त मानकों या दबावों के चलते स्थापित नियमों को ताक पर रखकर दूसरे गेट के गाइड को यहाँ प्रतिनियुक्ति दी? क्या इसके पीछे कोई गहरा प्रशासनिक संरक्षण है या फिर यह केवल एक लापरवाही भरा निर्णय है जिसने वर्षों से सेवा दे रहे स्थानीय युवाओं के भीतर असुरक्षा की भावना भर दी है? विभाग की चुप्पी और अब तक हुई देरी ने शक की सुई को और गहरा कर दिया है, जिससे यह आभास हो रहा है कि आने वाले दिनों में भण्डारपानी गेट की यह चिंगारी पूरे रामनगर वन प्रभाग में एक बड़े विवाद की लपटें पैदा कर सकती है।
वर्तमान में स्थिति यह है कि स्थानीय नेचर गाइडों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और वे वन विभाग से एक ऐसी पारदर्शी एवं निष्पक्ष व्यवस्था की मांग कर रहे हैं जहाँ सिफारिश और दबाव के बजाय योग्यता और स्थानीय हक को प्राथमिकता दी जाए। भण्डारपानी गेट पर हुए इस सांकेतिक प्रदर्शन ने वन विभाग के गलियारों में खलबली तो मचा दी है, लेकिन सवाल वही बरकरार है कि क्या उच्चाधिकारी अपनी हटधर्मिता छोड़कर न्यायोचित समाधान निकालेंगे या फिर विवाद को और गहराने देंगे। जैसे-जैसे पर्यटन सीजन अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इस प्रकार के आंतरिक कलह का बढ़ना उत्तराखंड के पर्यटन की छवि के लिए घातक हो सकता है। अब सबकी निगाहें प्रभागीय वनाधिकारी रामनगर के अगले कदम पर टिकी हैं कि वे इस सुलगते मुद्दे को शांत करने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं, अन्यथा यह विरोध जल्द ही एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है जो शायद वन विभाग के नियंत्रण से बाहर हो जाए।





