काशीपुर। ऊधमसिंह नगर जनपद के काशीपुर क्षेत्र से एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है जिसने न केवल स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों की भी पोल खोलकर रख दी है। स्थानीय एलडी भट्ट उप जिला राजकीय चिकित्सालय, जो कि हजारों लोगों की उम्मीदों का केंद्र है, वहां से जीवनदायिनी ऑक्सीजन सिलिंडरों के रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया है। इस घटना के उजागर होने के बाद से ही अस्पताल प्रशासन में अफरा-तफरी का माहौल है और आनन-फानन में पुलिस को इस चोरी की सूचना दी गई है। हालांकि, चोरी हुए सिलिंडरों की वास्तविक संख्या को लेकर फिलहाल विरोधाभासी दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अस्पताल के भीतर से इतनी महत्वपूर्ण चिकित्सा सामग्री का चोरी होना अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही और लचर सुरक्षा व्यवस्था का जीता-जागता प्रमाण पेश कर रहा है। जैसे ही यह खबर शहर में फैली, आम जनता के बीच भी आक्रोश पनपने लगा है क्योंकि जिस संस्थान पर लोगों की जान बचाने का जिम्मा है, वह अपनी खुद की अमानत बचाने में भी पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।
अस्पताल के स्टोर रूम से ऑक्सीजन सिलिंडरों के गायब होने की सूचना ने विभाग के उच्चाधिकारियों के भी कान खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा और सरकारी संसाधनों की बर्बादी से जुड़ा हुआ है। सूत्रों की मानें तो अस्पताल के गोदाम से करीब 100 ऑक्सीजन सिलेंडर गायब होने की आशंका जताई जा रही है, जो यदि सच साबित होती है, तो यह प्रदेश की अब तक की सबसे बड़ी अस्पताल चोरियों में शुमार होगी। गौर करने वाली बात यह है कि अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) संदीप कुमार दीक्षित ने इस भारी संख्या के दावे की पुष्टि करने के बजाय इसे बहुत ही मामूली आंकने का प्रयास किया है, जिससे उनकी जिम्मेदारी पर सवाल उठ रहे हैं। उनका कहना है कि प्रारंभिक जांच में केवल 3 से 4 सिलिंडर ही चोरी हुए हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल प्रबंधन को अपने स्टॉक का सही अंदाजा भी नहीं है? इस पूरे प्रकरण में अज्ञात चोरों के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज करा दिया गया है, लेकिन स्टोर की चाबियां किसके पास थीं और सुरक्षा के नाम पर तैनात अमला उस वक्त कहां था, यह अब जांच का मुख्य बिंदु बन गया है।
हैरानी की बात यह है कि एलडी भट्ट अस्पताल में सुरक्षा में सेंधमारी का यह कोई पहला वाकया नहीं है, बल्कि इससे पहले भी यहां कई बार शातिर चोरों ने अपनी मर्जी से हाथ साफ किए हैं, लेकिन लगता है कि प्रबंधन ने अतीत की गलतियों से कोई सबक नहीं लिया। पूर्व में भी इस चिकित्सालय परिसर से दोपहिया वाहनों की चोरी और यहां तक कि एयर कंडीशनर (AC) जैसे भारी-भरकम उपकरणों का गायब होना यह सिद्ध करता है कि यहां सुरक्षा तंत्र के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती रही है। स्थानीय लोगों का तो यहां तक कहना है कि अस्पताल परिसर के इर्द-गिर्द अक्सर नशेड़ियों और संदिग्ध तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है, जो इस तरह की वारदातों को अंजाम देने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। अस्पताल प्रशासन की इस ढिलाई ने न केवल सरकारी खजाने को चोट पहुंचाई है, बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ा है जो जनता एक सरकारी संस्थान पर करती है। एक ऐसा स्थान जहां चौबीसों घंटे आवाजाही और सुरक्षा की निगरानी होनी चाहिए, वहां से सिलिंडर जैसे भारी सामान का आसानी से बाहर निकल जाना कहीं न कहीं मिलीभगत या घोर प्रशासनिक विफलता की ओर ही इशारा करता है।
इन गायब हुए सिलिंडरों की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये वही उपकरण थे जिन्होंने कोरोना काल की भीषण आपदा के समय अनगिनत जिंदगियों को संजीवनी देने का काम किया था। उस वक्त जब पूरा देश ऑक्सीजन की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था और इस अस्पताल के पास अपना खुद का ऑक्सीजन प्लांट भी नहीं था, तब विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और मानवतावादियों ने अपनी गाढ़ी कमाई से ये सिलिंडर अस्पताल को दान किए थे। अब जब अस्पताल में आधुनिक ऑक्सीजन प्लांट स्थापित हो चुका है और इन सिलिंडरों को आपातकालीन स्थिति के लिए गोदाम में सुरक्षित रखा गया था, तब प्रबंधन की लापरवाही के चलते ये चोरों के हवाले हो गए। दान में मिली इस अमानत के प्रति अस्पताल प्रबंधन की बेरुखी इस बात से भी झलकती है कि वे अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वास्तव में कितने सिलिंडर गोदाम में मौजूद थे और उनमें से कितने अब सुरक्षित बचे हैं। यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि उन संस्थाओं की भावनाओं का भी अपमान है जिन्होंने संकट की घड़ी में अस्पताल की मदद की थी।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) संदीप कुमार दीक्षित की भूमिका इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा संदेह और आलोचना के घेरे में है, क्योंकि उनके बयानों में स्पष्टता और गंभीरता का घोर अभाव नजर आ रहा है। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि उन्हें इस अस्पताल में कार्यभार संभाले हुए लगभग 6 से 7 महीने का समय बीत चुका है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अब तक सिलिंडरों की कुल संख्या या उनके रखरखाव की कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी। यह एक अस्पताल प्रमुख के रूप में उनकी कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है कि आधे साल से अधिक पद पर रहने के बाद भी वे अपने स्टोर के स्टॉक से अनभिज्ञ रहे और तभी जागे जब चोरी की घटना घट गई। हालांकि, अब वे बचाव की मुद्रा में नजर आ रहे हैं और पीआरडी जवान की तैनाती व सीसीटीवी कैमरों का हवाला दे रहे हैं, लेकिन यह सब ‘आग लगने पर कुआं खोदने’ जैसा ही प्रतीत होता है। पुलिस अब पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है और सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वास्तव में यह किसी बाहरी गिरोह का काम है या फिर अस्पताल के भीतर ही बैठे किसी ‘भेड़िए’ ने इस लूट को अंजाम दिया है।





