देहरादून।उत्तराखंड की हसीन वादियों में गर्मी की तपिश बढ़ने के साथ ही देवभूमि के जंगलों और रिहायशी इलाकों पर वनाग्नि और आगजनी का खतरा मंडराने लगा है, जिससे निपटने के लिए इस बार अग्निशमन विभाग ने अपनी कमर पूरी तरह कस ली है। अप्रैल की शुरुआत से लेकर जून के अंत तक चलने वाला यह ‘फायर सीजन’ विभाग के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता, क्योंकि इस दौरान न केवल तपते जंगलों की आग बुझानी होती है बल्कि शहरों में शॉर्ट सर्किट और गैस सिलेंडर फटने जैसी घटनाओं पर भी पैनी नजर रखनी पड़ती है। राज्य के अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा विभाग के सामने इस बार दोहरी चुनौती है क्योंकि एक तरफ वनाग्नि का तांडव रोकने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा और वीआईपी मूवमेंट्स के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखना अनिवार्य है। विभाग ने इस बार आधुनिक संसाधनों और नई रणनीतियों के साथ मैदान संभाला है ताकि रिहायशी इलाकों के साथ-साथ राज्य की बेशकीमती वन संपदा को भी खाक होने से बचाया जा सके। शासन स्तर पर हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद अब मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों की चोटी तक दमकल कर्मियों की मुस्तैदी दिखाई दे रही है, जो किसी भी आपात स्थिति में जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के लक्ष्य के साथ तैनात किए गए हैं।
वर्तमान समय में प्रदेश भर के सभी 13 जनपदों में फैले 33 अग्निशमन केंद्रों पर तैनात जांबाज कर्मी हाई अलर्ट पर हैं, क्योंकि गर्मियों की शुरुआत होते ही खेतों में खड़ी फसलों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आग लगने की खबरें तेजी से आने लगी हैं। विभाग की क्षमताओं का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में 43 छोटे फायर टेंडर, 91 बड़े फायर टेंडर और 40 अत्याधुनिक मोटर व्हीकल बैक पैक की विशाल फौज को मोर्चे पर लगाया गया है, जो संकरी गलियों से लेकर मुख्य मार्गों तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करेंगे। अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवा के उप निदेशक एसके राणा ने स्पष्ट किया है कि फॉरेस्ट फायर अब केवल वन विभाग का सिरदर्द नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रदेश की सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन चुका है। इसी समन्वय को बेहतर बनाने के लिए स्थानीय रेंजर्स, फॉरेस्ट चौकियों और फायर क्रू के साथ दमकल विभाग की लोकल टीमें लगातार संपर्क में हैं, ताकि जैसे ही जंगल की आग बेकाबू होने लगे, दमकल की गाड़ियां तुरंत रोड हेड तक पहुंचकर आग को आबादी वाले क्षेत्रों में घुसने से पहले ही रोक सकें। विभाग का प्राथमिक फोकस उन संवेदनशील इलाकों पर है जहां जंगलों के ठीक बगल में गांव या शहर बसे हुए हैं, ताकि किसी भी अनहोनी की स्थिति में जनहानि को टाला जा सके।

अग्निशमन विभाग के लिए वाहनों की पुरानी खस्ताहाल स्थिति एक बड़ी बाधा थी, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए 41 नए फायर टेंडर्स ने इस कमी को दूर कर विभाग के बेड़े को नई ऊर्जा और आधुनिकता प्रदान की है। स्क्रैप पॉलिसी के तहत 15 साल से पुराने कंडोम वाहनों को हटाना एक बड़ी चुनौती थी, मगर नई गाड़ियों के आने से विभाग अब दुर्गम क्षेत्रों में भी तेजी से पहुंचने में सक्षम हो गया है, जिससे फायर सीजन की जंग और आसान हो गई है। रिस्पांस टाइम को लेकर हुए सुधारों ने विभाग की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाया है, जहां पहले घटनास्थल तक पहुंचने में औसतन 30 मिनट का समय लगता था, वहीं अब हेल्पलाइन नंबर 112 और 101 के बेहतर समन्वय से यह समय घटकर 22 से 23 मिनट के बीच आ गया है। कहीं-कहीं तो यह जांबाज कर्मी सूचना मिलने के मात्र 5 मिनट के भीतर ही अपनी गाड़ियों के साथ मौके पर दस्तक दे रहे हैं, जो उनकी सक्रियता और कुशलता का प्रमाण है। ट्रैफिक और दूरी जैसी बाधाओं के बावजूद रिस्पांस टाइम को लगातार कम करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि आग को विकराल रूप धारण करने से पहले ही काबू किया जा सके, जिससे संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उत्तराखंड की जीवन रेखा मानी जाने वाली चारधाम यात्रा इस साल 19 अप्रैल से विधिवत शुरू हो चुकी है, जिसे देखते हुए अग्निशमन विभाग ने तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए एक विशेष और अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार किया है। विभाग ने यात्रा मार्गों पर कुल 17 संवेदनशील पॉइंट्स चिह्नित किए हैं, जहां दमकल की गाड़ियों और विशेष दमकल कर्मियों की अस्थाई तैनाती की गई है ताकि श्रद्धालुओं को आग की किसी भी दुर्घटना से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सके। विशेष रूप से देहरादून, हरिद्वार, टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग जैसे सात मुख्य जिलों पर विभाग की पैनी नजर है, क्योंकि यहीं से चारों धामों के मुख्य मार्ग गुजरते हैं और यहीं सबसे अधिक वीआईपी मूवमेंट भी होता है। इन यात्रा मार्गों पर न केवल बड़े और छोटे फायर टेंडर तैनात हैं, बल्कि 11 पंप यूनिट्स और 72 विशेष रूप से प्रशिक्षित फायर सर्विस ऑपरेशनल स्टाफ को तैनात किया गया है जो 24 घंटे मुस्तैद रहेंगे। इसके साथ ही, धामों में मौजूद सिविल हेलीपैड क्षेत्रों को भी अग्नि सुरक्षा के दायरे में कवर किया गया है, ताकि हवाई यात्रा के दौरान भी सुरक्षा के मानकों में कोई कोताही न रह जाए और पूरी यात्रा सुगम, सुरक्षित और निर्बाध रूप से संपन्न हो सके।

गर्मी के इस भीषण मौसम में असामाजिक तत्वों की हरकतों और रिहायशी इलाकों के करीब धधकती वनाग्नि के खतरों के बीच विभाग का नेतृत्व संभाल रहे एसके राणा और उनकी टीम के लिए आने वाले दो महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ उन हॉटस्पॉट्स पर विशेष निगरानी रखी जा रही है जहां आग लगने की संभावना सबसे अधिक रहती है, जिससे किसी भी आकस्मिक आगजनी की घटना को समय रहते दबाया जा सके। विभाग की रणनीति इस बार केवल आग बुझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि आग लगने के कारणों जैसे गैस रिसाव और अवैध कूड़ा जलाने जैसी गतिविधियों पर भी लगाम लगाने की है ताकि पर्यावरण और मानव जीवन दोनों को सुरक्षा दी जा सके। प्रदेश के सभी अग्निशमन अधिकारी यानी एफएसओ को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में पानी के स्रोतों और फायर हाइड्रेंट्स की उपलब्धता सुनिश्चित करें ताकि पानी की कमी के कारण आग बुझाने के काम में कोई रुकावट न आए। कुल मिलाकर, उत्तराखंड का अग्निशमन विभाग इस फायर सीजन में तकनीक, अनुभव और त्वरित रिस्पांस के तालमेल से आग के तांडव को मात देने के लिए पूरी तरह से तैयार नजर आ रहा है, जिससे देवभूमि सुरक्षित रह सके।





