देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों एक ऐसी हलचल मची है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, क्योंकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एक बार फिर अपने ‘धाकड़’ अंदाज में कोई बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय लेने की दहलीज पर खड़े नजर आ रहे हैं। प्रदेश सरकार ने आगामी 28 अप्रैल को उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र आहूत करने का जो फैसला लिया है, उसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है और हर कोई यह कयास लगा रहा है कि क्या इस सत्र के जरिए धामी सरकार महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मास्टरस्ट्रोक खेलने वाली है। यह पूरी कवायद उस दौर की याद दिलाती है जब साल 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण के भरारीसैंण में बजट सत्र के दौरान अचानक गैरसैंण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर सबको चौंका दिया था, और अब माना जा रहा है कि पुष्कर सिंह धामी भी उसी तर्ज पर महिला सशक्तिकरण को लेकर कोई ऐसी घोषणा कर सकते हैं जिसकी कल्पना शायद ही किसी विपक्षी दल ने की हो। विधानसभा के इस विशेष सत्र को लेकर जिस तरह की तैयारियां और गोपनीयता बरती जा रही है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सूबे के मुखिया अपनी कार्यशैली के अनुरूप जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा कड़ा फैसला लेंगे जो न केवल उत्तराखंड की महिलाओं के भाग्य को बदलेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा के पक्ष में एक मजबूत नैरेटिव सेट करने का काम करेगा।
सदन की कार्यवाही और इस विशेष सत्र की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि सरकार ने ‘नारी सम्मान: लोकतंत्र में अधिकार’ जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय को चर्चा के केंद्र में रखा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धामी सरकार का मुख्य एजेंडा महिलाओं को उनका वाजिब हक दिलाना ही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल के दिनों में जिस तरह से संसद के भीतर महिला आरक्षण बिल के मार्ग में उत्पन्न हुई बाधाओं पर अपना कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है, उससे उनकी मंशा साफ जाहिर होती है कि वह अब इस मामले में और अधिक प्रतीक्षा करने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि विपक्षी दलों और विशेषकर इंडिया गठबंधन ने तकनीकी खामियों और प्रक्रियात्मक बहानों की आड़ लेकर महिलाओं के हक को मारने का काम किया है, जिसे उत्तराखंड की धरती पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। धामी का मानना है कि जब तक महिलाओं को राजनीति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक उनका संघर्ष और उनकी सरकार के प्रयास निरंतर जारी रहेंगे, और यही कारण है कि 28 अप्रैल का यह सत्र उत्तराखंड की संसदीय परंपराओं में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। मुख्यमंत्री के इस तेवर ने विपक्ष की नींद उड़ा दी है क्योंकि उन्हें डर है कि धामी सरकार इस विशेष सत्र के माध्यम से महिलाओं के बीच अपनी पैठ और अधिक गहरी कर लेगी।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में महिला आरक्षण का मुद्दा हमेशा से एक भावनात्मक और न्यायसंगत मांग रही है, और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है ताकि विपक्ष के उस भ्रमजाल को तोड़ा जा सके जो परिसीमन और अन्य संवैधानिक अड़चनों के नाम पर फैलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंचों से यह साफ कर दिया है कि परिसीमन एक संवैधानिक दायित्व है जिसका उद्देश्य केवल जनसंख्या के अनुरूप न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने इसे एक राजनीतिक हथियार बनाकर बिल को लटकाने की साजिश रची है। उनके अनुसार, गृह मंत्री द्वारा संसद में दिए गए तार्किक स्पष्टीकरण के बावजूद विपक्ष का अड़ियल रवैया उनकी महिला विरोधी मानसिकता को दर्शाता है, और इसी का जवाब देने के लिए अब उत्तराखंड विधानसभा के मंच का उपयोग किया जाएगा। मुख्यमंत्री के आधिकारिक बयानों और पत्रावलियों की चाल को देखें तो राजभवन से अनुमोदन मिलते ही विधानसभा सचिवालय अपनी सक्रियता बढ़ा देगा, जिससे यह तय हो जाएगा कि इस एक दिवसीय सत्र में केवल और केवल नारी शक्ति के सम्मान और उनके अधिकारों पर गहन मंथन होगा। इस सत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि इसमें केवल निर्धारित विषय पर ही चर्चा की अनुमति होगी, जिससे सरकार को अपनी बात पुरजोर तरीके से रखने का पूरा अवसर मिलेगा।
दूसरी ओर, विपक्ष ने भी सरकार के इस दांव को भांपते हुए अपनी जवाबी रणनीति तैयार कर ली है, जिससे सत्र के दौरान सदन के भीतर तीखी नोकझोंक और जबरदस्त राजनीतिक टकराव होने की पूरी संभावना बनी हुई है। विपक्षी दल अब सरकार से यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि वह वास्तव में गंभीर है तो प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर तत्काल प्रभाव से 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का प्रावधान क्यों नहीं करती, और इसी मांग को लेकर वे सदन में सरकार को घेरने का मन बना चुके हैं। हालांकि, पुष्कर सिंह धामी की छवि एक ऐसे नेता की है जो दबाव में झुकने के बजाय जनहित में कड़े फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वह विपक्ष के हमलों का जवाब किस तरह के विधायी कार्यों से देते हैं। क्या सरकार केवल एक निंदा प्रस्ताव लाकर विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करेगी या फिर कोई ऐसा अध्यादेश या बिल पेश किया जाएगा जो उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य और ऐतिहासिक बना दे? जनता की नजरें अब विधानसभा के उस द्वार पर टिकी हैं जहां से धाकड़ धामी के एक और बड़े फैसले की गूंज निकलने वाली है, जो संभवतः आगामी चुनावों की दिशा और दशा भी तय करेगी।
उत्तराखंड की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं का योगदान हमेशा से सर्वोपरि रहा है, और शायद इसी जमीनी हकीकत को समझते हुए धामी सरकार ने दिल्ली की राजनीति के बजाय देहरादून की विधानसभा से एक बड़ा संदेश देने की योजना बनाई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह कदम न केवल उनकी अपनी लोकप्रियता को शिखर पर ले जाएगा, बल्कि बीजेपी के उस राष्ट्रव्यापी अभियान को भी बल देगा जिसमें वह खुद को महिलाओं का सच्चा हितैषी और विपक्ष को बाधक के रूप में पेश कर रही है। जिस तरह से मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर ‘झूठे तर्क’ गढ़ने का आरोप लगाया है, उससे यह साफ है कि 28 अप्रैल को सदन में तथ्यों और आंकड़ों की ऐसी लड़ाई देखने को मिलेगी जो आने वाले समय में उत्तराखंड की सियासत का मुख्य केंद्र बिंदु होगी। विशेष सत्र के लिए भेजी गई पत्रावली पर जैसे ही राज्यपाल की मुहर लगेगी, वैसे ही प्रदेश में महिला सशक्तिकरण के एक नए अध्याय की शुरुआत हो जाएगी, जिसमें धामी का नेतृत्व एक बार फिर उनके समर्थकों के बीच ‘धमाकेदार’ साबित होने वाला है। अब केवल कुछ दिनों का इंतजार है, जिसके बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या उत्तराखंड अपनी बेटियों को वह अधिकार देने में देश का नेतृत्व करेगा, जिसे लेकर केंद्र में खींचतान मची हुई है, या फिर यह सत्र केवल राजनीतिक बयानबाजी का एक अखाड़ा बनकर रह जाएगा।





