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कांग्रेस में अंगद का पैर बने नेताओं को दरकिनार कर गणेश गोदियाल ने सौंपी युवाओं को कमान

देवभूमि कांग्रेस में वर्षों से जमी राजनीतिक जड़ता हुई खत्म, गणेश गोदियाल के क्रांतिकारी मास्टरस्ट्रोक से सत्तर प्रतिशत नए और युवा चेहरों को मिली संगठन की कमान, पुराने दिग्गजों के सियासी वर्चस्व पर चली कैंची!

देहरादून। उत्तराखंड में इस बार कांग्रेस संगठनात्मक रूप से नए पैटर्न को चुनने की तरफ बढ़ रही है, जिसके चलते देवभूमि की सर्द वादियों में सियासी पारा एकाएक चढ़ गया है। पार्टी के भीतर दशकों से चली आ रही पारंपरिक कार्यशैली को तिलांजलि देते हुए अब एक ऐसे ऊर्जावान और साहसिक ढांचे को खड़ा किया जा रहा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने हालिया नियुक्तियों के जरिए यह स्पष्ट और कड़ा संदेश भेज दिया है कि अब संगठन में पदों का आधार केवल वर्षों की वफादारी या पुरानी पहचान नहीं, बल्कि सक्रियता और परफॉर्मेंस होगी। गणेश गोदियाल के दिशा-निर्देशन में पार्टी ने जो ‘सांगठनिक सर्जरी’ की है, उसने कई कद्दावर नेताओं के पैरों तले जमीन खिसका दी है। यह बदलाव केवल चेहरों का बदलाव नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक क्रांति है, जहाँ अनुभव की उन भारी बेड़ियों को तोड़ दिया गया है जिन्होंने लंबे समय से युवा जोश को आगे बढ़ने से रोक रखा था। अब कांग्रेस उस नए पैटर्न पर आगे निकल चुकी है, जहाँ जमीन पर पसीना बहाने वाले गुमनाम चेहरों को सीधे संगठन की मुख्यधारा में लाकर कमान सौंपी जा रही है।

हिमालयी राज्य की विशेष परिस्थितियों और आने वाले चुनावी रण को देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने जो नई बिसात बिछाई है, उसमें युवा शक्ति को सबसे बड़े और निर्णायक ‘गेम चेंजर’ के रूप में उतारा गया है। हाल ही में ब्लॉक और नगर अध्यक्षों की जो बहुप्रतीक्षित सूची जारी हुई, उसने इस बात पर अंतिम मुहर लगा दी है कि पार्टी अब ‘रिफ्रेश बटन’ दबाकर बिल्कुल नए रास्ते पर चलने को तैयार है। कुल 235 सांगठनिक पदों में से 197 पर नियुक्तियों का ऐलान हो चुका है, और माना जा रहा है कि शेष बचे पदों पर भी जल्द ही इसी तरह के चौंकाने वाले नाम सामने आएंगे। इस पूरी चयन प्रक्रिया में जिस सूक्ष्मता से नए और बेदाग चेहरों को चुना गया है, उसे उत्तराखंड की सियासत में एक ऐतिहासिक मिसाल माना जा रहा है। गणेश गोदियाल का यह मास्टरस्ट्रोक दरअसल आगामी चुनावों के लिए एक ऐसा ब्लूप्रिंट है, जिसमें संगठन की जड़ों को ‘न्यू ब्लड’ से सींचने का प्रयास किया गया है, ताकि उस सांगठनिक जड़ता को खत्म किया जा सके जो वर्षों से पार्टी के विकास में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई थी।

पार्टी के इस क्रांतिकारी कायाकल्प का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि लगभग 70 प्रतिशत नए चेहरों को जिम्मेदारी देकर शीर्ष नेतृत्व ने एक बड़ा राजनीतिक जोखिम मोल लिया है। यह भारी-भरकम आंकड़ा गवाह है कि कांग्रेस आलाकमान अब ‘स्टेटस को’ (यथास्थिति) को बनाए रखने के बजाय उसे पूरी तरह ध्वस्त करने के मूड में है। जिन कार्यकर्ताओं ने कभी सोचा भी नहीं था कि वे इतनी जल्दी निर्णायक पदों पर बैठेंगे, उन्हें सीधे ब्लॉक और नगर की बागडोर थमा दी गई है। इस सूची के सामने आते ही उन दिग्गजों के खेमे में सन्नाटा पसर गया है जो दशकों से इन पदों को अपनी जागीर समझकर बैठे थे। विशेष तौर पर 17 ऐसे बड़े और प्रभावशाली नामों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जो वर्षों से इन कुर्सियों पर काबिज थे। गणेश गोदियाल की इस कठोर रणनीति ने साफ कर दिया है कि संगठन में अब केवल सक्रियता और रिपोर्ट कार्ड ही चलेगा; सिफारिशों और पैरवी का पुराना दौर अब उत्तराखंड कांग्रेस के इतिहास का हिस्सा बन चुका है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्लॉक और नगर स्तर पर हुई यह बड़ी उठापटक दरअसल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के आगामी गठन का एक ‘ट्रेलर’ मात्र है। असली राजनीतिक धमाका तब होगा जब पीसीसी की नई और जंबो टीम का ऐलान किया जाएगा। कांग्रेस के भीतर इस समय अपनी जगह सुरक्षित करने के लिए भारी लॉबिंग और जद्दोजहद का दौर अपने चरम पर है। हर छोटा-बड़ा नेता गणेश गोदियाल और केंद्रीय नेतृत्व की नजरों में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। हालांकि, इतने व्यापक स्तर पर हुए फेरबदल के कारण पार्टी के भीतर असंतोष के सुर भी फूटने लगे हैं। जिन पुराने नेताओं के पर कतरे गए हैं, वे अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर रहे हैं। लेकिन प्रदेश नेतृत्व इस आंतरिक विरोध को एक ‘पॉजिटिव चेंज’ के तौर पर पेश कर रहा है, क्योंकि उनका तर्क है कि संगठन को जीवंत रखने के लिए पुरानी टहनियों की छंटनी और नई कोपलों को खिलने का अवसर देना संगठन के भविष्य के लिए अपरिहार्य है।

इस बदलते राजनीतिक घटनाक्रम पर अपनी राय रखते हुए कांग्रेस के कद्दावर नेता अमरेंद्र बिष्ट ने पार्टी के इस नए और आक्रामक रवैये का जोरदार ढंग से स्वागत किया है। अमरेंद्र बिष्ट का मानना है कि ब्लॉक स्तर की इस नई सूची ने निराश हो चुके कार्यकर्ताओं में उम्मीद और नई ऊर्जा का संचार किया है। उन्होंने मीडिया के माध्यम से यह भरोसा दिलाया कि जिन अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को इस बार सांगठनिक सूची में स्थान नहीं मिल सका है, उन्हें भुलाया नहीं जाएगा। पार्टी उनके लंबे राजनीतिक सफर और अनुभव का पूरा सम्मान करती है। अमरेंद्र बिष्ट ने यह संकेत भी दिया कि इन अनुभवी चेहरों की क्षमताओं का उपयोग पार्टी आने वाले समय में रणनीतिक जिम्मेदारियों और अन्य महत्वपूर्ण मंचों पर बड़े स्तर पर करने वाली है। उनके मुताबिक, कांग्रेस अब एक ऐसे ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर काम कर रही है, जहाँ युवाओं की बेखौफ रफ्तार और बुजुर्गों का गहरा तजुर्बा मिलकर पार्टी के विजय रथ को मंज़िल तक पहुँचाएंगे।

उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर चल रहा यह साहसिक प्रयोग आने वाले समय में पार्टी की पूरी दिशा और दशा को बदलने का सामर्थ्य रखता है। अब प्रदेश की जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पीसीसी के गठन में भी गणेश गोदियाल इसी ’70 प्रतिशत युवा’ वाले कड़े फार्मूले को बरकरार रखेंगे या फिर वहां उन्हें गुटीय संतुलन और वरिष्ठता का दबाव झेलना पड़ेगा। बदलाव की इस आंधी ने फिलहाल उत्तराखंड कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का विषय बना दिया है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो यह देश के अन्य राज्यों की कांग्रेस इकाइयों के लिए एक नजीर बन सकता है। फिलहाल, पूरी देवभूमि में कांग्रेस की इस नई, ऊर्जावान और आक्रामक कार्यशैली की गूंज सुनाई दे रही है, जिसने यह साबित कर दिया है कि पार्टी अब एक बिल्कुल नए तेवर और कलेवर के साथ मैदान-ए-जंग में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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