उत्तराखंड। प्रदेश के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में चल रही चारधाम राजमार्ग परियोजना को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। पर्यावरण, आपदा जोखिम और विकास के संतुलन को लेकर उठे सवालों के बीच देश के कुछ प्रमुख सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने केंद्र सरकार को एक विस्तृत पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। इस पत्र में आग्रह किया गया है कि उत्तरकाशी जिले में चारधाम राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत स्वीकृत दो विवादास्पद परियोजनाओं की वन मंजूरी को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और हाल ही में आई प्राकृतिक आपदाओं के आलोक में पूरे क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों की व्यापक समीक्षा कराई जाए। इस पहल में वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सदर-ए-रियासत करण सिंह, पूर्व सांसद रेवती रमन सिंह तथा संघ परिवार के विचारक केएन गोविंदाचार्य समेत कई सार्वजनिक हस्तियों ने अपनी चिंता दर्ज कराई है। इन सभी ने एक स्वर में कहा है कि हिमालय का यह नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पहले ही जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों के कारण गंभीर दबाव झेल रहा है, ऐसे में यदि संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई और वनों की सफाई जैसे कदम जारी रहे तो इसका परिणाम दीर्घकालिक और संभवतः अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति के रूप में सामने आ सकता है। पत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि उत्तराखंड का उत्तरी भाग, विशेष रूप से भागीरथी नदी घाटी का इलाका, भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत नाजुक है और यहां किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधि को अत्यंत सावधानी और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ही अनुमति दी जानी चाहिए। हाल के वर्षों में बार-बार सामने आई प्राकृतिक आपदाओं ने भी यह संकेत दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकती है।
चारधाम राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत आने वाले उत्तरकाशी क्षेत्र में जिन दो परियोजनाओं पर सवाल उठाए गए हैं, उनमें प्रमुख रूप से नेतला बाईपास से जुड़ा प्रस्ताव और झाला गांव के आसपास बड़े पैमाने पर होने वाली पेड़ों की कटाई शामिल है। पत्र लिखने वाले वरिष्ठ नेताओं ने कहा है कि यह क्षेत्र भागीरथी पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र यानी बीईएसजेड के अंतर्गत आता है, जिसे पहले ही विशेष संरक्षण की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधि को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरतना आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इन परियोजनाओं को बिना पुनर्मूल्यांकन के आगे बढ़ाया गया तो यह हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए ‘अपरिवर्तनीय पारिस्थितिक क्षति’ का कारण बन सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, नेतला ढलान को बाईपास करने के लिए हिना और टेकला गांवों के बीच एक नई सड़क प्रस्तावित की गई है, जो चारधाम मार्ग परियोजना का हिस्सा है। हालांकि, सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक उच्चस्तरीय समिति ने वर्ष 2020 में इस हिस्से में सड़क निर्माण को उचित नहीं बताया था और स्पष्ट रूप से सलाह दी थी कि इस खंड को परियोजना से बाहर रखा जाए। इसके बावजूद उत्तराखंड सरकार ने पिछले वर्ष इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी, जो उस समय और अधिक विवादास्पद हो गया जब कुछ ही सप्ताह बाद इसी क्षेत्र में धराली गांव में विनाशकारी बाढ़ की घटना सामने आई। इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और पर्यावरणीय जोखिमों के बीच संबंध को लेकर गंभीर चिंताएं फिर से जीवित कर दीं।
इसी संदर्भ में नेताओं द्वारा भेजे गए पत्र में अगस्त 2025 में हुई धराली बाढ़ का विशेष उल्लेख किया गया है, जिसने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया था। इस प्राकृतिक आपदा में भारी मात्रा में मलबा एक पहाड़ी नाले के जरिए बहकर सीधे भागीरथी नदी में जा गिरा, जिसके कारण धराली गांव का एक बड़ा हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। कई घरों और संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचा और स्थानीय लोगों को अपने जीवन और आजीविका पर गहरा संकट झेलना पड़ा। पत्र में कहा गया है कि यह घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय संतुलन से छेड़छाड़ के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि चारधाम परियोजना से जुड़े सभी निर्माण कार्यों को धराली बाढ़ के बाद उत्पन्न नई परिस्थितियों के संदर्भ में फिर से परखा जाए। पत्र में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं और हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में विकास परियोजनाओं को पुराने मानकों के आधार पर आगे बढ़ाना जोखिम भरा हो सकता है। नेताओं ने सरकार से आग्रह किया है कि बीईएसजेड में चल रहे और प्रस्तावित सभी कार्यों के लिए एक नया, व्यापक पर्यावरणीय और आपदा जोखिम मूल्यांकन कराया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति न हो।
पत्र के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, वे न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से चिंताजनक हैं बल्कि संवैधानिक और न्यायिक निर्देशों की भावना के भी विपरीत प्रतीत होती हैं। नेताओं का कहना है कि भागीरथी घाटी का इलाका लंबे समय से वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की नजर में अत्यंत संवेदनशील माना जाता रहा है, और इसीलिए इसे विशेष पर्यावरणीय सुरक्षा प्रदान की गई थी। इसके बावजूद यदि यहां बड़े पैमाने पर सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ी कटाई और वन क्षेत्र की सफाई जैसे कदम उठाए जाते हैं, तो यह उन सिद्धांतों के विपरीत होगा जिनके आधार पर इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया था। पत्र में कहा गया है कि ‘एहतियाती सिद्धांत’ के अनुसार यदि किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति की संभावना हो, तो वैज्ञानिक प्रमाणों की पूर्ण अनुपस्थिति के बावजूद भी उस गतिविधि को रोकने या पुनर्विचार करने की आवश्यकता होती है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है। नेताओं ने यह भी कहा कि धराली जैसी आपदाओं के बाद भी यदि निर्माण गतिविधियों में कोई बदलाव नहीं किया जाता, तो यह भविष्य में और भी बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह तत्काल प्रभाव से इन परियोजनाओं की समीक्षा कराए और जब तक नया पर्यावरणीय और आपदा जोखिम आकलन पूरा न हो जाए, तब तक विवादित निर्माण कार्यों को स्थगित रखा जाए।
इस मुद्दे ने इसलिए भी अधिक गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि जिन परियोजनाओं पर आपत्ति दर्ज कराई गई है, वे सीधे तौर पर भागीरथी पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र यानी बीईएसजेड के अंतर्गत आती हैं। यह इलाका हिमालय की उन घाटियों में शामिल है जिन्हें पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत नाजुक और संवेदनशील माना जाता है। लंबे समय से वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों द्वारा इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों को लेकर चेतावनी दी जाती रही है। इसके बावजूद चारधाम राजमार्ग परियोजना के अंतर्गत यहां सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई और नए मार्गों के निर्माण जैसी गतिविधियां लगातार जारी हैं। पत्र में कहा गया है कि नेतला बाईपास से जुड़ी प्रस्तावित सड़क परियोजना, जो हिना और टेकला गांवों के बीच से होकर गुजरने वाली है, इस संवेदनशील क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। यह प्रस्ताव मूल रूप से नेतला ढलान को बाईपास करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था, ताकि चारधाम यात्रा मार्ग को अधिक सुगम बनाया जा सके। लेकिन इस योजना को लेकर पहले भी कई विशेषज्ञों ने चिंता जताई थी। उनका कहना था कि इस क्षेत्र की भौगोलिक संरचना बेहद कमजोर है और यहां बड़े पैमाने पर खुदाई या निर्माण कार्य से भूस्खलन, भू-स्खलन और अन्य आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। यही कारण था कि सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति ने वर्ष 2020 में अपनी रिपोर्ट में इस खंड के निर्माण को उचित नहीं माना था और इसे परियोजना से बाहर रखने की सलाह दी थी।

इसके बावजूद परिस्थितियां उस समय और जटिल हो गईं जब उत्तराखंड सरकार ने पिछले वर्ष इस परियोजना को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। यह फैसला उस समय और भी अधिक विवादों में घिर गया जब कुछ ही सप्ताह बाद धराली क्षेत्र में विनाशकारी बाढ़ की घटना सामने आई। इस आपदा ने न केवल स्थानीय लोगों को गहरे संकट में डाल दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरणीय असंतुलन किस प्रकार अचानक और गंभीर आपदाओं का रूप ले सकता है। पत्र लिखने वाले नेताओं ने इस फैसले को अत्यंत चिंताजनक बताते हुए कहा है कि जब पहले ही विशेषज्ञ समिति इस निर्माण के खिलाफ राय दे चुकी थी और हाल की प्राकृतिक आपदाएं भी चेतावनी दे रही हैं, तो ऐसे में इस परियोजना को आगे बढ़ाना समझदारी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि विकास कार्यों को वैज्ञानिक सलाह और पर्यावरणीय चेतावनियों को दरकिनार करके आगे बढ़ाया जाएगा, तो इसका परिणाम केवल पर्यावरणीय क्षति तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि स्थानीय समुदायों की सुरक्षा और आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह नेतला बाईपास से जुड़ी मंजूरी को तत्काल प्रभाव से वापस ले और इस पूरे मामले की फिर से समीक्षा कराए, ताकि भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी से बचा जा सके।
पत्र में दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा झाला और भैरोंघाटी गांवों के बीच प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण परियोजना से जुड़ा है। इस परियोजना के तहत लगभग 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है, जिसे लेकर स्थानीय स्तर पर पहले से ही विरोध देखने को मिल रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परियोजनाएं केवल जंगलों को नुकसान नहीं पहुंचातीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित करती हैं। हिमालयी क्षेत्रों में वन केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे मिट्टी को बांधे रखने, जल स्रोतों को सुरक्षित रखने और भूस्खलन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जाती है, तो इससे भूमि की स्थिरता कमजोर हो सकती है और भारी वर्षा या भूकंपीय गतिविधियों के दौरान भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ सकता है। यही कारण है कि झाला और भैरोंघाटी क्षेत्र में प्रस्तावित वन कटाई को लेकर स्थानीय लोगों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पहले ही चिंता जताई थी। दिसंबर में जब उत्तराखंड सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी, तो उसके बाद क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए। स्थानीय समुदायों का कहना है कि विकास कार्यों के नाम पर यदि जंगलों को समाप्त कर दिया जाएगा, तो इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा बल्कि उनके पारंपरिक जीवन और आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
पत्र में इस पूरे मुद्दे को संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण से भी उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि जिन मंजूरियों को दिया गया है, वे न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से अनुचित हैं बल्कि वे उन संवैधानिक और न्यायिक आदेशों की भावना के भी विपरीत प्रतीत होती हैं जिनके आधार पर इस क्षेत्र को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया था। पत्र में इन मंजूरियों को ‘अवैध, अनुचित और बाध्यकारी संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक आदेशों का उल्लंघन’ बताते हुए कहा गया है कि यह निर्णय ‘एहतियाती सिद्धांत’ की मूल भावना के विपरीत है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति होने की संभावना हो, तो उस गतिविधि को रोकना या उसकी गहन समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है। नेताओं ने अपने पत्र में यह स्पष्ट किया है कि भागीरथी घाटी में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह सिद्धांत और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका कहना है कि धराली जैसी आपदाओं के बाद भी यदि सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई और वनों की कटाई जैसे कार्य जारी रहते हैं, तो यह सीधे तौर पर इस सिद्धांत का उल्लंघन होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह इस मुद्दे को केवल एक विकास परियोजना के रूप में न देखे, बल्कि इसे पर्यावरणीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के व्यापक दृष्टिकोण से समझे।
इसी संदर्भ में नेताओं ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि नेतला और झाला-जंगला से संबंधित परियोजनाओं को जिस प्रकार मंजूरी दी गई है, वह कई गंभीर सवाल खड़े करती है। उनका कहना है कि धराली जैसी हालिया आपदाओं के बावजूद यदि इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है, तो यह संकेत देता है कि आपदा जोखिम के पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है। पत्र में कहा गया है कि भागीरथी घाटी में सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ी कटाई और वनों की कटाई जैसी गतिविधियां यदि बिना नए वैज्ञानिक आकलन के जारी रहती हैं, तो इससे भविष्य में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक आपदाओं की संभावना बढ़ सकती है। नेताओं ने सरकार से अपील की है कि वह इन सभी परियोजनाओं को तुरंत रोककर एक स्वतंत्र और व्यापक अध्ययन कराए, जिसमें पर्यावरणीय प्रभाव, भूगर्भीय जोखिम और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का समुचित मूल्यांकन किया जाए। उनका कहना है कि यदि इस क्षेत्र में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो हिमालयी पारिस्थितिकी को होने वाली क्षति आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट का कारण बन सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए दीर्घकालिक दृष्टि से निर्णय ले और हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता दे।
इन मुद्दों को लेकर लिखे गए पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि हिमालयी क्षेत्र में विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर पिछले कुछ वर्षों से लगातार बहस चल रही है। चारधाम राजमार्ग परियोजना को जहां एक ओर धार्मिक पर्यटन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया जाता रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों ने बार-बार यह आशंका व्यक्त की है कि इस तरह के बड़े पैमाने के निर्माण कार्य हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि अब जब वरिष्ठ सार्वजनिक हस्तियों ने भी इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की है, तो यह बहस और अधिक व्यापक हो गई है। पत्र में कहा गया है कि भागीरथी घाटी केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र है जो हजारों लोगों के जीवन, जल स्रोतों और जैव विविधता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। इस घाटी में किसी भी प्रकार का बड़ा निर्माण कार्य केवल स्थानीय स्तर पर ही प्रभाव नहीं डालता, बल्कि उसका असर पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि विकास की योजनाओं को लागू करते समय पर्यावरणीय संतुलन और दीर्घकालिक जोखिमों को प्राथमिकता दी जाए। पत्र में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, अचानक आने वाली बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जो इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव से यह क्षेत्र पहले से अधिक संवेदनशील हो चुका है।

पत्र में जिन केंद्रीय मंत्रियों और अधिकारियों को संबोधित किया गया है, उनमें केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तराखंड वन विभाग के सचिव और सीमा सड़क संगठन के निदेशक शामिल हैं। नेताओं ने इन सभी से आग्रह किया है कि वे इस मामले को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में न देखें, बल्कि इसे राष्ट्रीय महत्व के पर्यावरणीय और आपदा प्रबंधन के मुद्दे के रूप में समझें। पत्र में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के दौरान यदि पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम मूल्यांकन नहीं किया जाता, तो इसके परिणाम दूरगामी और गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि धराली जैसी घटनाएं केवल स्थानीय आपदाएं नहीं होतीं, बल्कि वे पूरे क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता की ओर संकेत करती हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह बीईएसजेड के भीतर चल रहे और प्रस्तावित सभी कार्यों के लिए एक नए और व्यापक अध्ययन की व्यवस्था करे, जिसमें जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय स्थिरता और आपदा जोखिम के पहलुओं को विस्तार से शामिल किया जाए। नेताओं का मानना है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य में इस क्षेत्र में और भी गंभीर आपदाएं सामने आ सकती हैं, जिनसे न केवल पर्यावरण बल्कि हजारों लोगों की सुरक्षा और जीवन प्रभावित हो सकता है।
धराली में अगस्त 2025 में आई बाढ़ का उल्लेख करते हुए पत्र में कहा गया है कि इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संतुलन के बिगड़ने के खतरों को बेहद स्पष्ट रूप से सामने ला दिया है। इस आपदा के दौरान भारी मात्रा में मलबा एक पहाड़ी नाले के जरिए बहकर सीधे भागीरथी नदी में पहुंच गया था। परिणामस्वरूप धराली गांव का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया और कई परिवारों को अपने घर और संपत्ति का नुकसान झेलना पड़ा। स्थानीय लोगों के अनुसार यह घटना अचानक आई थी और कुछ ही घंटों में पूरे क्षेत्र का स्वरूप बदल गया। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में यदि बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई और जंगलों की सफाई होती है, तो इससे प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली प्रभावित होती है और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण है कि पत्र में इस त्रासदी को केवल एक प्राकृतिक घटना के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे विकास गतिविधियों और पर्यावरणीय जोखिमों के बीच संबंध के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता बताई गई है। नेताओं ने कहा है कि यदि धराली जैसी घटनाओं से सबक नहीं लिया गया और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्यों की समीक्षा नहीं की गई, तो भविष्य में इससे भी बड़ी त्रासदियां सामने आ सकती हैं।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि चारधाम परियोजना के कार्यान्वयन को लेकर पहले से ही कई बार पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना रहा है कि इस परियोजना के तहत कई स्थानों पर सड़क चौड़ीकरण और पहाड़ों की कटाई ऐसे क्षेत्रों में की जा रही है जो भौगोलिक रूप से अत्यंत अस्थिर हैं। इसके अलावा स्थानीय समुदायों ने भी यह चिंता व्यक्त की है कि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों से उनके पारंपरिक जीवन और प्राकृतिक संसाधनों पर असर पड़ रहा है। नेताओं ने अपने पत्र में इन सभी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कहा है कि सरकार को इस विषय पर एक संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे का विकास महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि इन परियोजनाओं को इस प्रकार लागू किया जाए कि पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसलिए उन्होंने सरकार से अपील की है कि बीईएसजेड में चल रहे और प्रस्तावित सभी निर्माण कार्यों की एक बार फिर से वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से समीक्षा की जाए और जब तक यह प्रक्रिया पूरी न हो जाए, तब तक विवादित परियोजनाओं को रोक कर रखा जाए।
हिमालयी क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच यह भी स्पष्ट किया गया है कि चारधाम राजमार्ग परियोजना को लेकर यह विरोध पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले भी कई बार पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और सामाजिक संगठनों ने इस परियोजना के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उनका कहना रहा है कि हिमालय की भौगोलिक संरचना अत्यंत संवेदनशील है और यहां किसी भी बड़े निर्माण कार्य को शुरू करने से पहले विस्तृत पर्यावरणीय अध्ययन और भूगर्भीय आकलन अनिवार्य होना चाहिए। पत्र लिखने वाले वरिष्ठ नेताओं ने भी इसी तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा है कि भागीरथी घाटी जैसे क्षेत्रों में विकास योजनाओं को केवल बुनियादी ढांचे के विस्तार के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यह क्षेत्र न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है बल्कि यह गंगा नदी के उद्गम क्षेत्र के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में यदि यहां पारिस्थितिक संतुलन को नुकसान पहुंचता है, तो उसका प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश के बड़े हिस्से में जल संसाधनों और पर्यावरणीय संतुलन पर भी पड़ सकता है। नेताओं का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को देखते हुए विकास योजनाओं को सावधानीपूर्वक लागू करना आवश्यक है, ताकि आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके।
पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन परियोजनाओं को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई है, वे केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं बल्कि कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से भी गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। नेताओं का कहना है कि यदि किसी क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित किया गया है, तो वहां विकास कार्यों की मंजूरी देते समय विशेष सावधानी बरतना सरकार की जिम्मेदारी होती है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि कई महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त महत्व दिए बिना ही निर्णय लिए गए हैं। पत्र में इन मंजूरियों को ‘अवैध, अनुचित और बाध्यकारी संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक आदेशों का उल्लंघन’ बताते हुए कहा गया है कि यह निर्णय उस ‘एहतियाती सिद्धांत’ के विपरीत है जिसे पर्यावरणीय नीति का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी गतिविधि से गंभीर या अपरिवर्तनीय पर्यावरणीय क्षति होने की संभावना हो, तो उस गतिविधि को रोकना या उसकी गहन समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है, भले ही उसके सभी वैज्ञानिक प्रमाण पूरी तरह उपलब्ध न हों। नेताओं का कहना है कि भागीरथी घाटी में मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह सिद्धांत और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यदि धराली जैसी आपदाओं के बाद भी निर्माण गतिविधियां बिना किसी बदलाव के जारी रहती हैं, तो यह न केवल पर्यावरणीय सुरक्षा के सिद्धांतों की अनदेखी होगी बल्कि भविष्य में और भी गंभीर संकट को जन्म दे सकती है।

इसी संदर्भ में पत्र में यह भी कहा गया है कि नेतला और झाला-जंगला से संबंधित परियोजनाओं को जिस प्रकार से मंजूरी दी गई है, वह कई स्तरों पर पुनर्विचार की मांग करती है। नेताओं का कहना है कि धराली बाढ़ के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यदि बड़े पैमाने पर सड़क चौड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई और वनों की कटाई जैसी गतिविधियां जारी रहती हैं, तो इससे भूस्खलन, अचानक आने वाली बाढ़ और अन्य आपदाओं की संभावना कई गुना बढ़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कार्यों को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है, लेकिन यह आवश्यक है कि उन्हें वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ही आगे बढ़ाया जाए। नेताओं ने सुझाव दिया है कि बीईएसजेड के भीतर चल रहे सभी निर्माण कार्यों के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की जाए, जो पूरे क्षेत्र का नया पर्यावरणीय और आपदा जोखिम मूल्यांकन करे। इस अध्ययन में भूगर्भीय स्थिरता, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, वन क्षेत्र की स्थिति और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए। इसके आधार पर ही यह तय किया जाना चाहिए कि कौन-सी परियोजनाएं सुरक्षित रूप से आगे बढ़ाई जा सकती हैं और किन्हें रोकना या संशोधित करना आवश्यक है।
अंततः पत्र के माध्यम से सरकार से यह अपील की गई है कि वह हिमालयी क्षेत्रों में विकास योजनाओं को लागू करते समय दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाए। नेताओं का कहना है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में पर्यटन और बुनियादी ढांचे का विकास निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इन योजनाओं के कारण पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा प्रभावित न हो। धराली जैसी घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संतुलन को नजरअंदाज करना कितनी बड़ी कीमत पर पड़ सकता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह चारधाम परियोजना से जुड़े विवादित हिस्सों की पुनः समीक्षा कराए, नेतला बाईपास और झाला क्षेत्र में प्रस्तावित वन कटाई जैसी मंजूरियों पर पुनर्विचार करे और जब तक नया पर्यावरणीय तथा आपदा जोखिम आकलन पूरा न हो जाए, तब तक इन परियोजनाओं को स्थगित रखे। नेताओं का मानना है कि यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो हिमालयी पारिस्थितिकी को होने वाली क्षति आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यही कारण है कि उन्होंने केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों से इस मुद्दे पर तुरंत और ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखते हुए हिमालय की संवेदनशील प्रकृति को सुरक्षित रखा जा सके।





