- विनोद भगत और सुनील कोठारी ने 2027 के लिए तय की उत्तराखंड के विकास की दिशा
- पहाड़ बचाओ और रोजगार लाओ के मुद्दे पर विनोद भगत ने छेड़ी बड़ी चुनावी बहस
- संपादक विनोद भगत ने 2027 चुनाव के लिए रोजगार और पलायन को बताया सबसे बड़ी चुनौती
काशीपुर। उत्तराखंड की राजनीति जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे यह सवाल और गहराता जा रहा है कि राज्य की जनता किन मुद्दों को प्राथमिकता देगी और किन आधारों पर अपने भविष्य का फैसला करेगी। लंबे समय से यह देखा गया है कि चुनावी विमर्श अक्सर भावनात्मक नारों, प्रतीकों और तात्कालिक राजनीतिक लाभ के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, लेकिन बदलते सामाजिक और आर्थिक हालात अब एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। देवभूमि कहे जाने वाले इस पहाड़ी राज्य में जनता का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगा है कि यदि आने वाले चुनावों में भी मूल समस्याओं को पीछे छोड़ दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने संकट और गहरा हो सकता है। पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन, खाली होते गांव, बंद होते स्कूल, जर्जर स्वास्थ्य सेवाएं और सीमित रोजगार के अवसरकृये सब अब केवल आंकड़े नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की सच्चाई बन चुके हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि 2027 का चुनाव भावनात्मक अपीलों से ऊपर उठकर जमीन से जुड़े ठोस मुद्दों पर केंद्रित हो। राज्य की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक बनावट को देखते हुए अब जनता यह चाहती है कि राजनीतिक दल प्रतीकों से नहीं, समाधान से बात करें। इसी पृष्ठभूमि में हिंदी दैनिक “सहर प्रजातंत्र के संपादक सुनील कोठारी” से “शब्ददूत के संपादक विनोद भगत” के साथ हुई एक विस्तृत बातचीत ने चुनावी मुद्दों को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया है, जिसमें साफ संकेत मिलता है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि दिशा परिवर्तन का चुनाव भी हो सकता है।
इस बातचीत के दौरान सबसे प्रमुख रूप से जिस विषय ने चर्चा को आकार दिया, वह था रोजगार और पलायन का सवाल। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहा पलायन अब केवल सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती बन चुका है। गांवों के गांव खाली हो रहे हैं, खेती उजड़ रही है और युवा बेहतर भविष्य की तलाश में मैदानों या दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। सुनील कोठारी का मानना है कि यदि सरकारें अब भी रोजगार को केंद्र में नहीं लाईं, तो पहाड़ों की आत्मा ही कमजोर पड़ जाएगी। स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था, कृषि और बागवानी से जुड़े उद्योग, हस्तशिल्प, दुग्ध उत्पादन और छोटे स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। युवाओं को केवल सरकारी नौकरी के सपने दिखाने के बजाय उन्हें स्थानीय संसाधनों से जोड़ने की नीति बनानी होगी। बातचीत में यह भी उभरकर सामने आया कि जब तक पहाड़ में सम्मानजनक आजीविका के अवसर नहीं होंगे, तब तक पलायन को रोका नहीं जा सकता। ऐसे में 2027 का चुनाव यदि वास्तव में बदलाव का माध्यम बनना चाहता है, तो रोजगार को उसका केंद्रीय मुद्दा बनाना ही होगा।
रोजगार के बाद जिस विषय पर सबसे ज्यादा चिंता व्यक्त की गई, वह शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति थी। बातचीत में यह साफ शब्दों में कहा गया कि पहाड़ी इलाकों में स्कूलों का बंद होना और अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी किसी भी सरकार की नीतिगत विफलता को दर्शाता है। आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम मात्र के हैं और गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को मीलों दूर ले जाना पड़ता है। शिक्षा की हालत भी इससे अलग नहीं है। बच्चों को बेहतर पढ़ाई के लिए या तो गांव छोड़ना पड़ता है या फिर अभिभावकों को मजबूरी में शहरों का रुख करना पड़ता है। विंदो भगत ने बातचीत के दौरान यह सवाल उठाया कि जब राज्य गठन का उद्देश्य ही पहाड़ के लोगों को बेहतर सुविधाएं देना था, तो फिर दशकों बाद भी बुनियादी सेवाएं क्यों अधूरी हैं। सुनील कोठारी ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि 2027 के चुनाव में यह तय करना जरूरी है कि हर ब्लॉक में सुसज्जित अस्पताल, प्रशिक्षित डॉक्टर, आधुनिक उपकरण और हर क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्राथमिकता मिले। यह मुद्दा किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे राज्य के भविष्य का है, जिसे अब टाला नहीं जा सकता।
इसी क्रम में बातचीत का रुख आधारभूत ढांचे की ओर मुड़ा, जहां सड़क, इंटरनेट और परिवहन की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए गए। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में कनेक्टिविटी केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन रेखा होती है। कई इलाकों में आज भी खराब सड़कें, सीमित सार्वजनिक परिवहन और कमजोर डिजिटल नेटवर्क विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। बातचीत में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि ऑल-वेदर रोड, सुरक्षित परिवहन व्यवस्था और तेज इंटरनेट कनेक्टिविटी अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यक बुनियादी ढांचा है। डिजिटल युग में जब शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक इंटरनेट के माध्यम से पहुंच संभव है, तब पहाड़ों को इससे वंचित रखना अन्याय के समान है। सुनील कोठारी ने कहा कि यदि सरकारें वास्तव में पहाड़ को मुख्यधारा से जोड़ना चाहती हैं, तो उन्हें कनेक्टिविटी को चुनावी वादे से निकालकर प्राथमिक नीति में बदलना होगा। 2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब भी मांगेगा कि विकास का लाभ आखिर किस हद तक पहाड़ तक पहुंचा है।
बातचीत के दौरान पर्यावरण और आपदा प्रबंधन का मुद्दा भी केंद्र में रहा, जिसने उत्तराखंड की राजनीति को बार-बार झकझोरा है। भूस्खलन, बादल फटना, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं अब असामान्य घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि हर साल की त्रासदी बन चुकी हैं। विनोद भगत ने बातचीत में यह सवाल उठाया कि क्या विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ ही इन आपदाओं की जड़ नहीं है। सुनील कोठारी ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड को एक संतुलित विकास मॉडल की जरूरत है, जहां सड़क, भवन और परियोजनाएं बनें, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। विनोद भगत ने कहा कि मजबूत आपदा प्रबंधन नीति, समय पर चेतावनी प्रणाली, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान को फिर से महत्व देना अब राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनना चाहिए। उनका मानना था कि यदि 2027 के चुनाव में पर्यावरण और पहाड़ बचाने का मुद्दा गंभीरता से नहीं उठाया गया, तो आने वाले वर्षों में राज्य को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पारदर्शिता और भ्रष्टाचार का सवाल भी बातचीत में प्रमुखता से उभरा। विनोद भगत ने कहा कि सरकारी योजनाएं कागजों में तो आकर्षक दिखती हैं, लेकिन उनका लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे, यह सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होने कहा कि जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता चाहती है। बातचीत में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि 2027 का चुनाव तभी सार्थक होगा, जब शासन व्यवस्था में ईमानदारी, जवाबदेही और भ्रष्टाचार पर सख्त नियंत्रण को वास्तविक मुद्दा बनाया जाए। सुनील कोठारी ने कहा कि जनता यह जानना चाहती है कि योजनाओं का पैसा कहां जा रहा है और उसका लाभ किसे मिल रहा है। यदि राजनीतिक दल इस सवाल का स्पष्ट जवाब देने में विफल रहते हैं, तो जनविश्वास टूटना तय है। ऐसे में यह चुनाव शासन की गुणवत्ता की भी परीक्षा होगा।
पूरी बातचीत का निष्कर्ष यही निकलकर सामने आया कि उत्तराखंड का 2027 विधानसभा चुनाव केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि राज्य की दिशा और दशा तय करने का अवसर है। विंदो भगत और सुनील कोठारी दोनों इस बात पर सहमत नजर आए कि जाति, भावनाओं और तात्कालिक मुद्दों से ऊपर उठकर यदि “रोजगार, विकास और पहाड़ बचाओ” जैसे विषयों को केंद्र में नहीं रखा गया, तो यह राज्य के साथ अन्याय होगा। जनता के सामने अब विकल्प साफ हैंकृया तो वह पुराने चुनावी विमर्श को स्वीकार करे, या फिर ठोस सवालों के आधार पर अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगे। यह चुनाव यह भी तय करेगा कि उत्तराखंड केवल धार्मिक और भावनात्मक पहचान तक सीमित रहेगा या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण के संतुलन के साथ एक मजबूत और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में आगे बढ़ेगा।





