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संसदीय मर्यादा की गिरती दीवारें और भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में शब्दों का अनथक महासंग्राम

सियासी दंगल में दम तोड़ता शालीन संवाद: क्या व्यक्तिगत आक्षेपों और भाषाई गिरावट की भेंट चढ़ जाएगी लोकतंत्र की गरिमा, या फिर से पुनर्जीवित होगा स्वस्थ वैचारिक विमर्श का वह गौरवशाली स्वर्ण युग?

भारत(सुनील कोठारी)। देश की राजनीतिक चेतना के केंद्र में स्थित भारतीय संसद को लोकतंत्र का सर्वाेच्च मंदिर कहा जाता है, जहाँ से न केवल कानूनों की रचना होती है, बल्कि राष्ट्र की दिशा और दशा भी तय होती है। इसी मंच से जनता की अपेक्षाएँ, आशाएँ और सरोकार स्वर पाते हैं। किंतु बीते कुछ वर्षों में संसद के भीतर जिस प्रकार की भाषा, लहजा और शब्द चयन सामने आया है, उसने लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता पर गंभीर बहस को जन्म दिया है। सदन की गरिमा, जो कभी मर्यादा और शालीनता की मिसाल मानी जाती थी, अब बार-बार कटु टिप्पणियों, व्यंग्यात्मक तंजों और व्यक्तिगत आक्षेपों की भेंट चढ़ती दिखाई देती है। संसद का उद्देश्य विचारों का टकराव होना चाहिए था, परंतु दुर्भाग्यवश अब वह कई बार व्यक्तियों के टकराव का अखाड़ा बनती प्रतीत होती है। इस बदलाव ने न केवल राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित किया है, बल्कि समाज के व्यापक मानस पर भी इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। जब सर्वाेच्च लोकतांत्रिक मंच पर संवाद का स्तर गिरता है, तो वह संकेत देता है कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी चोट पहुँच रही है।

लोकतंत्र की बुनियाद असहमति के सम्मान पर टिकी होती है, जहाँ भिन्न विचारों को सुना जाता है और तर्क के माध्यम से समाधान खोजा जाता है। किंतु वर्तमान परिदृश्य में यह संतुलन बिगड़ता हुआ प्रतीत हो रहा है। संसद में बहस का स्वर कई बार मुद्दों से हटकर व्यक्तियों की नीयत, चरित्र और मंशा पर केंद्रित हो जाता है। आरोप-प्रत्यारोप की इस राजनीति में तथ्य और तर्क पीछे छूट जाते हैं। परिणामस्वरूप, जनहित से जुड़े गंभीर प्रश्न कृ जैसे नीति निर्माण, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास कृ अपेक्षित गंभीरता से नहीं उठ पाते। जब सदन में तीखी और अमर्यादित भाषा का प्रयोग होता है, तो उसका सीधा संदेश जनता तक पहुँचता है कि राजनीतिक असहमति का उत्तर शालीन संवाद से नहीं, बल्कि आक्रामक वक्तव्यों से दिया जाना चाहिए। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि विचारों की टकराहट से ही नए रास्ते निकलते हैं, न कि व्यक्तिगत कटाक्षों से।

संसद में बोले गए शब्द केवल क्षणिक नहीं होते, वे समाज के लिए दिशा-सूचक भी बनते हैं। जनप्रतिनिधि अपने आचरण और भाषा से अनजाने ही एक मानक स्थापित करते हैं, जिसे आम नागरिक भी अपनाने लगते हैं। यही कारण है कि जब सदन के भीतर संयम टूटता है, तो बाहर समाज में भी संवाद की मर्यादा कमजोर पड़ने लगती है। सोशल मीडिया, सार्वजनिक मंचों और रोजमर्रा की बातचीत में बढ़ती कटुता इसी का प्रतिबिंब मानी जा सकती है। राजनीतिक ध्रुवीकरण धीरे-धीरे सामाजिक ध्रुवीकरण का रूप लेता जा रहा है, जहाँ विचारधाराओं के आधार पर रिश्ते और संवाद बिखरने लगे हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब राजनीति का स्तर गिरता है, तो समाज में विभाजन की रेखाएँ और गहरी होती चली जाती हैं। संसद में भाषा की गिरावट केवल राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है।

मीडिया की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में अनदेखी नहीं की जा सकती। चौबीसों घंटे की खबरों की होड़ और त्वरित वायरल संस्कृति ने राजनीतिक वक्तव्यों की प्रकृति को बदल दिया है। गंभीर, तथ्यपरक और संतुलित भाषणों की तुलना में तीखे, उत्तेजक और सनसनीखेज बयान अधिक सुर्खियाँ बटोरते हैं। परिणामस्वरूप, कई नेता भी अनजाने में या रणनीतिक रूप से ऐसे शब्दों का चयन करने लगते हैं, जो तत्काल ध्यान आकर्षित करें, भले ही उससे संसदीय गरिमा को ठेस पहुँचे। इस प्रवृत्ति ने राजनीति के विमर्श को सतही बना दिया है, जहाँ दीर्घकालिक नीतिगत चर्चा की जगह क्षणिक बयानबाजी ने ले ली है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दे, जिन पर गहन और गंभीर बहस की आवश्यकता है, अक्सर इस शोरगुल में दबकर रह जाते हैं। लोकतंत्र का उद्देश्य यदि जनकल्याण है, तो संवाद का यह स्तर निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

नेताओं का आचरण हमेशा से समाज के लिए आदर्श माना गया है। जब संसद में बैठे प्रतिनिधि संयम, शालीनता और मर्यादा का परिचय देते हैं, तो वह समाज में भी सकारात्मक संदेश भेजता है। इसके विपरीत, जब वही प्रतिनिधि कठोर शब्दों और व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेते हैं, तो आमजन से संयम की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है। लोकतंत्र केवल चुनावी जीत या हार तक सीमित नहीं है; यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें संवाद, सहमति और सम्मान की संस्कृति को जीवित रखना आवश्यक है। संसद की कार्यवाही में भाषा और व्यवहार का स्तर जितना ऊँचा होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति फिर से मुद्दा-केंद्रित हो, जहाँ वैचारिक मतभेदों को सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जाए और असहमति को शत्रुता में न बदला जाए।

समाधान की राह आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं है। सबसे पहले राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए भाषा की मर्यादा तोड़ना दीर्घकाल में लोकतंत्र को कमजोर करता है। संसद की कार्यवाही में स्थापित आचार संहिता का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि बहस का स्तर व्यक्तिगत आरोपों से ऊपर उठ सके। सदन की अध्यक्षता करने वालों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही अनुशासन और गरिमा के संरक्षक होते हैं। साथ ही, नागरिक समाज और मतदाताओं को भी यह संकेत देना होगा कि वे मर्यादित भाषा और सकारात्मक राजनीति को ही समर्थन देंगे। जब जनता ऐसे व्यवहार को अस्वीकार करेगी, तभी राजनीति में भी बदलाव की संभावना बनेगी। लोकतंत्र की मजबूती संसद की गरिमा से जुड़ी है, और संसद की गरिमा उसके भीतर बोले जाने वाले शब्दों से तय होती है।

राजनीतिक आचरण और सार्वजनिक भाषा के बीच का संबंध जितना गहरा है, उतना ही उसका प्रभाव भी व्यापक होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि वह वह स्थान भी है जहाँ से समाज को नैतिक संकेत मिलते हैं। जब सदन के भीतर संवाद का स्तर गिरता है, तो उसका असर केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह आम नागरिक के व्यवहार, सोच और बोलचाल में भी परिलक्षित होने लगता है। भारतीय संसद में बोले गए शब्द दूर-दराज़ के गाँवों से लेकर महानगरों तक सुने और देखे जाते हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधियों की भाषा एक तरह से सामाजिक संवाद की दिशा तय करती है। यदि संसद में कटुता, व्यंग्य और व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी सामान्य हो जाए, तो समाज में भी वही प्रवृत्ति वैध मानी जाने लगती है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए इसलिए खतरनाक है, क्योंकि संवाद की जगह टकराव और असहमति की जगह असहिष्णुता पनपने लगती है।

आज यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि राजनीतिक बहसें विचारधाराओं की तुलना में व्यक्तियों के इर्द-गिर्द अधिक घूमने लगी हैं। मुद्दों की गंभीर विवेचना के बजाय आरोपों और प्रत्यारोपों का सिलसिला हावी रहता है। संसद में जब इस प्रकार की बहसें होती हैं, तो वे अक्सर मीडिया की सुर्खियों में तो आ जाती हैं, लेकिन जनहित से जुड़े प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। रोजगार के अवसर, शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और महंगाई जैसी समस्याएँ, जिनका सीधा संबंध आम आदमी के जीवन से है, अपेक्षित ध्यान नहीं पा पातीं। इसका परिणाम यह होता है कि जनता के मन में राजनीति के प्रति निराशा और अविश्वास बढ़ने लगता है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिकों को यह विश्वास हो कि उनके प्रतिनिधि संसद में उनकी वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता दे रहे हैं, न कि केवल एक-दूसरे पर शब्द-बाण चलाने में समय गंवा रहे हैं।

सामाजिक स्तर पर इस प्रवृत्ति के प्रभाव और भी चिंताजनक हैं। जब राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी बढ़ती है, तो समाज भी वैचारिक खेमों में बँटने लगता है। असहमति को सम्मान देने की परंपरा कमजोर पड़ती है और “हम” बनाम “वे” की मानसिकता मजबूत होने लगती है। सोशल मीडिया इस प्रक्रिया को और तेज कर देता है, जहाँ अधूरे संदर्भों में दिए गए बयान वायरल होकर भावनाओं को भड़काते हैं। संसद में कही गई कठोर बातें जब डिजिटल मंचों पर पहुँचती हैं, तो वे कई गुना अधिक तीव्र रूप में समाज के सामने आती हैं। इससे संवाद की संस्कृति को गहरी चोट पहुँचती है और आपसी विश्वास में दरार पड़ने लगती है। इतिहास बताता है कि जब राजनीति समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने लगे, तो उसके दूरगामी परिणाम होते हैं, जिनसे उबरने में वर्षों लग जाते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि राजनीति में भाषा का स्तर केवल व्यक्तिगत स्वभाव का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी बन चुका है। त्वरित लोकप्रियता और मीडिया कवरेज की चाह में कई बार ऐसे शब्दों का चयन किया जाता है, जो भावनाओं को उकसाएँ और तत्काल प्रतिक्रिया उत्पन्न करें। गंभीर और संतुलित वक्तव्य अक्सर इस शोर में दब जाते हैं। इससे राजनीति का स्वरूप धीरे-धीरे नीतिगत विमर्श से हटकर प्रदर्शनकारी बयानबाजी की ओर झुकता चला जाता है। लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति इसलिए घातक है, क्योंकि नीति निर्माण के लिए धैर्य, अध्ययन और संवाद की आवश्यकता होती है, न कि उत्तेजना और जल्दबाजी की। संसद यदि केवल नाटकीय बहसों का मंच बन जाए, तो उसकी मूल भूमिका कमजोर पड़ जाती है।

फिर भी, इस स्थिति को अपरिवर्तनीय मान लेना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र की खूबी यही है कि उसमें आत्मसुधार की क्षमता निहित होती है। यदि राजनीतिक दल और उनके नेता यह समझ लें कि भाषा की मर्यादा बनाए रखना दीर्घकाल में उनके ही हित में है, तो बदलाव संभव है। संसद की कार्यवाही के दौरान स्थापित नियमों और परंपराओं का सम्मान करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। साथ ही, मीडिया और नागरिक समाज की भी भूमिका महत्वपूर्ण है कि वे मुद्दा-आधारित राजनीति को प्रोत्साहित करें और केवल सनसनीखेज वक्तव्यों को महत्व न दें। जब जनता ऐसे व्यवहार को स्वीकार करना बंद करेगी, तब राजनीति को भी अपनी दिशा बदलनी पड़ेगी। लोकतंत्र की सेहत संसद की गरिमा से जुड़ी है, और उस गरिमा की रक्षा सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की दीर्घायु केवल संवैधानिक प्रावधानों से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उसके संचालन में दिखाई देने वाले आचरण, भाषा और दृष्टिकोण से भी तय होती है। जब किसी देश की भारतीय संसद में संवाद का स्तर संतुलित, तथ्यपूर्ण और मर्यादित होता है, तो वह लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करता है। इसके विपरीत, यदि वही मंच कटु वाणी और व्यक्तिगत हमलों से भर जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है। यह समझना आवश्यक है कि संसद में बोले गए शब्द केवल उस क्षण तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल बनते हैं। आज के राजनीतिक वक्तव्य कल के सामाजिक व्यवहार का आधार बन सकते हैं। इसलिए यह प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का भी है। यदि सदन के भीतर ही संयम और शिष्टाचार कमजोर पड़ेंगे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने की बात केवल कागज़ी आदर्श बनकर रह जाएगी।

भविष्य की ओर देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि भाषा और व्यवहार में सुधार के बिना राजनीति में गुणात्मक परिवर्तन संभव नहीं है। समाधान किसी एक व्यक्ति या दल के हाथ में नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति में निहित है। सभी दलों को यह स्वीकार करना होगा कि तीखी बयानबाजी से भले ही तात्कालिक सुर्खियाँ मिल जाएँ, लेकिन इससे जनता का विश्वास धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। संसद की कार्यवाही में नियमों और परंपराओं का पालन केवल औपचारिक अनुशासन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का संरक्षण है। सदन की अध्यक्षता करने वालों की भूमिका यहाँ निर्णायक हो जाती है, क्योंकि वही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि बहस मुद्दों पर केंद्रित रहे, न कि व्यक्तियों पर। साथ ही, राजनीतिक नेतृत्व को भी यह आत्मचिंतन करना होगा कि वे किस प्रकार की राजनीति को विरासत में छोड़ना चाहते हैं कृ संवाद की या टकराव की।

नागरिकों की भूमिका भी इस पूरे विमर्श में कम महत्वपूर्ण नहीं है। लोकतंत्र में जनता केवल दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी होती है। यदि मतदाता केवल उत्तेजक भाषणों और तीखे आरोपों से प्रभावित होंगे, तो राजनीति भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगी। लेकिन यदि समाज यह स्पष्ट संकेत दे कि उसे मर्यादित, तथ्यपूर्ण और समाधान-उन्मुख राजनीति चाहिए, तो दलों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। मीडिया, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, उसकी जिम्मेदारी भी यहीं से जुड़ती है। यदि समाचार माध्यम गंभीर विमर्श और जनहित के मुद्दों को प्रमुखता देंगे, तो राजनीतिक संवाद का स्तर अपने आप ऊपर उठेगा। इसके उलट, केवल सनसनीखेज बयानों को उभारने से राजनीति की सतही प्रवृत्तियाँ और मजबूत होंगी।

अंततः लोकतंत्र किसी एक संस्था या व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक साझा संस्कृति है, जिसे निरंतर पोषित करना पड़ता है। संसद की गरिमा, नेताओं की भाषा और समाज का संवाद कृ ये तीनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि संसद में मर्यादा सुरक्षित रहेगी, तो समाज में भी सौहार्द और विश्वास की भावना मजबूत होगी। राजनीति का स्तर जितना ऊँचा होगा, राष्ट्र की दिशा उतनी ही स्थिर और सकारात्मक होगी। आज की चुनौती यही है कि विचारों की टकराहट को स्वस्थ बहस में बदला जाए और असहमति को सम्मान के साथ स्वीकार किया जाए। तभी लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत मूल्य बनकर आगे बढ़ सकेगा, जो आने वाली पीढ़ियों को भी संवाद, सहमति और सम्मान का मार्ग दिखा सके।

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