रामनगर/हल्द्वानी। वन क्षेत्रों में बीते कुछ दिनों से पसरे भय और तनाव के माहौल का अंत आखिरकार मंगलवार देर रात उस समय हुआ, जब रामनगर वन प्रभाग की फतेहपुर रेंज में आदमखोर बाघ को वन विभाग की टीम ने सफलतापूर्वक ट्रैंक्विलाइज कर काबू में कर लिया। लगातार दो महिलाओं की जान लेने वाली इस घटना ने पूरे नैनीताल जिले को दहला दिया था। गांवों में दहशत इस कदर बढ़ गई थी कि लोग जंगल की ओर जाने से कतराने लगे थे और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी समूह में निकलने को मजबूर थे। वन विभाग पर दबाव लगातार बढ़ रहा था, वहीं ग्रामीणों का गुस्सा भी खुलकर सामने आने लगा था। इसी पृष्ठभूमि में मंगलवार रात की यह कार्रवाई प्रशासन और ग्रामीणों दोनों के लिए राहत लेकर आई। देर रात जैसे ही बाघ के पकड़े जाने की सूचना फैली, इलाके में भय के साथ-साथ सुकून की भावना भी देखने को मिली।
घटना की जड़ बीते सप्ताह हल्द्वानी के कटघरिया क्षेत्र के पनियाली जंगल में सामने आई थी, जब घास लेने गई कमला फर्त्याल संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थीं। रोज़ की तरह जंगल गई महिला के देर शाम तक वापस न लौटने पर परिजनों को अनहोनी की आशंका हुई। पहले उन्होंने स्वयं तलाश शुरू की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो मामले की जानकारी वन विभाग और मुखानी थाना पुलिस को दी गई। सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया और वन कर्मियों, पुलिस तथा स्थानीय लोगों की संयुक्त टीम ने जंगल में सघन तलाशी अभियान चलाया। खोज के दौरान जंगल के भीतर खून के धब्बे और महिला के कपड़े मिलने से आशंकाएँ और गहरी हो गईं। अंततः करीब दो किलोमीटर अंदर जंगल से महिला का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया।
इस दर्दनाक घटना से पहले भी फतेहपुर रेंज के गांधी आश्रम क्षेत्र में इसी तरह की एक और वारदात हो चुकी थी। वहां घास लेने गई एक अन्य महिला को भी बाघ ने अपना शिकार बना लिया था। लगातार दूसरी घटना सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि क्षेत्र में सक्रिय बाघ मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। ग्रामीणों में भय के साथ-साथ आक्रोश भी बढ़ने लगा था। लोग वन विभाग से ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे थे। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने जंगल में जाने से इनकार कर दिया, जिससे पशुपालन और घरेलू आवश्यकताओं पर भी असर पड़ने लगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई और बाघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन झोंक दिए गए।
वन विभाग की ओर से बाघ को पकड़ने के लिए व्यापक रणनीति तैयार की गई। फतेहपुर रेंज के पीपल पोखरा से लेकर पनियाली तक के इलाके में 85 ट्रैप कैमरे लगाए गए, ताकि बाघ की हर गतिविधि रिकॉर्ड की जा सके। इसके साथ ही पांच पिंजरे भी विभिन्न संभावित मार्गों पर लगाए गए। लगभग 60 कर्मचारियों की टीम को अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया गया और दो मचान भी तैयार किए गए, जहां से लगातार निगरानी की जा सके। यह पूरा अभियान दिन-रात चल रहा था। हर हलचल पर नजर रखी जा रही थी, क्योंकि एक छोटी सी चूक किसी और जान को खतरे में डाल सकती थी। गांवों में लगातार मुनादी कर लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही थी, ताकि कोई भी व्यक्ति अकेले जंगल की ओर न जाए।
मंगलवार देर रात लगभग 10 बजे टीम को आखिरकार बाघ की मूवमेंट दिखाई दी। जैसे ही यह सूचना मिली, पूरी टीम अलर्ट मोड पर आ गई। कॉर्बेट रिजर्व टाइगर के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर दुष्यंत शर्मा को तुरंत मौके पर बुलाया गया। करीब 30 मीटर की दूरी से ट्रैंक्विलाइज गन के जरिए सटीक निशाना साधा गया। कुछ ही पलों में दवा का असर दिखने लगा और बाघ झाड़ियों में जाकर गिर पड़ा। इसके बाद वन विभाग की टीम ने पूरी सावधानी के साथ उसे ढूंढकर सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू कर लिया। यह क्षण वन विभाग के लिए बड़ी सफलता था, क्योंकि लंबे समय से चला आ रहा भय का साया हटने लगा था। ग्रामीणों ने भी राहत की सांस ली, हालांकि प्रशासन ने अभी पूरी सतर्कता बरतने की बात कही है।

इस पूरे घटनाक्रम पर रामनगर वन प्रभाग के डीएफओ ध्रुव मर्ताेलिया ने बताया कि पकड़े गए बाघ का डीएनए परीक्षण कराया जा रहा है। जांच के बाद ही यह पुष्टि हो सकेगी कि यही वही बाघ है, जिसने दोनों महिलाओं को अपना शिकार बनाया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक क्षेत्र में सतर्कता बनाए रखी जाएगी और ग्रामीणों से सावधानी बरतने की अपील जारी रहेगी। वहीं कुमाऊं के मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. साकेत बडोला ने जानकारी दी कि पकड़ा गया बाघ नर है और उसकी उम्र लगभग पांच से सात वर्ष के बीच आंकी गई है। बाघ को रेस्क्यू सेंटर भेजा जा रहा है, जहां आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
फतेहपुर रेंज में हुई इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया था कि जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों की दिनचर्या कितनी असुरक्षित होती जा रही है। ग्रामीण महिलाओं के लिए घास और लकड़ी लाने जंगल जाना वर्षों से जीवन का हिस्सा रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं के बाद यही रोज़मर्रा का काम मौत का खतरा बन गया। 12 फरवरी की सुबह पीपल पोखरी क्षेत्र की रहने वाली गंगा देवी अपनी बहू और पड़ोस की एक अन्य महिला के साथ जंगल गई थीं। तीनों महिलाएँ रोज़ की तरह घास काट रही थीं, तभी अचानक झाड़ियों से निकले बाघ ने गंगा देवी पर हमला कर दिया। प्रत्यक्षदर्शी महिलाओं के अनुसार सब कुछ कुछ ही पलों में हुआ और संभलने का मौका भी नहीं मिला। बाघ महिला को जबड़े में दबाकर घसीटते हुए जंगल के भीतर ले गया। चीख-पुकार सुनकर आसपास मौजूद महिलाएँ भयभीत होकर गांव की ओर भागीं और लोगों को घटना की जानकारी दी। यह खबर फैलते ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और ग्रामीणों ने तत्काल वन विभाग और पुलिस प्रशासन को सूचना दी।
सूचना मिलते ही वन विभाग, पुलिस और ग्रामीणों की संयुक्त टीम ने जंगल में बड़े स्तर पर तलाशी अभियान शुरू किया। कई घंटों की खोजबीन के बाद करीब तीन किलोमीटर अंदर जंगल में गंगा देवी का शव मिला, जो बुरी तरह क्षत-विक्षत अवस्था में था। इस दृश्य ने न केवल परिजनों को तोड़कर रख दिया, बल्कि पूरे क्षेत्र को दहला दिया। लोग समझ गए थे कि जंगल में सक्रिय बाघ अब इंसानों को अपना शिकार बनाने लगा है। पहली घटना के बाद भी भय का माहौल था, लेकिन जब 25 फरवरी को दूसरी वारदात सामने आई, तो लोगों का डर गुस्से में बदलने लगा। फतेहपुर रेंज में रहने वाले ग्रामीणों ने खुलकर वन विभाग से जवाबदेही की मांग शुरू कर दी। कई गांवों में बैठकों का दौर चला और यह सवाल उठने लगा कि आखिर कब तक ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर जीवन यापन करते रहेंगे।
दूसरी घटना में कमला नाम की महिला रोज़ की तरह जंगल में घास लेने गई थीं। जब शाम तक वह घर नहीं लौटीं, तो परिजनों को चिंता हुई। पहले तो उन्होंने आस-पास खोजबीन की, लेकिन जब जंगल में महिला की दराती और कपड़े मिले, तो अनहोनी की आशंका पुख्ता हो गई। इसके बाद तुरंत वन विभाग और मुखानी थाना पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची टीम ने रात भर जंगल में कांबिंग अभियान चलाया और अगले दिन करीब दो किलोमीटर अंदर से महिला का शव बरामद किया गया। दूसरी घटना ने पूरे क्षेत्र में दहशत को कई गुना बढ़ा दिया। ग्रामीणों ने जंगल से दूरी बना ली, मवेशियों को भी बाहर निकालना बंद कर दिया और बच्चों को अकेले बाहर भेजना लगभग बंद हो गया। भय का यह माहौल केवल गांवों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आसपास के कस्बों में भी चिंता फैलने लगी।
इन घटनाओं के बाद ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आने लगा। कई लोगों ने वन विभाग पर लापरवाही के आरोप लगाए और कहा कि पहले ही इलाके में बाघ की मौजूदगी की शिकायतें की जा चुकी थीं, लेकिन समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए। हालांकि वन विभाग का कहना था कि जैसे ही घटनाओं की पुष्टि हुई, तुरंत निगरानी बढ़ाई गई और बाघ को पकड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इस दौरान रामनगर वन प्रभाग की टीमें लगातार इलाके में डटी रहीं। रात-दिन निगरानी, ट्रैप कैमरों की मॉनिटरिंग और ग्रामीणों को सतर्क करने का काम चलता रहा। बावजूद इसके, क्षेत्र में तनाव बना रहा और लोग हर आहट से डरने लगे।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों से सटे इलाकों में मानवीय गतिविधियों के बढ़ने और प्राकृतिक शिकार की कमी के कारण कई बार बाघ मानव बस्तियों की ओर बढ़ जाते हैं। फतेहपुर रेंज का इलाका घने जंगल और आबादी के बीच स्थित है, जहां महिलाओं का जंगल जाना आम बात है। ऐसे में संघर्ष की संभावना हमेशा बनी रहती है। दूसरी घटना के बाद विभाग ने अपनी रणनीति और सख्त कर दी। अतिरिक्त कैमरे लगाए गए, गश्त बढ़ाई गई और संभावित मूवमेंट वाले रास्तों पर विशेष नजर रखी जाने लगी। गांवों में बार-बार चेतावनी दी गई कि कोई भी व्यक्ति अकेले जंगल न जाए और बच्चों को विशेष सतर्कता के साथ रखा जाए। यह स्थिति दर्शाती है कि मानव और वन्यजीव संघर्ष किस तरह ग्रामीण जीवन को सीधे प्रभावित करता है।
लगातार बढ़ते दबाव और जनाक्रोश के बीच वन विभाग के लिए यह जरूरी हो गया था कि जल्द से जल्द बाघ को पकड़ा जाए। यही कारण था कि मंगलवार रात जैसे ही बाघ की हलचल ट्रैप कैमरों में कैद हुई, पूरी टीम बिना समय गंवाए हरकत में आ गई। यह केवल एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं था, बल्कि भय, आक्रोश और असुरक्षा के माहौल को समाप्त करने की एक निर्णायक कोशिश थी। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस कार्रवाई के बाद उनका जीवन फिर से सामान्य हो सकेगा, हालांकि सभी जानते थे कि पूरी पुष्टि और आगे की कार्रवाई तक सतर्कता बेहद जरूरी है।
मंगलवार की रात फतेहपुर रेंज के जंगलों में जो घटनाक्रम घटित हुआ, वह केवल एक वन्यजीव रेस्क्यू अभियान नहीं था, बल्कि भय, असुरक्षा और लगातार बढ़ते जनाक्रोश के बीच प्रशासन की सबसे बड़ी परीक्षा भी थी। जैसे ही ट्रैप कैमरों में बाघ की गतिविधि स्पष्ट रूप से दिखाई दी, मौके पर मौजूद सभी टीमें पूरी तरह सतर्क हो गईं। जंगल के भीतर सन्नाटा था, लेकिन हर किसी को पता था कि यह क्षण निर्णायक होने वाला है। वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर रेस्क्यू प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया। कॉर्बेट रिजर्व टाइगर से पहुंचे वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉक्टर दुष्यंत शर्मा ने हालात का आकलन किया और पूरी सावधानी के साथ ट्रैंक्विलाइज ऑपरेशन की जिम्मेदारी संभाली। लगभग 30 मीटर की दूरी से दवा लगी गन से सटीक निशाना साधा गया। कुछ ही मिनटों में बाघ पर दवा का असर दिखने लगा और वह झाड़ियों में जाकर गिर पड़ा। इसके बाद टीम ने चारों ओर से घेराबंदी कर सुनिश्चित किया कि किसी प्रकार की चूक न हो, क्योंकि थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती थी।
बाघ के बेहोश होने के बाद वन विभाग की टीम ने बेहद सावधानी के साथ उसे स्ट्रेचर पर रखा और प्राथमिक जांच की। इस दौरान पूरे क्षेत्र में सन्नाटा पसरा रहा। ग्रामीण दूर से ही इस पूरे ऑपरेशन को देख रहे थे, उनके मन में भय भी था और उम्मीद भी। जब यह स्पष्ट हो गया कि बाघ पूरी तरह नियंत्रण में है, तब जाकर लोगों ने राहत की सांस ली। इस सफलता के बाद भी अधिकारियों ने किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं दिखाई और पूरे प्रोटोकॉल का पालन करते हुए बाघ को रेस्क्यू सेंटर भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई। वन विभाग का कहना था कि यह केवल पकड़ने की कार्रवाई नहीं, बल्कि आगे की जांच और पुष्टि का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसलिए हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाया गया, ताकि किसी तरह की त्रुटि न रह जाए।
इस पूरे घटनाक्रम पर रामनगर वन प्रभाग के डीएफओ ध्रुव मर्तोलिया ने स्पष्ट किया कि पकड़े गए बाघ का डीएनए परीक्षण कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जब तक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती, तब तक यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि यही वही बाघ है जिसने दो महिलाओं को अपना शिकार बनाया था। डीएफओ ने ग्रामीणों से अपील की कि भले ही बाघ पकड़ लिया गया हो, लेकिन अभी पूरी सतर्कता बनाए रखना जरूरी है। जंगल से सटे इलाकों में आवाजाही सीमित रखने और समूह में ही बाहर निकलने की सलाह दी गई है। वहीं कुमाऊं के मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. साकेत बडोला ने जानकारी दी कि पकड़ा गया बाघ नर है और उसकी उम्र लगभग पांच से सात वर्ष के बीच आंकी गई है। उन्होंने बताया कि बाघ को रेस्क्यू सेंटर ले जाया जा रहा है, जहां विशेषज्ञों की निगरानी में आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
डीएनए सैंपल भेजे जाने की प्रक्रिया को बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसी से यह तय होगा कि दोनों महिलाओं की मौत के पीछे यही बाघ था या जंगल में कोई और भी सक्रिय है। इस जांच के नतीजों पर ही आगे की रणनीति निर्भर करेगी। यदि पुष्टि होती है, तो वन विभाग आगे की कार्रवाई करेगा, वहीं अगर किसी अन्य बाघ की संलिप्तता सामने आती है, तो निगरानी और अभियान को और तेज किया जाएगा। फिलहाल बाघ के पकड़े जाने से ग्रामीणों में भय का स्तर कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन पूरी तरह से सामान्य स्थिति बहाल होने में अभी समय लगेगा। कई गांवों में अब भी लोग बच्चों और बुजुर्गों को अकेले बाहर भेजने से बच रहे हैं और जंगल जाने से पहले कई बार सोच रहे हैं।
यह पूरी घटना एक बार फिर मानव और वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को सामने लाती है। जंगलों से सटे इलाकों में रहने वाले लोग वर्षों से संसाधनों के लिए जंगल पर निर्भर रहे हैं, लेकिन बदलते हालात में यह निर्भरता उनके लिए जानलेवा बनती जा रही है। फतेहपुर रेंज की घटनाओं ने प्रशासन, वन विभाग और समाज सभी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए दीर्घकालिक समाधान जरूरी हैं। बाघ के पकड़े जाने के बाद भले ही तत्काल राहत मिली हो, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि जंगल और आबादी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि न इंसानी जान जाए और न ही वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़े। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश भी है।





