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संतों की अद्भुत पंचगव्य होली ने दिया सनातन संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

भस्मधारी नागा संन्यासी और महामंडलेश्वरों ने रसायनों को त्यागकर गाय के दूध, दही और गोबर से खेली दिव्य होली, परंपरा के इस पावन रंग में घुली वैज्ञानिक शुद्धता और सनातन संस्कृति की अलौकिक महक।

हरिद्वार। फाल्गुन मास की मादक बयार, वसंत ऋतु की सौंधी खुशबू और रंगों के उल्लास के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में इस बार होली का पर्व केवल पारंपरिक आनंद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण का गहरा संदेश भी दिया। आमतौर पर जहां होली के अवसर पर अबीर-गुलाल और रंगों की चकाचौंध देखने को मिलती है, वहीं संत समाज ने इस बार एक अलग ही मार्ग अपनाया। साधु-संतों ने गाय के पंचगव्य से होली खेलकर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक हैं जितनी प्राचीन काल में थीं। इस आयोजन का केंद्र माया देवी मंदिर का पावन प्रांगण बना, जहां सुबह से ही संत समाज के लोग एकत्र होने लगे थे। साधु-संत पारंपरिक वेशभूषा, भस्म और तिलक से सुशोभित होकर पंचगव्य निर्माण की विधि में जुटे रहे। गाय के दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र को विधिवत मंत्रोच्चार के साथ मिलाकर पंचगव्य तैयार किया गया। इसके बाद उसी पंचगव्य से एक-दूसरे को रंग लगाकर होली खेली गई। पूरे वातावरण में भजन-कीर्तन, हर-हर महादेव के जयघोष और ढोल-नगाड़ों की गूंज ने आध्यात्मिक उल्लास को और अधिक प्रबल कर दिया। संत समाज ने इस माध्यम से यह संदेश दिया कि त्योहार केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव का सशक्त प्रतीक होते हैं।

इस अनोखी होली के दौरान संत समाज की सामूहिकता और अनुशासन देखते ही बनता था। पंचगव्य से होली खेलने की यह परंपरा कोई नई शुरुआत नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस सनातन परंपरा का हिस्सा है, जिसमें गाय को माता और प्रकृति को पूजनीय माना गया है। साधु-संतों का कहना था कि पंचगव्य न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक महत्व भी छिपा है। गाय से प्राप्त इन पंच तत्वों का उपयोग वातावरण को शुद्ध करने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक माना जाता है। संतों ने रासायनिक रंगों से दूरी बनाते हुए प्राकृतिक रंगों और पंचगव्य को अपनाकर समाज को यह संदेश दिया कि आधुनिक जीवनशैली में भी पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपनाया जा सकता है। आयोजन के दौरान संतों ने पहले अबीर-गुलाल लगाकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और फिर पंचगव्य से होली खेली। ढोल-नगाड़ों की ताल पर झूमते नागा संन्यासी और अन्य साधु यह दर्शा रहे थे कि वैराग्य और उल्लास, दोनों ही सनातन परंपरा के अभिन्न अंग हैं। इस दृश्य ने वहां उपस्थित श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी भावविभोर कर दिया।

इस अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारे धर्म और परंपराओं में सदैव प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आदर की भावना रही है। उन्होंने बताया कि पंचगव्य से होली खेलना उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का कार्य करता है। उनके अनुसार, आज का समाज तेजी से भौतिकता की ओर बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरण और संस्कृति दोनों को नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में संत समाज द्वारा आयोजित यह होली एक चेतावनी और संदेश दोनों है। पंचगव्य की होली यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही जीवन को संतुलित और सार्थक बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन संस्कृति कभी भी प्रकृति के दोहन की पक्षधर नहीं रही, बल्कि उसने हमेशा संरक्षण और संतुलन पर जोर दिया है। इस आयोजन के माध्यम से समाज को यह प्रेरणा मिली कि उत्सवों को मनाते समय भी पर्यावरण और परंपरा का सम्मान करना चाहिए।

आध्यात्मिक भावनाओं से ओतप्रोत इस आयोजन में जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरिगिरि महाराज ने होली के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि होली का पर्व संत समाज को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य करता है और फाल्गुन मास में पड़ने वाली रंग भरी एकादशी भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होती है। उनके अनुसार, शिव-पार्वती को प्रसन्न करने के लिए प्राचीन काल से ही पंचगव्य और प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। श्रीमहंत हरिगिरि महाराज ने यह भी बताया कि गाय माता के गोबर, दूध और अन्य तत्वों का धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक महत्व भी है। गोबर में मौजूद तत्व कीटाणुओं का नाश करने में सहायक होते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध होता है। उन्होंने पौराणिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि गाय के गोबर में भगवान गणेश का आह्वान हुआ था, इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना गया है। इसी परंपरा के निर्वहन के तहत अखाड़ों द्वारा होली खेलकर काशी विश्वनाथ की परंपरा को आगे बढ़ाया गया है। उनका कहना था कि ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और आध्यात्मिक चेतना को सुदृढ़ बनाते हैं।

कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने पंचगव्य से खेली जाने वाली होली को सनातन संस्कृति का सजीव प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा प्राप्त है और उससे प्राप्त प्रत्येक वस्तु पवित्र मानी जाती है। पंचगव्य की होली केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है। श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने यह भी कहा कि यदि समाज इस प्रकार की परंपराओं को आत्मसात करे, तो निश्चित रूप से गाय माता को राष्ट्र माता का दर्जा मिलने की दिशा में सकारात्मक सोच विकसित होगी। उन्होंने नागा संन्यासियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जूना अखाड़ा और निरंजनी अखाड़े से जुड़े ये साधु सनातन धर्म और संस्कृति के सच्चे वाहक हैं। उनकी जीवनशैली, त्याग और अनुशासन समाज को यह सिखाते हैं कि भोग और वैराग्य के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इस आयोजन में संतों की उपस्थिति और उनका उल्लास यह प्रमाणित कर रहा था कि सनातन परंपराएं आज भी जीवित हैं और समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।

देशभर में होली के विविध स्वरूप देखने को मिलते हैं, जहां बरसाना की लठमार होली और मथुरा की फूलों की होली अपनी अलग पहचान रखती हैं, वहीं साधु-संतों द्वारा खेली जाने वाली पंचगव्य की होली अपनी आध्यात्मिक गरिमा और सांस्कृतिक संदेश के कारण विशिष्ट मानी जाती है। इस होली में गाय से प्राप्त तत्वों, गंगाजल और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। पहले साधु-संत एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर शुभकामनाएं देते हैं और उसके बाद पंचगव्य से होली खेली जाती है। यह क्रम यह दर्शाता है कि परंपरा और अनुशासन के साथ भी उत्सवों को आनंदपूर्वक मनाया जा सकता है। पूरे आयोजन के दौरान संत समाज की एकजुटता, श्रद्धा और उल्लास ने यह सिद्ध कर दिया कि सनातन संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी है। हरिद्वार में आयोजित यह अनोखी होली न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि इसने समाज को यह भी संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को एक साथ लेकर चलना ही भारतीय जीवन दर्शन की सच्ची पहचान है।

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