देहरादून। दून घाटी की राजनीतिक फिज़ाओं में इन दिनों असामान्य हलचल देखी जा रही है, क्योंकि उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सियासी तापमान तेजी से ऊपर चढ़ने लगा है। सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तो पहले से जारी था, लेकिन अब परिस्थितियां कुछ अलग संकेत दे रही हैं। जहां कांग्रेस कानून व्यवस्था, बेरोजगारी और सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार हमलावर मुद्रा में दिखाई दे रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से कम और अपने ही नेताओं की गतिविधियों से अधिक मिलती प्रतीत हो रही है। लंबे समय से सत्ता में बने रहने का आत्मविश्वास हो या संगठनात्मक अनुशासन में आई ढील, हालिया घटनाक्रमों ने बीजेपी को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी को बाहरी हमलों से ज्यादा आंतरिक असंतुलन की चिंता सता रही है। कांग्रेस इन घटनाओं को अवसर में बदलने की कोशिश में है और बार-बार यह सवाल उठा रही है कि क्या बीजेपी अपने ही नेताओं को नियंत्रित रखने में सक्षम है या नहीं।
इसी क्रम में पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे का मामला राजनीतिक हलकों में खासा चर्चा का विषय बन गया। उधम सिंह नगर से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर उनके तीखे बयानों ने प्रशासन और पार्टी संगठन दोनों को असहज कर दिया। जिस तरह उन्होंने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर खुलकर सवाल उठाए, उससे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर मतभेद सतह पर आने लगे हैं। स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, वरिष्ठ नेता मदन कौशिक और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को उनके आवास तक पहुंचकर संवाद स्थापित करना पड़ा। अवैध निर्माण से संबंधित नोटिस जारी होने के बाद भी अरविंद पांडे के तेवर कम होते नजर नहीं आए। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से खुली जांच की मांग करते हुए जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान के खिलाफ भी आवाज बुलंद की। कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को बीजेपी की अंदरूनी खींचतान और प्रशासनिक कमजोरी का प्रतीक बताते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। हालांकि बाद में पार्टी नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा और संयम बरतने की अपील के बाद मामला कुछ हद तक शांत होता दिखाई दिया।
दूसरी ओर खानपुर से जुड़े बीजेपी नेता और पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह चौंपियन भी विवादों में घिर गए जब एक शादी समारोह से जुड़ा उनका वीडियो सार्वजनिक हो गया। वीडियो सामने आते ही कांग्रेस ने बीजेपी के अनुशासन और नैतिकता पर सवालों की बौछार कर दी। विपक्ष का आरोप है कि बार-बार विवादों में रहने वाले नेताओं के खिलाफ यदि ठोस कार्रवाई नहीं की जाती, तो इससे संगठन की छवि धूमिल होती है। कुंवर प्रणव सिंह चौंपियन ने वीडियो वायरल करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी और अपनी सफाई भी पेश की, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे घटनाक्रम चुनावी मौसम में पार्टी के लिए असुविधाजनक साबित हो सकते हैं। बीजेपी के भीतर भले ही इसे व्यक्तिगत मामला बताया जा रहा हो, मगर विपक्ष इसे व्यापक अनुशासनहीनता का उदाहरण करार दे रहा है। राजनीतिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक यह मुद्दा चर्चा में बना हुआ है, जिससे पार्टी को रक्षात्मक रुख अपनाना पड़ रहा है।
सबसे अधिक राजनीतिक हलचल रायपुर से विधायक उमेश शर्मा काऊ से जुड़े घटनाक्रम ने मचाई, जिसने प्रदेश की सियासत को नया मोड़ दे दिया। शिक्षा निदेशालय में कथित हंगामे और मारपीट की घटना ने सरकार की छवि पर सीधा असर डाला। आरोपों के अनुसार विधायक अपने समर्थकों के साथ कार्यालय पहुंचे और विवाद इतना बढ़ा कि बात हाथापाई तक जा पहुंची, जिसमें शिक्षा निदेशक को चोट लगने की खबर सामने आई। पुलिस ने उमेश शर्मा काऊ और कुछ समर्थकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया, जिसके बाद शिक्षक संगठनों और कर्मचारी संघों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। प्रदेश में लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी और शिक्षक जुड़े हुए हैं, और चुनावी वर्ष में उनका रुख किसी भी पार्टी के लिए निर्णायक हो सकता है। बोर्ड परीक्षाओं के दौरान सामने आई इस घटना ने प्रशासनिक संवेदनशीलता और राजनीतिक जिम्मेदारी दोनों पर सवाल खड़े कर दिए। विपक्ष लगातार इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेर रहा है और कह रहा है कि सत्ता का प्रभाव जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में झलकने लगा है।

‘‘सहर प्रजातंत्र के सम्पादक सुनील कोठारी’’ का मानना है कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के दौरान ऐसी परिस्थितियां असामान्य नहीं होतीं, लेकिन चुनावी समय में इनका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो जाता है। उनके अनुसार कई बार जनप्रतिनिधि यह मान बैठते हैं कि प्रशासनिक ढांचा उनके अधीन है और वे अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार कर सकते हैं, किंतु लोकतांत्रिक व्यवस्था में संतुलन और मर्यादा अनिवार्य है। आदेश त्यागी ने यह भी संकेत दिया कि यदि कर्मचारी वर्ग असंतुष्ट होता है तो उसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि प्रत्याशियों का चयन निश्चित रूप से अंतिम परिणाम तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा, लेकिन वर्तमान घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि पार्टी को अंदरूनी अनुशासन को लेकर सख्ती दिखानी होगी।
राजनीतिक हलकों में बढ़ती चर्चाओं के बीच भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने उमेश शर्मा काऊ से जुड़े घटनाक्रम पर सार्वजनिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी और संगठन का पक्ष स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उमेश शर्मा काऊ संगठन कार्यालय पहुंचकर घटना को लेकर खेद व्यक्त कर चुके हैं और माफी मांग चुके हैं। महेंद्र भट्ट ने यह भी जोड़ा कि किसी भी प्रकार का टकराव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है, लेकिन साथ ही सरकारी कर्मचारियों को भी अपने व्यवहार में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। उनके बयान को पार्टी की ओर से संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि एक ओर संगठन अपने जनप्रतिनिधि के पक्ष में पूरी तरह खड़ा नहीं दिखना चाहता, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी वर्ग को पूरी तरह नाराज करना भी राजनीतिक दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है। चुनावी माहौल में यह बयानबाजी इस बात का संकेत देती है कि पार्टी नेतृत्व स्थिति को नियंत्रित करने और नुकसान की भरपाई करने के प्रयास में जुटा हुआ है।
इसी संदर्भ में महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर भी पलटवार करते हुए कहा कि जो लोग आज बीजेपी के नेताओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें अपने शासनकाल की घटनाओं पर भी नजर डालनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उनके विधायक और मंत्री भी कई बार विवादों में घिरे, लेकिन उस समय पार्टी नेतृत्व मौन साधे रहा। महेंद्र भट्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विपक्ष बीजेपी को काम करने का तरीका न सिखाए, क्योंकि संगठन अपने स्तर पर आवश्यक कार्रवाई और समीक्षा करने में सक्षम है। उनका यह बयान राजनीतिक प्रतिआक्रमण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें वे विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में लाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी वर्ष में जनता केवल आरोप-प्रत्यारोप से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि वह ठोस कार्रवाई और स्पष्ट संदेश की अपेक्षा करती है।
दूसरी तरफ बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी इन घटनाओं को लेकर खुलकर अपनी राय व्यक्त की, जिसने राजनीतिक चर्चाओं को और गहरा कर दिया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को अपने आचरण में मर्यादा और संयम बनाए रखना चाहिए, क्योंकि वे जनता के प्रतिनिधि होते हैं और उनका व्यवहार पूरे संगठन की छवि को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी कर्मचारी सरकार के हाथ होते हैं और उनके साथ टकराव की स्थिति से हर हाल में बचना चाहिए। त्रिवेंद्र सिंह रावत का यह बयान पार्टी के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता की ओर संकेत करता है। उन्होंने संगठनात्मक अनुशासन को लेकर गंभीरता से ध्यान देने की बात कही, जिससे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर भी घटनाओं को लेकर चिंता मौजूद है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, जब किसी दल के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से अनुशासन की कमी की बात करते हैं, तो वह संकेत होता है कि अंदरूनी स्तर पर स्थिति को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है।

प्रदेश की राजनीति में लगातार सामने आ रहे इन विवादों ने कांग्रेस को हमलावर होने का अवसर प्रदान किया है। कांग्रेस का कहना है कि एक ओर सरकार कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सख्ती की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसके अपने नेता ही नियमों और मर्यादाओं की सीमाएं लांघते नजर आते हैं। विपक्ष यह तर्क दे रहा है कि यदि पार्टी अपने जनप्रतिनिधियों पर नियंत्रण नहीं रख पा रही है, तो वह राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को कैसे संभालेगी। चुनावी वर्ष में इस प्रकार के सवाल मतदाताओं के मन में संशय पैदा कर सकते हैं। खासतौर पर कर्मचारी और शिक्षक वर्ग की प्रतिक्रिया को राजनीतिक दल गंभीरता से ले रहे हैं, क्योंकि यह वर्ग चुनावी गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वर्तमान परिदृश्य यह संकेत दे रहा है कि उत्तराखंड की राजनीति केवल विकास और योजनाओं के इर्द-गिर्द सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अनुशासन, प्रशासनिक तालमेल और नेतृत्व क्षमता भी बड़े मुद्दे बनकर उभर सकते हैं। अरविंद पांडे, कुंवर प्रणव सिंह चौंपियन और उमेश शर्मा काऊ से जुड़े घटनाक्रमों ने बीजेपी को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है, जबकि कांग्रेस इन उदाहरणों को संगठनात्मक असंतुलन के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है। हालांकि अंतिम फैसला जनता के हाथ में है, लेकिन यह स्पष्ट है कि चुनाव से पहले का यह दौर राजनीतिक दलों के लिए आत्ममंथन का समय है। आने वाले महीनों में प्रत्याशियों का चयन, संगठन की रणनीति और विवादों पर पार्टी की प्रतिक्रिया यह तय करेगी कि सियासी तापमान किस दिशा में जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि देहरादून से लेकर जिलों तक राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है और हर दल अपने-अपने तरीके से जनमत को साधने में जुटा हुआ है।





