काशीपुर। सामाजिक और राजनीतिक सरगर्मियों के बीच उस समय एक विशेष भावनात्मक वातावरण निर्मित हो गया, जब महानगर कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष अलका पाल के नेतृत्व में कांग्रेसजनों ने प्रसिद्ध विचारक, समाज सुधारक तथा पर्वतीय अम्बेडकर के रूप में प्रतिष्ठित स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की पुण्य तिथि को “सामाजिक न्याय दिवस” के रूप में गरिमामय ढंग से मनाया। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता मोहल्ला काज़ीबाग की दलित बस्ती स्थित जाटव धर्मशाला में एकत्रित हुए, जहां श्रद्धा और सम्मान के साथ स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। आयोजन स्थल पर सादगी और गंभीरता के साथ-साथ एक मजबूत वैचारिक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे रही थी। उपस्थित लोगों के चेहरों पर सम्मान की भावना और सामाजिक समानता के प्रति दृढ़ संकल्प साफ झलक रहा था। यह आयोजन केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय की उस विचारधारा को पुनर्जीवित करने का प्रयास था, जिसे स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने अपने जीवनकाल में कर्म और संघर्ष के माध्यम से स्थापित किया था। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि उनके विचार आज भी समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके जीवनकाल में थे।
कार्यक्रम के दौरान आयोजित गोष्ठी में महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने विस्तृत रूप से स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा के संघर्षपूर्ण जीवन और उनके ऐतिहासिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पहाड़ के इस महान समाज सुधारक ने शिल्पकार समुदाय को सम्मानजनक पहचान दिलाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अलका पाल ने जोर देकर कहा कि उस समय जब दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को शिक्षा और सामाजिक अवसरों से व्यवस्थित रूप से वंचित रखा जाता था, तब स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए समाज में नई चेतना जगाई। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की अवधारणा को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, वह इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है। अलका पाल ने यह भी उल्लेख किया कि शोषित और दलित समाज को “शिल्पकार” नाम से नई पहचान दिलाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही, जिससे आत्मसम्मान और आत्मगौरव की भावना को बल मिला। उनके संबोधन के दौरान कार्यकर्ताओं ने बार-बार तालियां बजाकर समर्थन प्रकट किया और सामाजिक समरसता के इस अभियान को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर पूर्व महानगर अध्यक्ष मुशर्रफ हुसैन ने अपने विचार रखते हुए कहा कि स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा को पर्वतीय अम्बेडकर की उपाधि केवल सम्मानवश नहीं दी गई, बल्कि यह उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक सामाजिक कार्यों का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासनकाल में जब दलित समाज को व्यवस्था के हर स्तर पर उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ता था, तब स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने साहसपूर्वक आवाज उठाई और प्रतिनिधित्व की मांग को बुलंद किया। मुशर्रफ हुसैन ने विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया कि उनके प्रयासों से दलित समाज को सेना में प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ, जो उस समय एक क्रांतिकारी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल अधिकारों की प्राप्ति के लिए नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान की स्थापना के लिए भी था। अपने संबोधन में उन्होंने उपस्थित युवाओं से अपील की कि वे इस ऐतिहासिक विरासत को समझें और सामाजिक असमानता के विरुद्ध एकजुट होकर कार्य करें।
सभा की कार्यवाही का संचालन दलित नेता सुरेंद्र सागर ने अत्यंत संतुलित और प्रभावी शैली में किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि सामाजिक न्याय का अर्थ केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसरों के समग्र अधिकार से जुड़ा हुआ विषय है। सुरेंद्र सागर ने कहा कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय और समानता का अनुभव नहीं होगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा। उन्होंने स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि परिवर्तन केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सतत संघर्ष और संगठित प्रयासों से आता है। संचालन के दौरान उन्होंने उपस्थित सभी वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का स्वागत करते हुए यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी की विचारधारा सामाजिक न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। उनके शब्दों ने पूरे आयोजन को एक सुसंगत दिशा प्रदान की और कार्यक्रम में वैचारिक गंभीरता का संचार किया।

गोष्ठी के क्रम को आगे बढ़ाते हुए पार्षद शाह आलम और पार्षद हनीफ़ गुड्डू ने अपने विचारों के माध्यम से कार्यक्रम को नई ऊर्जा प्रदान की। उन्होंने कहा कि स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा का जीवन केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का वह अध्याय है जिसने पहाड़ की धरती पर दलित और वंचित समाज को आत्मगौरव का बोध कराया। पार्षद शाह आलम ने अपने संबोधन में कहा कि जिस दौर में समाज जातिगत संकीर्णताओं में जकड़ा हुआ था, उस समय स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने समान अधिकारों की बात करके नई चेतना का दीप जलाया। वहीं पार्षद हनीफ़ गुड्डू ने कहा कि शिक्षा को हथियार बनाकर सामाजिक विषमता को चुनौती देना उनका सबसे बड़ा योगदान रहा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान पीढ़ी को उनके विचारों को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारकर समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना चाहिए। दोनों वक्ताओं ने सामाजिक समरसता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का आह्वान करते हुए कहा कि “सामाजिक न्याय दिवस” मनाना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके दिखाए मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ें।
कार्यक्रम में पीसीसी सचिव जितेंद्र सरस्वती, एड. नौशाद उस्मानी, ओम प्रकाश सागर, राम सिंह यादव और रवि सागर ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए और स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा के प्रति श्रद्धा प्रकट की। पीसीसी सचिव जितेंद्र सरस्वती ने कहा कि सामाजिक परिवर्तन के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ वैचारिक प्रतिबद्धता भी आवश्यक है, और स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने दोनों का अद्भुत संतुलन प्रस्तुत किया। एड. नौशाद उस्मानी ने कहा कि न्याय की अवधारणा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब समाज के कमजोर वर्ग को बराबरी का दर्जा और अवसर मिलेंगे। ओम प्रकाश सागर ने उनके द्वारा शिल्पकार समाज को दी गई नई पहचान को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि इससे आत्मसम्मान की भावना को अभूतपूर्व बल मिला। राम सिंह यादव और रवि सागर ने भी कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय की भावना को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि योजनाओं और नीतियों के माध्यम से धरातल पर उतारा जाए। वक्ताओं ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की विरासत समाज को संगठित और जागरूक करने की प्रेरणा देती रहेगी।
सभा में उपस्थित गजेंद्र प्रकाश, विष्णु सागर, परम सिद्धू, मीना आर्य, राजेंद्र सागर, नागेश कुमार, राकेश भगत, मोहम्मद सदीक, हरिओम सागर, मोहित सागर, धीरज सागर, दीपक सागर, उदित सागर और मोहम्मद शाहिद सहित अनेक कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। जाटव धर्मशाला का सभागार कार्यकर्ताओं से खचाखच भरा हुआ था, जहां हर ओर अनुशासन और समर्पण की झलक दिखाई दे रही थी। मंच के सामने लगी स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की तस्वीर पर पुष्पमालाएं अर्पित की गईं और दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। आयोजन के दौरान सामाजिक न्याय और समान अधिकारों के समर्थन में नारों की गूंज भी सुनाई दी, जिसने वातावरण को उत्साह और प्रतिबद्धता से भर दिया। उपस्थित कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए एक जनजागरण अभियान के रूप में आगे बढ़ेगा।
समापन क्षणों में महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने पुनः सभी उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा की पुण्य तिथि को “सामाजिक न्याय दिवस” के रूप में मनाना कांग्रेस की उस प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो सदैव कमजोर और वंचित वर्ग के साथ खड़ी रही है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय का संघर्ष निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इसके लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। पूर्व महानगर अध्यक्ष मुशर्रफ हुसैन ने भी कहा कि समाज में बराबरी का अधिकार सुनिश्चित करना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। दलित नेता सुरेंद्र सागर ने अंत में सभी को एकजुट रहने और सामाजिक समरसता को मजबूत करने का आह्वान किया। कार्यक्रम के उपरांत उपस्थित सभी लोगों ने यह संकल्प दोहराया कि स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा के दिखाए मार्ग पर चलते हुए दलित, शोषित और पिछड़े वर्ग के अधिकारों की रक्षा और उन्नति के लिए निरंतर संघर्ष जारी रखा जाएगा। काशीपुर में आयोजित यह कार्यक्रम एक मजबूत संदेश देकर गया कि सामाजिक न्याय की लौ बुझी नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी के हाथों में और अधिक प्रखर होकर प्रज्ज्वलित हो रही है, और यही स्व. मुंशी हरिप्रसाद टम्टा को सच्ची श्रद्धांजलि है।





