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बोर्ड परीक्षाओं के बीच विधायक विवाद से उबाल पर शिक्षा महकमा आंदोलन तेज

निदेशक से कथित मारपीट के आरोपों पर शिक्षकों का प्रदेशव्यापी कार्य बहिष्कार, गिरफ्तारी और सार्वजनिक माफी की मांग तेज, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर बढ़ा दबाव, शिक्षा व्यवस्था और बोर्ड परीक्षाओं पर संकट के गहराने के संकेत।

देहरादून। दून घाटी से उठी एक चिंगारी ने इन दिनों पूरे उत्तराखंड के शिक्षा महकमे को हिला कर रख दिया है। प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक तंत्र के बीच खिंची अदृश्य रेखा अचानक उस समय टूटती दिखाई दी, जब भाजपा विधायक उमेश शर्मा काऊ पर शिक्षा निदेशक के साथ अभद्रता और मारपीट के गंभीर आरोप लगे। यह विवाद केवल एक कथित झड़प तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने विभागीय स्वाभिमान, जनप्रतिनिधियों की मर्यादा और प्रशासनिक सुरक्षा जैसे व्यापक सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि शिक्षा निदेशक से लेकर संयुक्त निदेशक और खंड शिक्षा अधिकारी तक खुलकर आंदोलन की पंक्ति में दिखाई दे रहे हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि यह पूरा घटनाक्रम उस संवेदनशील समय में सामने आया है, जब प्रदेशभर में दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं संचालित हो रही हैं। ऐसे में प्रशासनिक अस्थिरता का सीधा असर लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विवाद ने उस समय निर्णायक मोड़ लिया, जब शिक्षा निदेशालय में घटित कथित घटनाओं के वीडियो सार्वजनिक हुए। इन दृश्यों ने पूरे प्रदेश में हलचल मचा दी। आरोप लगाए गए कि विधायक उमेश शर्मा काऊ अपने समर्थकों के साथ निदेशालय पहुंचे और वहां शिक्षा निदेशक के साथ तीखी नोकझोंक के बाद धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार हुआ। इस घटना के बाद शिक्षा विभाग से जुड़े हजारों मिनिस्टीरियल कर्मचारियों ने कार्य बहिष्कार का ऐलान कर दिया। दफ्तरों में सन्नाटा पसर गया और नियमित प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने लगा। कर्मचारियों का कहना है कि यदि वरिष्ठतम अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो अधीनस्थ कर्मचारियों की सुरक्षा की क्या गारंटी है। यही कारण है कि यह आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक आकार लेता जा रहा है और विभाग के भीतर असंतोष की लहर साफ दिखाई दे रही है।

आंदोलन की रणनीति को लेकर शिक्षक संगठनों ने भी खुली घोषणा कर दी है कि पच्चीस फरवरी से प्रदेश का प्रत्येक कर्मचारी इस कार्य बहिष्कार में सहभागी होगा। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि यह केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं रहेगा, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसे प्रदेशव्यापी उग्र आंदोलन का रूप दिया जाएगा। उनकी मांगें दो प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित हैंकृपहला, विधायक उमेश शर्मा काऊ की गिरफ्तारी और दूसरा, सार्वजनिक मंच से स्पष्ट रूप से माफी। शिक्षकों का तर्क है कि जनप्रतिनिधि यदि अधिकारियों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करेंगे तो शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। उनका कहना है कि यह मामला किसी एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की गरिमा और सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

इसी क्रम में शिक्षक संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिला और विस्तार से अपनी पीड़ा रखी। मुलाकात के दौरान शिक्षकों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अधिकारियों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस और लिखित एसओपी, अर्थात मानक संचालन प्रक्रिया, बनाई जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न हो। प्रतिनिधियों ने दोहराया कि जब तक विधायक की गिरफ्तारी या सार्वजनिक माफी नहीं होती, तब तक आंदोलन वापस लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए आश्वासन दिया कि वे इस पर आवश्यक कार्रवाई करेंगे। इस आश्वासन के बावजूद शिक्षकों के भीतर आशंका बनी हुई है कि यदि ठोस कदम जल्द नहीं उठाए गए तो आंदोलन और तेज हो सकता है।

राजनीतिक हलकों में भी इस प्रकरण ने हलचल बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट से बातचीत कर विधायक को समझाने और स्थिति स्पष्ट करने की पहल की। राजकीय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राम सिंह चौहान ने घटना को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि विधायक को सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करनी ही होगी। उनका कहना है कि जिस प्रकार विधायक शिक्षकों और अधिकारियों पर उल्टे आरोप लगा रहे हैं, उससे यह संदेश जाता है कि वे सरकारी व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। राम सिंह चौहान ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन निरंतर जारी रहेगा और इसे और व्यापक बनाया जाएगा। उनके बयान ने आंदोलनरत शिक्षकों के मनोबल को और मजबूत किया है।

देहरादून स्थित शिक्षा निदेशालय का दृश्य इन दिनों आंदोलन स्थल में तब्दील हो चुका है। सैकड़ों शिक्षक धरने पर बैठे हैं और लगातार नारेबाजी कर रहे हैं। विभागीय कामकाज बुरी तरह प्रभावित है। हालांकि विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है, किंतु अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं होने से शिक्षकों में रोष और बढ़ गया है। दूसरी ओर पुलिस ने विधायक के साथ निदेशालय पहुंचकर कथित मारपीट में शामिल एक हिस्ट्रीशीटर समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इससे आंदोलनकारियों के बीच यह धारणा बन रही है कि कार्रवाई चयनात्मक ढंग से की जा रही है। उनका कहना है कि यदि कानून सबके लिए समान है तो फिर मुख्य आरोपी के विरुद्ध कठोर कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे। यही प्रश्न आंदोलन को और उग्र रूप देने का कारण बन रहा है।

भारतीय जनता पार्टी की ओर से भी इस विवाद पर सफाई दी गई है। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कहा कि उन्होंने विधायक को घायल निदेशक अजय नौडियाल से मिलकर स्थिति स्पष्ट करने और संवाद स्थापित करने की सलाह दी है। महेंद्र भट्ट का कहना है कि विधायक इस घटना से आहत और शर्मिंदा हैं तथा उन्होंने माफी भी व्यक्त की है। हालांकि शिक्षक संगठनों का रुख अभी भी कठोर बना हुआ है। उनका कहना है कि बंद कमरे में कही गई बात पर्याप्त नहीं है; सार्वजनिक मंच से स्पष्ट शब्दों में माफी ही स्वीकार्य होगी। जब तक यह औपचारिक रूप से नहीं होता, तब तक आंदोलन समाप्त करने का कोई सवाल नहीं है।

विपक्ष ने भी इस घटनाक्रम को लेकर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अधिकारियों को किसी भी मंत्री या सरकार की गोदी में बैठने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी अधिकारी की कार्यशैली से असहमति हो सकती है, लेकिन उसका समाधान मारपीट या दबाव की राजनीति नहीं हो सकता। विधायक पर निशाना साधते हुए गणेश गोदियाल ने उन्हें बाहुबली प्रवृत्ति का बताया और कहा कि इस प्रकार की घटनाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। विपक्ष के इस आक्रामक रुख ने मामले को और राजनीतिक रंग दे दिया है।

पूरा घटनाक्रम जिस समय सामने आया है, वह स्वयं में अत्यंत संवेदनशील है, क्योंकि प्रदेश में बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं। यदि कार्य बहिष्कार लंबा खिंचता है तो परीक्षा प्रबंधन, मूल्यांकन और परिणाम प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लाखों विद्यार्थी और उनके अभिभावक स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हैकृएक ओर कानून व्यवस्था और राजनीतिक संतुलन बनाए रखना, दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था को बाधित होने से बचाना। फिलहाल प्रदेश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विधायक उमेश शर्मा काऊ की ओर से सार्वजनिक और औपचारिक माफी आती है या नहीं, और क्या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शिक्षकों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस एसओपी जारी करते हैं। यदि शीघ्र समाधान नहीं निकला तो यह विवाद केवल एक विभागीय संघर्ष तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेशव्यापी शिक्षा संकट का रूप ले सकता है, जिसका प्रभाव दूरगामी और व्यापक होगा।

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