देहरादून। हरिद्वार और देहरादून की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर और अधिक सशक्त रूप में प्रस्तुत करते हुए गणतंत्र दिवस के अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की झांकी ने प्रदेश स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त कर एक नई उपलब्धि अपने नाम की है। देहरादून के परेड ग्राउंड में आयोजित भव्य गणतंत्र दिवस परेड में जब यह झांकी दर्शकों के सामने आई, तो उसकी विषयवस्तु, भाव-भंगिमा और सांस्कृतिक गहराई ने हर किसी को आकर्षित किया। यह झांकी केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि इसके माध्यम से उत्तराखंड की उस प्राचीन विरासत को जीवंत रूप में सामने रखा गया, जो संस्कृत भाषा, परंपरा और ग्राम्य संस्कृति से जुड़ी हुई है। राज्य स्तर पर दूसरा स्थान हासिल करना अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत अकादमी ने सीमित संसाधनों के बावजूद उच्च स्तरीय प्रस्तुति देकर निर्णायकों और दर्शकों दोनों का दिल जीत लिया। इस उपलब्धि ने पूरे प्रदेश में संस्कृत प्रेमियों और शिक्षा जगत में एक नई ऊर्जा का संचार किया है।
देहरादून के ऐतिहासिक परेड ग्राउंड में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह इस वर्ष विशेष रूप से भव्य रहा, जहां विभिन्न विभागों और संस्थाओं की झांकियों ने राज्य की सांस्कृतिक, सामाजिक और विकासात्मक झलक प्रस्तुत की। इन्हीं झांकियों के बीच उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की प्रस्तुति ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। झांकी में प्रदेश के 13 संस्कृत ग्रामों की झलक को इस प्रकार दर्शाया गया कि वह केवल दृश्य नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव बन गई। संस्कृत भाषा के उच्चारण, पारंपरिक वेशभूषा, ग्रामीण जीवनशैली और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से यह दिखाया गया कि किस तरह संस्कृत आज भी जनजीवन से जुड़ी हुई है। झांकी की संरचना और प्रस्तुति में संतुलन, सौंदर्य और संदेश तीनों का समन्वय दिखाई दिया, जिसने इसे अन्य प्रस्तुतियों से अलग पहचान दिलाई।
इस उल्लेखनीय उपलब्धि के बाद आयोजित सम्मान समारोह में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक गैरोला तथा उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. मनोज किशोर पंत को ट्रॉफी प्रदान कर सम्मानित किया। यह क्षण केवल दो अधिकारियों के सम्मान का नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से पूरी संस्कृत अकादमी और संस्कृत शिक्षा से जुड़े समाज को सम्मान मिला। राज्यपाल और मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया यह सम्मान इस बात का संकेत है कि राज्य सरकार संस्कृत भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर गंभीर और प्रतिबद्ध है। समारोह के दौरान उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों और दर्शकों ने तालियों के साथ इस उपलब्धि का स्वागत किया, जिससे माहौल गर्व और उत्साह से भर गया।
झांकी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसमें उत्तराखंड के 13 संस्कृत ग्रामों को केंद्र में रखकर प्रस्तुति दी गई। इन ग्रामों की जीवनशैली, शिक्षण पद्धति और सांस्कृतिक परंपराओं को इस तरह दर्शाया गया कि संस्कृत केवल एक शास्त्रीय भाषा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनकर सामने आई। झांकी में ग्रामीण परिवेश, गुरुकुलीय शिक्षा, वेद-पाठ, संस्कार और पारंपरिक गतिविधियों को कलात्मक ढंग से उकेरा गया। इस प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि संस्कृत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी तय कर सकती है। निर्णायकों ने भी झांकी की विषयवस्तु और प्रस्तुति की गहराई की विशेष रूप से सराहना की, जो इसके उच्च स्थान प्राप्त करने का एक बड़ा कारण बनी।

इस सफलता के बाद संस्कृत जगत से जुड़े शिक्षकों, विद्यार्थियों और विद्वानों में खासा उत्साह देखने को मिला है। प्रदेश भर के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में इस उपलब्धि को गर्व के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षकों का मानना है कि इस तरह की झांकियां न केवल संस्कृत के प्रति रुचि बढ़ाती हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य करती हैं। विद्यार्थियों में यह भावना और प्रबल हुई है कि उनकी पढ़ाई और साधना को अब समाज और शासन दोनों स्तरों पर मान्यता मिल रही है। इस उपलब्धि ने यह साबित किया है कि यदि समर्पण और रचनात्मकता के साथ प्रयास किया जाए, तो संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा भी आधुनिक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत की जा सकती है।
संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक गैरोला ने इस अवसर पर अकादमी के सचिव प्रो. मनोज किशोर पंत सहित समस्त अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई देते हुए इसे पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय बताया। उन्होंने कहा कि यह सफलता अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों का सतत प्रयास, योजना और प्रतिबद्धता है। उनके अनुसार, संस्कृत अकादमी ने जिस प्रकार भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम किया है, उसी का परिणाम है कि आज उसकी झांकी को राज्य स्तर पर सम्मान मिला। उन्होंने यह भी कहा कि इस उपलब्धि से संस्कृत शिक्षा को नई पहचान मिली है और आने वाले समय में इसके और सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। दीपक गैरोला ने विश्वास जताया कि इस सफलता से प्रेरणा लेकर अकादमी भविष्य में और भी नए आयाम स्थापित करेगी।
उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव प्रो. मनोज किशोर पंत ने इस उपलब्धि का श्रेय अकादमी के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों और सहयोगियों को दिया। उन्होंने कहा कि यह सफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी टीम की मेहनत और समर्पण का परिणाम है। सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बावजूद जिस तरह से टीम ने मिलकर काम किया, उसी से यह मुकाम हासिल हो सका। प्रो. पंत ने कहा कि झांकी की तैयारी के दौरान सभी ने अपने-अपने स्तर पर अतिरिक्त प्रयास किए, ताकि प्रस्तुति में कोई कमी न रह जाए। उन्होंने यह भी कहा कि इस सम्मान ने अकादमी की जिम्मेदारी और बढ़ा दी है, क्योंकि अब लोगों की अपेक्षाएं और अधिक होंगी।
भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए प्रो. मनोज किशोर पंत ने कहा कि उत्तराखंड संस्कृत अकादमी आगे भी इसी ऊर्जा और समर्पण के साथ काम करती रहेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में अकादमी न केवल झांकियों के माध्यम से, बल्कि शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए भी संस्कृत भाषा को और मजबूत करेगी। उनका कहना था कि यह उपलब्धि एक पड़ाव है, मंजिल नहीं, और इससे प्रेरणा लेकर और बेहतर कार्य किए जाएंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संस्कृत अकादमी का उद्देश्य केवल पुरस्कार प्राप्त करना नहीं, बल्कि संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाना है। अंततः गणतंत्र दिवस के अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत अकादमी की झांकी को मिला द्वितीय स्थान केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा, संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक बनकर उभरा है। इस उपलब्धि ने यह संदेश दिया है कि यदि सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक प्रस्तुति के साथ जोड़ा जाए, तो वह व्यापक स्तर पर सराही जा सकती है। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा दिया गया सम्मान इस दिशा में एक मजबूत प्रेरणा है। पूरे प्रदेश में इस सफलता को लेकर जो उत्साह दिखाई दे रहा है, वह आने वाले समय में संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के प्रयासों को और गति देगा तथा उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक उजागर करेगा।





