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मनरेगा नाम बदलाव पर भड़की कांग्रेस अलका पाल बोली गरीब मजदूरों अधिकार खतरे में हैं

अलका पाल ने कहा कि केंद्र की नई स्कीम रोजगार गारंटी की आत्मा को कमजोर कर रही है और गरीब, मजदूर व ग्रामीण जनता को तकनीकी और बजटीय बदलावों से सीधे नुकसान होगा।

काशीपुर। मनरेगा को लेकर केंद्र सरकार के हालिया फैसलों पर सियासत तेज हो गई है। काशीपुर में महानगर कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री अलका पाल ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना के नाम और स्वरूप में किया गया बदलाव सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक मंशा को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार भगवान राम के नाम और ‘विकसित भारत’ जैसे नारों की आड़ में गरीबों, मजदूरों और ग्रामीण तबके के अधिकारों पर प्रहार कर रही है। अलका पाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महात्मा गांधी रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट को बदलकर विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) नाम देना गांधी दर्शन और संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए रोजगार का संवैधानिक अधिकार है, जिसे कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

कांग्रेस नेत्री अलका पाल ने कहा कि मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ योजना की आत्मा को भी खत्म किया जा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि मनरेगा की अवधारणा ‘काम के अधिकार’ पर आधारित थी, जिसमें मजदूर की मांग सर्वाेपरि होती थी। अगर कोई ग्रामीण काम मांगता था, तो सरकार की जिम्मेदारी होती थी कि उसे रोजगार दे और समय पर भुगतान करे। लेकिन नई व्यवस्था में यह मूल सिद्धांत ही बदल दिया गया है। अब काम की गारंटी नहीं, बल्कि बजट और केंद्र सरकार के तय मानकों के आधार पर रोजगार मिलेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब फंड खत्म हो जाएगा, तब क्या मजदूर का अधिकार भी खत्म मान लिया जाएगा। अलका पाल ने कहा कि यह बदलाव सीधे तौर पर करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर संकट खड़ा करेगा।

अपने बयान में अलका पाल ने वित्तीय ढांचे में किए गए परिवर्तन को भी गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि पहले मनरेगा में केंद्र सरकार का 90 प्रतिशत और राज्य सरकार का 10 प्रतिशत अंशदान होता था, जिससे राज्यों पर ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं पड़ता था और योजना सुचारु रूप से चलती थी। लेकिन अब केंद्र सरकार ने अपना हिस्सा घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया है और राज्यों पर 40 प्रतिशत का भार डाल दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे कमजोर आर्थिक स्थिति वाले राज्य मनरेगा जैसी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बजट का नियंत्रण पहले केंद्र के पास था, लेकिन जिम्मेदारी भी उसी की थी, अब खर्च राज्यों से कराया जाएगा और फैसले केंद्र करेगा, जो संघीय ढांचे के खिलाफ है।

महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने कहा कि मनरेगा एक मांग आधारित योजना थी, जिसने ग्रामीण मजदूरों को सम्मान के साथ काम करने का अधिकार दिया। नई स्कीम में यह अधिकार समाप्त हो रहा है, क्योंकि अब रोजगार केंद्र के पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों और योजनाओं के अनुसार मिलेगा। उन्होंने कहा कि इससे मजदूर की स्थिति फिर उसी पुराने दौर में पहुंच जाएगी, जहां उसे काम के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। अलका पाल ने चिंता जताई कि नई व्यवस्था में अगर किसी गांव में रोजगार की तत्काल जरूरत है, लेकिन वह केंद्र की प्राथमिक सूची में नहीं है, तो वहां के मजदूरों को काम नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह बदलाव मनरेगा की आत्मा पर सीधा हमला है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री अलका पाल ने यह भी कहा कि लीगल गारंटी वाली योजना को अब एक प्रचार आधारित स्कीम में बदल दिया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने इसे ‘विकसित भारत’ के नाम पर ब्रांडिंग का जरिया बना लिया है, जबकि असली खर्च और जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी गई है। पहले ग्राम सभाओं और पंचायतों के माध्यम से काम तय होता था, जिससे स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता मिलती थी और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती थीं। लेकिन नई स्कीम में पंचायतों की भूमिका सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि इससे न सिर्फ स्थानीय स्वशासन कमजोर होगा, बल्कि गांवों की असली जरूरतें भी नजरअंदाज होंगी।

अपने वक्तव्य में अलका पाल ने तकनीकी शर्तों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नई योजना में जीआईएस उपकरण, पीएम गति शक्ति, बायोमेट्रिक्स, जियो-टैगिंग, डिजिटल डैशबोर्ड और ऑडिट जैसी प्रक्रियाएं अनिवार्य कर दी गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सभी शर्तें शहरी सोच से बनाई गई हैं और ग्रामीण हकीकत से दूर हैं। अलका पाल ने कहा कि देश के लाखों ग्रामीण मजदूर आज भी डिजिटल तकनीक से परिचित नहीं हैं। ऐसे में तकनीकी जटिलताओं के कारण बड़ी संख्या में मजदूर काम से बाहर हो जाएंगे। उन्होंने इसे डिजिटल बहिष्कार करार देते हुए कहा कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीब, अशिक्षित और कमजोर वर्ग को होगा।

कांग्रेस नेत्री अलका पाल ने बजट नियंत्रण को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अब यह पूरी तरह केंद्र सरकार तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा मिलेगा। इससे राजनीतिक भेदभाव की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी राज्य की सरकार केंद्र के साथ राजनीतिक रूप से सहमत नहीं है, तो क्या वहां के मजदूरों को कम रोजगार मिलेगा। अलका पाल ने कहा कि रोजगार जैसी बुनियादी जरूरत को राजनीतिक हथियार बनाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। उन्होंने यह भी कहा कि नई व्यवस्था में मजदूरों को खेती-किसानी के सीजन में दो महीने तक काम नहीं मिलेगा, जिससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा।

महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने कहा कि रोजगार गारंटी एक्ट का उद्देश्य साल भर मजदूरों को न्यूनतम आय सुरक्षा देना था। लेकिन नई स्कीम में दो महीने तक रोजगार की कोई गारंटी नहीं रहेगी। उन्होंने सवाल किया कि ऐसे में गरीब मजदूर अपना और अपने परिवार का पेट कैसे भरेगा। उन्होंने कहा कि अगर सरकार हाथ खींच लेगी, तो मजदूर फिर से शोषण के चक्र में फंस जाएगा। उसे या तो बेहद कम मजदूरी पर काम करना पड़ेगा या फिर अनाज के बदले श्रम जैसे अमानवीय हालात झेलने होंगे। अलका पाल ने कहा कि सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कांग्रेस पार्टी ऐसे हालात को स्वीकार नहीं कर सकती।

अपने बयान में अलका पाल ने यह भी कहा कि किसी योजना का नाम बदलना सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसके लिए सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश बेरोजगारी और महंगाई की मार झेल रहा है, तब इस तरह के खर्च का औचित्य क्या है। उन्होंने कहा कि क्या इससे बेरोजगारी कम होगी या मजदूरों की जिंदगी बेहतर होगी। अलका पाल ने आरोप लगाया कि यह बदलाव मनरेगा की रोजगार गारंटी की आत्मा पर सीधा हमला है और इसका मकसद सिर्फ राजनीतिक प्रचार है। कांग्रेस नेत्री अलका पाल ने धन के केंद्रीकरण पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि देश की संपत्ति कुछ चुनिंदा लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है और बहुसंख्यक आबादी को ‘विकसित भारत’ के सपने दिखाकर भ्रमित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 10 प्रतिशत लोगों की आय के आधार पर 90 प्रतिशत जनता को खुश करने की कोशिश की जा रही है। अलका पाल ने कहा कि जब जनता रोजगार की उम्मीद कर रही है, तब सरकार को प्रतीकों की राजनीति छोड़कर जमीनी हकीकत पर काम करना चाहिए।

अंत में महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी ऐसे किसी भी प्रावधान का पुरजोर विरोध करेगी, जो गरीबों और मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करता हो। उन्होंने कहा कि करोड़ों श्रमिकों, कामगारों और ग्रामीण परिवारों के हक सत्ता के दबाव में छीने नहीं जाने दिए जाएंगे। अलका पाल ने दो टूक कहा कि मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा का आधार है, और कांग्रेस इसे कमजोर करने की हर कोशिश के खिलाफ सड़क से संसद तक संघर्ष करेगी।

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