काशीपुर। उत्तराखंड की राजनीति और समाज के बीच इन दिनों जो सबसे तीखा, भावनात्मक और बेचैन करने वाला प्रश्न खड़ा है, वह है अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने का सवाल। इसी मांग को लेकर काशीपुर की सड़कों पर शुक्रवार को जनाक्रोश खुलकर सामने आ गया। सैकड़ों की संख्या में छात्र और युवा हाथों में जलती मशालें लेकर सड़कों पर उतरे और व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। अलीखा चौक से शुरू हुआ यह मशाल जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए आगे बढ़ा, जहां हर कदम पर नारों की गूंज और मशालों की लौ ने माहौल को गर्म कर दिया। यह दृश्य केवल एक प्रदर्शन का नहीं, बल्कि उस पीड़ा का प्रतीक था, जो अंकिता भंडारी की मौत के बाद भी समाज के भीतर सुलग रही है और अब खुलकर सड़कों पर दिखाई दे रही है।
शाम ढलते ही जब युवाओं का यह काफिला आगे बढ़ा, तो “अंकिता हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल ज़िंदा हैं”, “न्याय दो-न्याय दो” और “वी वांट जस्टिस” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। युवाओं के चेहरों पर आक्रोश, आंखों में आंसुओं की नमी और आवाज़ में न्याय की तड़प साफ देखी जा सकती थी। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह केवल एक लड़की की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न है। जिस तरह से समय बीतने के बावजूद इस प्रकरण में ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है, उसने युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। मशालों की रोशनी में यह संदेश साफ था कि अब यह मुद्दा ठंडा नहीं पड़ेगा।
भीड़ में शामिल युवाओं का कहना था कि आज देश और प्रदेश के हर हिस्से में अंकिता भंडारी के इंसाफ की मांग उठ रही है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक लोग सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से जवाबदेही का अभाव नजर आ रहा है। छात्रों ने कहा कि यदि समय रहते निष्पक्ष और प्रभावी कदम उठाए गए होते, तो शायद आज उन्हें इस तरह प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ती। उनके अनुसार अंकिता भंडारी उत्तराखंड की बेटी थी और उसके साथ हुई घटना ने पूरे प्रदेश को शर्मसार कर दिया है। यही वजह है कि युवा अब चुप नहीं बैठना चाहते और उन्होंने यह ठान लिया है कि जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक उनकी आवाज दबाई नहीं जा सकती।
मशाल जुलूस के दौरान युवाओं ने सीधे तौर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस मामले में सीबीआई जांच कराने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि इस प्रकरण में कुछ प्रभावशाली लोगों को बचाने की कोशिश की जा रही है, जिसे वे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे। युवाओं ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश का हर वर्ग सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, तो फिर सरकार इस पर निर्णय लेने से पीछे क्यों हट रही है। उनका कहना था कि कहीं न कहीं ऐसे वीआईपी हैं, जिनके नाम सामने आने से सरकार घबरा रही है, और यही कारण है कि जांच की दिशा स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
कई छात्रों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यदि इस मामले में अब तक कोई सकारात्मक परिणाम सामने आया होता, तो शायद आज मशाल जुलूस निकालने की नौबत नहीं आती। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के इशारे पर नहीं हो रहा है, बल्कि यह युवाओं की आत्मा की आवाज है। उनके अनुसार यह हर उस व्यक्ति का फर्ज है, जो खुद को संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक मानता है। छात्रों ने यह भी कहा कि वे किसी पार्टी विशेष के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि केवल न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं, ताकि सरकार तक यह संदेश पहुंचे कि अब जनता और खासकर युवा वर्ग जवाब चाहता है।
शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह से अलर्ट नजर आया। कोतवाल नरेंद्र चौधरी के नेतृत्व में भारी संख्या में पुलिस बल मशाल जुलूस के दौरान तैनात किया गया था। प्रमुख चौराहों और संवेदनशील स्थानों पर पुलिसकर्मी मौजूद रहे, ताकि किसी भी तरह की अव्यवस्था को रोका जा सके। प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से हो, यही प्राथमिकता है। हालांकि पुलिस की सख्त मौजूदगी के बावजूद युवाओं के जोश और नारों में कोई कमी नहीं आई। मशालों की लौ और नारे दोनों ही लगातार यह दर्शा रहे थे कि युवाओं का आक्रोश अभी थमा नहीं है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले में असली दोषियों को सजा नहीं मिल पाई है। युवाओं का कहना था कि कुछ लोगों को जेल भेजकर केवल औपचारिकता पूरी की गई है, जबकि वास्तविक गुनहगार अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। उन्होंने मांग की कि मामले से जुड़े हर वीआईपी का नाम सार्वजनिक किया जाए और बिना किसी दबाव के उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। युवाओं के अनुसार जब तक बड़े और प्रभावशाली नामों पर हाथ नहीं डाला जाएगा, तब तक न्याय अधूरा ही रहेगा। यही कारण है कि वे सीबीआई जांच को बेहद जरूरी मानते हैं, ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके।
मशाल जुलूस के दौरान कई वक्ताओं ने भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि एक ओर सरकार ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे देती है, लेकिन दूसरी ओर जब बेटियों के साथ अन्याय होता है तो सबसे ज्यादा चुप्पी भी वहीं से देखने को मिलती है। युवाओं ने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे लोग केवल भाषणों और नारों तक सीमित रह गए हैं, जबकि जमीनी स्तर पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। उनका कहना था कि अगर सरकार वास्तव में बेटियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर होती, तो आज अंकिता भंडारी के लिए न्याय की मांग करते हुए युवाओं को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता।
आक्रोशित युवाओं ने प्रदेश सरकार से यह भी सवाल किया कि जब पूरे उत्तराखंड में इस मामले को लेकर उबाल है, तब भी आरोपियों की गिरफ्तारी और कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि जिन नामों की चर्चा सार्वजनिक रूप से हो रही है, उन पर कार्रवाई से पीछे हटना जनता के विश्वास को तोड़ने जैसा है। युवाओं का मानना है कि यह देरी केवल संदेह को और गहरा कर रही है और सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही ठोस और निष्पक्ष कदम नहीं उठाए गए, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
जुलूस में शामिल कई युवाओं की आंखों में एक ही सवाल साफ दिखाई दे रहा था कि आखिर अंकिता को न्याय कब मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष यहीं खत्म नहीं होगा और आने वाले दिनों में भी वे इसी तरह अपनी आवाज उठाते रहेंगे। युवाओं का कहना था कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक अंकिता भंडारी के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा नहीं मिल जाती। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान एक ओर जहां पुलिस प्रशासन कानून व्यवस्था बनाए रखने में जुटा था, वहीं दूसरी ओर युवाओं की हुंकार यह दिखा रही थी कि यह लड़ाई अब लंबी चलने वाली है।
अंत में काशीपुर की सड़कों पर जो दृश्य देखने को मिला, उसने यह साफ कर दिया कि अंकिता भंडारी का मामला अब केवल एक कानूनी केस फाइल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक जन आंदोलन का रूप ले चुका है। जलती मशालें, गूंजते नारे, युवाओं की भीड़ और चारों ओर तैनात पुलिस बल—इन सबने मिलकर यह संकेत दे दिया कि यह मुद्दा अभी शांत होने वाला नहीं है। फिलहाल हालात यही बयां कर रहे हैं कि उत्तराखंड की युवा पीढ़ी अब चुप नहीं बैठने वाली और वह अपनी बहन के लिए न्याय की लड़ाई को हर मंच पर, हर स्तर पर लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।



