नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश की आर्थिक हकीकत को समझने से पहले एक वैधानिक चेतावनी ज़रूरी है, क्योंकि यह रिपोर्ट पढ़ते-पढ़ते पाठक के मन में एक बुनियादी सवाल अनिवार्य रूप से जन्म लेगा कि क्या वास्तव में सरकार ने बैंकों से निकाले गए 35 लाख करोड़ रुपये को इतिहास की धूल में दबा दिया है। बीते एक दशक में जिस तरह से सार्वजनिक बैंकों से धन निकाला गया, वह किसी एक योजना या एक उद्योग तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के लगभग हर बड़े कॉर्पोरेट समूह, कारोबारी घराने और प्रभावशाली उद्योगपति इस प्रक्रिया का हिस्सा बने। बैंकिंग प्रणाली से पैसा निकलता रहा, बड़े-बड़े उद्योग फलते-फूलते रहे और जब लौटाने की बारी आई, तो या तो कंपनियां बंद कर दी गईं, या दिवालिया घोषित कर दी गईं, या फिर किसी अन्य बड़ी कंपनी में विलय कर दिया गया। इस पूरे क्रम में बैंक कर्ज का बोझ सरकारी खातों पर आ गया और कॉर्पोरेट सेक्टर धीरे-धीरे सिमटता चला गया, जहां मालिक मालिक नहीं रहे, बल्कि हिस्सेदार बनकर रह गए।
धीरे-धीरे सामने आती तस्वीर यह बताती है कि इस देश की अर्थव्यवस्था जिस रफ्तार से चल रही है, उसके पीछे नोट छापने की मशीन तो है, लेकिन जवाबदेही की कोई स्पष्ट रेखा नहीं है। सवाल यह भी है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में नोट छपते कौन हैं और वे नोट बोरियों में भरकर देश से बाहर कैसे चले जाते हैं। सरकार स्वयं संसद में नामों की सूची पेश करती है और यह भी कहती है कि हमने इतना पैसा वसूल लिया, लेकिन जब वही भगोड़े कारोबारी विदेश से यह दावा करते हैं कि उनसे जरूरत से ज्यादा वसूली कर ली गई, तो व्यवस्था कटघरे में खड़ी दिखती है। अदालतें भारत लौटने की शर्त रखती हैं, लेकिन असली सवाल लौटने से पहले उठता है कि आखिर यह पैसा गया कहां, किसकी निगरानी में गया और किसकी सहमति से यह पूरा तंत्र चलता रहा।
यदि आर्थिक ढांचे की नींव को परखा जाए, तो सबसे पहले यह समझना होगा कि बीते पांच वर्षों में देश की लगभग 2 लाख 4268 निजी कंपनियां बंद हो चुकी हैं। यह आंकड़ा किसी गैरसरकारी संस्था का नहीं, बल्कि सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी का हिस्सा है। जब संसद में यह सवाल पूछा गया कि इतनी कंपनियों के बंद होने के बाद वहां काम करने वाले लाखों लोग कहां गए, तो सरकार ने सीधा जवाब दिया कि यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है क्योंकि ये निजी कंपनियां थीं। यही सरकार यह भी बताती है कि देश में 28 लाख से अधिक कंपनियां पंजीकृत हैं, जिनमें से केवल 18 लाख के आसपास ही सक्रिय हैं। इसका सीधा अर्थ है कि शेष कंपनियां या तो निष्क्रिय हैं या बंद हो चुकी हैं, और इस बंदी के पीछे केवल कारोबारी असफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक प्रक्रिया भी है।
सरकार का तर्क यह दिया गया कि कई कंपनियों का मर्जर हो गया, कई ने रिकॉर्ड देना बंद कर दिया और कई के मुनाफे में गिरावट आ गई। लेकिन जब यह पूछा गया कि क्या इन कंपनियों ने बैंकों से कर्ज लिया था, तो उत्तर मिला—हां। क्या कर्ज लौटाया गया—नहीं। क्या वसूली हुई—बहुत सीमित। और क्या उन्होंने खुद को दिवालिया घोषित किया—अधिकांश मामलों में हां। 2016 से 2025 के बीच लगभग 45 से 48 लाख करोड़ रुपये बैंकों से निकले और उनमें से केवल 15 लाख करोड़ के आसपास की ही वसूली हो सकी। इसका सीधा अर्थ है कि 30 से 35 लाख करोड़ रुपये या तो डूब गए या कागजों में समायोजित कर दिए गए, जिसे आम भाषा में राइट-ऑफ कहा जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे भयावह पक्ष यह है कि भारत आज दुनिया के सामने एक बड़े बाजार के रूप में खड़ा है, लेकिन इस बाजार के भीतर कंपनियों का अस्तित्व तेजी से खत्म होता जा रहा है। वर्ष 2022-23 में अकेले 83,452 कंपनियां बंद हुईं, जबकि 2021-22 में यह संख्या 64,000 के आसपास थी। 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर 20,365 पर आया, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। औसतन देखा जाए तो बीते पांच वर्षों में प्रतिदिन लगभग 100 कंपनियां देश में बंद हुईं। यह किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है, लेकिन नीति-निर्माताओं के लिए यह केवल एक सांख्यिकीय जानकारी बनकर रह गई।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता को इस संकट से निपटने का औजार बताया गया। दावा किया गया कि आईबीसी के जरिए 26 लाख करोड़ रुपये के मामलों को सुलझाया गया। लेकिन जब आंकड़ों को गहराई से देखा गया, तो सामने आया कि 1200 मामलों में 12 लाख करोड़ और 3000 मामलों में 14 लाख करोड़ के दावे थे। यह सभी मामले 2016 से 2025 के बीच के हैं। सवाल यह नहीं है कि कितने मामले सुलझाए गए, सवाल यह है कि सुलझाने के नाम पर कितनी पूंजी का बलिदान दे दिया गया। हेयरकट के नाम पर बैंकों ने भारी नुकसान उठाया और कॉर्पोरेट को राहत मिलती चली गई।
इस पूरे परिदृश्य में भारतीय स्टेट बैंक की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2016-17 से 2023-24 के बीच केवल एसबीआई ने ही 1 लाख 41 हजार 515 करोड़ रुपये का कर्ज राइट-ऑफ किया। इसके मुकाबले रिकवरी मात्र 17,584 करोड़ रुपये की रही। यही नहीं, 2017 से 2023 के बीच हेयरकट की राशि 83,637 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। यह आंकड़े यह समझने के लिए पर्याप्त हैं कि सरकार इतनी बड़ी कल्याणकारी योजनाएं कैसे चला पा रही है और लाभार्थियों की संख्या 50 करोड़ से अधिक कैसे हो गई।
मुद्रा योजना का उदाहरण इस पूरी कहानी को और जटिल बना देता है। सरकार का दावा है कि इस योजना के तहत 34 लाख करोड़ रुपये 50 करोड़ से अधिक खातों में बांटे गए। एक तरफ बैंकिंग प्रणाली में हजारों करोड़ रुपये डूब रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार गरीब कल्याण और स्वरोजगार के नाम पर विशाल रकम वितरित कर रही है। यह संतुलन कैसे बनता है, यह सवाल अर्थशास्त्रियों को भी उलझन में डाल देता है। जब बैंक डूबते कर्ज की भरपाई सरकार करती है और सरकार नोट छापकर उस भरपाई को संभव बनाती है, तो यह आर्थिक चक्र आखिर किस कीमत पर चल रहा है, इसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है।
अर्थव्यवस्था की आंतरिक स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है। सरकार स्वयं स्वीकार करती है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि दर केवल 1.8 प्रतिशत रह गई है। माइनिंग और पावर सेक्टर में भी गिरावट दर्ज की गई है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक पिछले सवा वर्ष के न्यूनतम स्तर 0.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। कोयला उत्पादन, जो अप्रैल से नवंबर तक के आंकड़ों में 3.7 प्रतिशत की दर से बढ़ना चाहिए था, वह भी पीछे चला गया है। इन सबके बीच सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी घटाने और बैंकों के निजीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।
इसी क्रम में बैंक ऑफ महाराष्ट्र में सरकार अपनी 6 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने जा रही है, जिससे लगभग 2600 करोड़ रुपये जुटाने का दावा किया गया है। कुछ ही समय पहले वित्त मंत्री ने कहा था कि देश की वृद्धि के लिए बड़े-बड़े बैंक जरूरी हैं, और बड़े बैंक बनाने का मतलब है बैंकों का मर्जर। जिस तरह कंपनियों का मर्जर हुआ और लाखों कंपनियां बंद हो गईं, उसी रास्ते पर अब बैंकिंग सेक्टर भी बढ़ता दिख रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां नुकसान का बोझ अंततः आम जनता पर ही पड़ेगा।
सरकार जब सत्ता में आई थी, तब स्टील, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, रियल एस्टेट, फार्मा, टेक्सटाइल और बाद में फूड एंड बेवरेज जैसे क्षेत्रों को विकास का इंजन बताया गया। इन्हीं क्षेत्रों को सबसे ज्यादा कर्ज दिया गया। लेकिन एनसीएलटी के आंकड़े बताते हैं कि स्टील सेक्टर में 58 प्रतिशत, कंस्ट्रक्शन में 75 प्रतिशत, मैन्युफैक्चरिंग में 77 प्रतिशत, रियल एस्टेट में 72 प्रतिशत, फार्मा में 83 प्रतिशत और टेक्सटाइल में भी 83 प्रतिशत पूंजी डूब गई। यह बताता है कि जिन क्षेत्रों को विकास की रीढ़ कहा गया, वहीं सबसे ज्यादा वित्तीय रक्तस्राव हुआ।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के टॉप 10 बैंक डिफॉल्टरों पर ही 8 लाख 44 हजार करोड़ रुपये का कर्ज बकाया बताया गया। कुल एनपीए 4 लाख करोड़ से अधिक पहुंच चुका है और 2000 से ज्यादा कंपनियां एनसीएलटी के दरवाजे पर खड़ी हैं। 2025 में यह संख्या 20,000 से भी अधिक बताई जा रही है। इसका मतलब यह है कि देश में कंपनियां खोलना अब जोखिम नहीं, बल्कि एक रणनीति बन गई है—कर्ज लो, विस्तार करो, फिर दिवालिया हो जाओ या किसी बड़े समूह में विलय कर लो।
इस पूरे तंत्र के प्रतीक बन चुके हैं वे 15 भगोड़े आर्थिक अपराधी, जिनके नाम संसद में गिनाए गए। विजय माल्या, नीरव मोदी, नितिन संदेशा, सुदर्शन वेंकट रमन, रामानुम शेख रत्नम, चेतन संदेशा, दीप्ति संदेश्रा, पुष्पेंद्र कुमार वैद और हितेश पटेल जैसे नामों पर नौ सार्वजनिक बैंकों को 26,645 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप है। ब्याज जोड़ने पर यह राशि 31,347 करोड़ तक पहुंच जाती है। सरकार कहती है कि 19,187 करोड़ की वसूली हो चुकी है, लेकिन आंकड़ों का मिलान करने पर खुद सरकार और बैंक अलग-अलग बातें कहते नजर आते हैं।
विजय माल्या का मामला इस विरोधाभास का सबसे बड़ा उदाहरण है। संसद में कहा गया कि 14,100 करोड़ रुपये वसूले गए, जबकि बैंक दस्तावेजों में यह राशि 10,000 करोड़ से भी कम बताई गई। कहीं 7,000 करोड़ का बकाया बताया गया, कहीं 10,000 करोड़ का। दिसंबर 2024 में 1,594 करोड़ की वसूली का दावा और कुछ महीनों बाद 14,100 करोड़ की बात—यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। जब खुद सरकार और बैंक एक ही व्यक्ति के मामले में एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, तो आम जनता किस पर भरोसा करे।
एनपीए के साल-दर-साल आंकड़ों का विश्लेषण करने पर स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। केवल सरकारी बैंकों में पिछले 11 वर्षों में 13 लाख 21 हजार 260 करोड़ रुपये का एनपीए दर्ज किया गया। यदि इसमें निजी और विदेशी बैंकों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा 16 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाता है। यह वह राशि है जिसे कागजों में समायोजित कर बैंकिंग प्रणाली को स्वस्थ दिखाया गया, जबकि वास्तविक अर्थव्यवस्था पर इसका बोझ लगातार बढ़ता गया।
प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई भी इस कहानी का एक अहम हिस्सा है। 2014 से 2019 के बीच 791 मामले दर्ज हुए, जबकि 2020 से 2025 के बीच यह संख्या 5,521 तक पहुंच गई। कुल मिलाकर लगभग 6,200 मामलों में केवल 120 लोगों को दोषी ठहराया गया। इनमें से भी कई लोग एक से अधिक मामलों में शामिल थे। इसका सीधा अर्थ है कि हजारों मामलों में कोई सजा नहीं हुई, कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई। आर्थिक अपराध एक जोखिम नहीं, बल्कि एक सुरक्षित रास्ता बनता चला गया।
इन तमाम तथ्यों के बीच अंततः तीन सवाल देश के सामने खड़े होते हैं। पहला, क्या भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां रोजाना 100 से अधिक कंपनियां बंद हो रही हैं। दूसरा, क्या यह वही देश है जहां बैंक कर्ज लेकर भागने वालों की राशि दुनिया में सबसे अधिक है। और तीसरा, क्या यह वही व्यवस्था है जहां सरकार और बैंक अपने ही आंकड़ों का मिलान नहीं कर पाते, जबकि देश की विकास दर दुनिया में सबसे तेज बताई जाती है। इन सवालों के जवाब शायद आसान नहीं हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।



