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देश की सेवा के बाद जमीन की लड़ाई आपदा ग्रस्त गांव में जवान का दर्द

आपदा घोषित चुकुम गांव में विस्थापन से पहले खतौनियों से नाम गायब होने का आरोप, सेवानिवृत्त सीआरपीएफ जवान और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

रामनगर। देश की सीमाओं पर वर्षों तक तैनात रहकर हर मौसम, हर खतरे और हर चुनौती का सामना करने वाला एक जवान जब सेवा से निवृत्त होकर अपने गांव लौटता है, तो उम्मीद होती है कि उसे सुकून मिलेगा, सम्मान मिलेगा और अपने लोगों के बीच अपनापन महसूस होगा। लेकिन उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के रामनगर क्षेत्र में स्थित आपदा ग्रस्त चुकुम गांव की कहानी इस उम्मीद को तोड़ती नजर आती है। यहां एक सेवानिवृत्त सीआरपीएफ जवान को दुश्मन की गोलियों से नहीं, बल्कि अपने ही तंत्र और कागजी व्यवस्था से जूझना पड़ रहा है। जिस जवान ने बर्फीली रातों में तिरंगे की शान के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, आज वही अपने दादा की पुश्तैनी जमीन पर अधिकार साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।

सीमा पर तैनाती के दौरान त्योहारों की खुशियों से दूर, परिवार के सुख-दुख से अलग और हर पल खतरे के साए में ड्यूटी निभाने वाला यह जवान जब वर्दी उतारकर घर लौटा, तो उसे एक ऐसा झटका लगा जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त हीरा सिंह जब अपने गांव पहुंचे और भूमि से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की, तो पता चला कि उनके दादा स्वर्गीय गोविन्द सिंह का नाम नई खतौनी से गायब है। जिस जमीन पर पीढ़ियों से उनका परिवार खेती करता आया, वही जमीन अब कागजों में किसी और की हो गई या यूं कहें कि अस्तित्वहीन दिखने लगी। यह सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर खड़े होते गंभीर सवालों की तस्वीर है।

रामनगर क्षेत्र का चुकुम गांव पहले ही आपदा ग्रस्त घोषित किया जा चुका है और वहां विस्थापन की प्रक्रिया प्रस्तावित है। आमतौर पर ऐसे मामलों में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि विस्थापन से पहले हर परिवार के अधिकार सुरक्षित किए जाएं, जमीन के रिकॉर्ड दुरुस्त हों और मुआवजे या पुनर्वास में किसी के साथ अन्याय न हो। लेकिन चुकुम गांव में जो हो रहा है, वह इन दावों के उलट नजर आता है। विस्थापन से पहले ही खतौनी में नाम गायब होने लगे हैं, और यह नाम किसी नए या बाहरी व्यक्ति के नहीं, बल्कि उन ग्रामीणों के हैं जिनका इस मिट्टी से कई पीढ़ियों का नाता रहा है। देवभूमि उत्तराखंड में जमीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं मानी जाती, बल्कि यह पहचान, सम्मान और भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक होती है।

इस पूरे मामले को सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र शर्मा ने सार्वजनिक रूप से उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विस्थापन से पहले जानबूझकर पुराने ग्रामीणों के नाम खतौनी से हटाए जा रहे हैं। नरेंद्र शर्मा का कहना है कि प्रशासन ने विस्थापन से जुड़ी रिपोर्ट शासन और सरकार को भेज दी है, लेकिन उसी दौरान चुपचाप भूमि अभिलेखों में बदलाव किए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि कई ग्रामीणों की जमीन नई खतौनी में टाइप ही नहीं की गई, जिससे उनका नाम पूरी तरह रिकॉर्ड से गायब हो गया। जब नाम ही नहीं रहेगा, तो अधिकार किस आधार पर मिलेगा और मुआवजा कैसे तय होगा, यह सवाल बेहद गंभीर है।

नरेंद्र शर्मा ने उदाहरण देते हुए स्वर्गीय गोविन्द सिंह का मामला सामने रखा। उनके अनुसार गोविन्द सिंह की जमीन खाता संख्या इकत्तीस, छियालीस और उनतीस में दर्ज थी। वर्षों तक यह रिकॉर्ड में मौजूद रही, लेकिन अब नई खतौनी में उनका नाम कहीं नजर नहीं आता। न तो नाम काटा हुआ दिखता है, न ट्रांसफर का कोई उल्लेख है, बस वह अचानक गायब हो गया है। यह स्थिति संदेह पैदा करती है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। अगर किसी भूमि पर आपदा के कारण जलमग्न होने की स्थिति बनी है, तो उसे जलमग्न भूमि के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए ताकि रिकॉर्ड बना रहे और मुआवजे का आधार तय हो सके। लेकिन नाम ही हट जाएगा, तो विस्थापन के समय उस परिवार को उसका हक कैसे मिलेगा।

इसी पृष्ठभूमि में सामने आती है सीआरपीएफ से सेवानिवृत्त जवान हीरा सिंह की पीड़ा। वर्षों तक देश की सेवा करते हुए उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर पोस्टिंग झेली, हर परिस्थिति में ड्यूटी निभाई और आखिरकार इस साल दो नवंबर को सेवानिवृत्त होकर अपने गांव लौटे। घर लौटने की खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई, क्योंकि दस्तावेजों की जांच के दौरान उन्हें पता चला कि उनके दादा गोविन्द सिंह का नाम खतौनी से हटा दिया गया है। जिस जमीन को वे अपनी विरासत समझते थे, उसी पर उनका अधिकार अब कागजों में सवालों के घेरे में आ गया।

हीरा सिंह बताते हैं कि उनके पास सभी वैध दस्तावेज मौजूद हैं, वारिसान हक भी स्पष्ट है, लेकिन जब रिकॉर्ड में नाम ही नहीं होगा, तो हक किस तरह साबित किया जाएगा। एक ऐसा व्यक्ति, जिसने देश के लिए अपनी जान की बाजी लगाई, आज यह सिद्ध करने में लगा है कि उसके दादा की जमीन उसी की है। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत पीड़ा को दर्शाती है, बल्कि उस सिस्टम की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है, जो अपने रक्षकों के साथ भी न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं कर पा रहा।

इस मामले पर प्रशासन की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। रामनगर के उपजिलाधिकारी प्रमोद कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि पूरे क्षेत्र का सर्वे किया गया है, मकानों और जमीनों का आकलन भी हुआ है। उनके अनुसार यदि किसी का नाम छूट गया है, तो वह संबंधित दस्तावेज लेकर कार्यालय में आ सकता है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भूमि के बदले भूमि का प्रावधान है और किसी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि यह महज एक तकनीकी त्रुटि हो सकती है, जिसे दस्तावेजों के आधार पर सुधारा जाएगा।

हालांकि प्रशासन की इस सफाई के बावजूद सवाल खत्म नहीं होते। क्या विस्थापन से पहले खतौनी में इस तरह के बदलाव करना उचित है? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है? अगर आज एक सेवानिवृत्त जवान के दादा का नाम रिकॉर्ड से हट सकता है, तो कल किसी और ग्रामीण का क्यों नहीं। यह आशंका लोगों के मन में डर पैदा कर रही है और प्रशासन पर भरोसा कमजोर कर रही है।

चुकुम गांव का विस्थापन केवल पुनर्वास का मामला नहीं है, बल्कि यह विश्वास और पारदर्शिता की परीक्षा भी है। जब रिकॉर्ड में नाम नहीं रहेगा, तो इंसान सिर्फ कागजों में सिमट जाएगा। देवभूमि उत्तराखंड, जहां भूमि को मां का दर्जा दिया जाता है, वहां अगर अपने ही जवान को अपनी जमीन के लिए लड़ना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। यह कहानी इसलिए सामने लाई गई है ताकि सवाल जिंदा रहें, ताकि जवाब मांगे जा सकें और ताकि भविष्य में किसी और हीरा सिंह को अपने हक के लिए इस तरह संघर्ष न करना पड़े।

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