उत्तराखंड। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के भीतर लंबे समय से छिपी एक परत उस समय उजागर हुई, जब राज्य कर विभाग की जांच ने यह साफ कर दिया कि किस तरह कागजों के सहारे सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा था। जिस GST प्रणाली को पारदर्शिता और ईमानदार कारोबार को बढ़ावा देने का माध्यम बताया जाता है, उसी ढांचे में कुछ चालाक फर्मों ने सेंध लगाकर करोड़ों रुपये की कर चोरी को अंजाम दिया। यह मामला न तो किसी तकनीकी खामी का नतीजा है और न ही अनजाने में हुई भूल का परिणाम, बल्कि यह पूरी तरह योजनाबद्ध और सुनियोजित आर्थिक अपराध की तस्वीर पेश करता है। फर्जी दस्तावेजों, बनावटी लेन-देन और कागजी सप्लाई चेन के जरिए ऐसा कारोबार दिखाया गया, जिसका जमीनी हकीकत से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। इस खुलासे ने न सिर्फ कर व्यवस्था की कमजोरियों को सामने रखा है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अगर समय रहते कार्रवाई न होती तो यह खेल कितने बड़े पैमाने पर फैल सकता था।
एक मीडिया वेबसाइट के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC, जिसे ईमानदार व्यापारियों के लिए राहत और सुविधा का माध्यम माना जाता है, उसी प्रावधान को कुछ फर्मों ने कर चोरी का हथियार बना लिया। ITC का उद्देश्य यह होता है कि व्यापारी पहले से चुकाए गए कर का लाभ लेकर दोहरी कराधान से बच सकें, लेकिन यहां इस व्यवस्था का दुरुपयोग करते हुए बिना किसी वास्तविक खरीद-बिक्री के भारी-भरकम टैक्स क्रेडिट हासिल किया गया। न तो माल खरीदा गया, न बेचा गया, न किसी फैक्ट्री में उत्पादन हुआ और न ही मशीनें चलीं, फिर भी कागजों में ऐसा दिखाया गया मानो कारोबार पूरी रफ्तार से दौड़ रहा हो। इस फर्जी गतिविधि के आधार पर सरकार से करोड़ों रुपये का ITC लिया गया, जिससे साफ है कि यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि राज्य के राजस्व पर सीधा हमला था।
जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाला मामला कोटद्वार से सामने आया, जहां इंगट निर्माण से जुड़ी दो फर्में कागजों में पूरी तरह सक्रिय दिखाई दे रही थीं, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही थी। इन फर्मों की फैक्ट्रियां बंद पड़ी थीं, उत्पादन पूरी तरह ठप था और यहां तक कि बिजली कनेक्शन भी कटे हुए थे। न किसी मजदूर की आवाज, न मशीनों की गूंज और न ही किसी तरह की औद्योगिक हलचल, लेकिन दस्तावेजों में कारोबार ऐसा दर्शाया गया जैसे उत्पादन दिन-रात जारी हो। फर्जी बिलों और बनावटी इनवॉइस के सहारे सप्लाई चेन तैयार की गई और उसी के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लिया गया। यह स्थिति न केवल हैरान करने वाली थी, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे कागजी दुनिया में बैठकर वास्तविकता को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
जैसे ही इन गतिविधियों को लेकर संदेह गहराया, आयुक्त राज्य कर सोनिका के निर्देश पर विशेष अनुसंधान शाखा SIP हरिद्वार की टीम सक्रिय हुई। टीम ने मौके पर पहुंचकर छापेमारी की, रिकॉर्ड खंगाले और दस्तावेजों की गहन पड़ताल की। दो दिन तक चली इस जांच में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने विभाग के अधिकारियों को भी चौंका दिया। जांच में स्पष्ट रूप से कर चोरी के ठोस सबूत मिले, जिनमें फर्जी इनवॉइस, कागजी सप्लाई चेन और बिना किसी भौतिक गतिविधि के दिखाया गया कारोबार शामिल था। इन सबके जरिए यह साबित हुआ कि योजनाबद्ध तरीके से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। कार्रवाई का दबाव बढ़ते ही दोनों फर्मों ने तत्काल तीस लाख रुपये सरकारी खाते में जमा कराए, लेकिन विभाग के सामने यह सवाल अब भी कायम है कि क्या यही पूरी रकम है या यह सिर्फ शुरुआती भरपाई मात्र है।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि जांच की यह कड़ी आगे बढ़ते हुए रुद्रप्रयाग तक पहुंची, जहां एक वर्क कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी फर्म भी रडार पर आ गई। इस मामले में स्थिति थोड़ी अलग जरूर थी, क्योंकि यहां फर्म सक्रिय थी और कामकाज भी हो रहा था, लेकिन ITC के नाम पर अपनाया गया तरीका कोटद्वार की फर्मों से हैरान करने वाली हद तक मिलता-जुलता पाया गया। यानी काम के साथ-साथ कागजों में ऐसा खेल खेला गया, जिसमें नियमों की आड़ लेकर इनपुट टैक्स क्रेडिट का गलत फायदा उठाया गया। जांच पूरी होने के बाद जब नतीजे सामने आए तो इस फर्म को दो करोड़ आठ लाख रुपये सीधे राजस्व विभाग को जमा कराने पड़े, जिससे यह साफ हो गया कि गड़बड़ी का पैमाना कितना बड़ा था।
अगर अब तक की वसूली के आंकड़ों पर नजर डालें तो कोटद्वार से तीस लाख रुपये और रुद्रप्रयाग से दो करोड़ से अधिक, यानी कुल मिलाकर दो करोड़ 39 लाख रुपये की राशि सरकारी खजाने में जमा कराई जा चुकी है। हालांकि राज्य कर विभाग का साफ कहना है कि जांच अभी जारी है और वास्तविक कर चोरी की रकम इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। विभाग के अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे संभव हैं, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक शुरुआत भर है। जिस तरह से फर्जीवाड़े की परतें खुल रही हैं, उससे यह संकेत मिल रहा है कि यह केवल एक ट्रेलर है और पूरी फिल्म अभी बाकी है।
इस पूरे प्रकरण ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर अब नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। अगर ये फर्में पकड़ी नहीं जातीं तो क्या ईमानदार करदाताओं का पैसा इसी तरह लुटता रहता? क्या GST सिस्टम के भीतर छिपे ऐसे फर्जीवाड़े सालों तक नज़रों से बचे रहते? यह मामला सिर्फ कर चोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी निगरानी व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगाता है। क्या GST पोर्टल पर फर्जी बिलों की पहचान समय रहते नहीं की जा सकती थी? क्या बंद पड़ी फैक्ट्रियों का डेटा बिजली विभाग और कर विभाग के बीच साझा नहीं होना चाहिए था, ताकि ऐसे मामलों का पहले ही पता चल सके? ये सवाल अब व्यवस्था की पारदर्शिता और तकनीकी मजबूती पर गंभीर बहस की मांग कर रहे हैं।
राज्य कर विभाग की इस कार्रवाई ने एक कड़ा संदेश जरूर दिया है कि अब कागजी कारोबार ज्यादा दिन तक नहीं चल पाएगा। ITC के नाम पर लूट को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और टैक्स चोरी करने वालों पर शिकंजा लगातार कसा जाएगा। लेकिन इसके साथ ही यह सच्चाई भी सामने आई है कि अगर सिस्टम को और मजबूत नहीं किया गया तो ऐसे फर्जीवाड़े नए-नए तरीकों से दोहराए जाते रहेंगे। जाते-जाते यह मामला कुछ सीधे और तीखे सवाल छोड़ जाता है, जिनका जवाब नीति निर्धारकों और प्रशासन को देना होगा। क्या फर्जी ITC घोटाले केवल उत्तराखंड तक सीमित हैं या यह एक देशव्यापी समस्या का संकेत हैं? क्या GST सिस्टम में ऑटोमैटिक रेड फ्लैग मैकेनिज्म को और सख्त करने की जरूरत है? और सबसे अहम सवाल यह कि क्या सिर्फ जुर्माना वसूली ही पर्याप्त है या ऐसे मामलों में कड़ी आपराधिक कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी सरकारी खजाने पर डाका डालने की हिम्मत न कर सके।



