भारत(सुनील कोठारी)। नरेंद्र मोदी के 2014 में किए गए ऐतिहासिक बयान ष्मेरा देश बदल रहा हैष् ने उस समय जनता का ध्यान नहीं खींचा था, लेकिन अब 2024 के चुनाव परिणामों के बाद उनका कथन ष्मेरा भारत बदल चुका हैष् नए अर्थ में उभरकर सामने आया है। उस दौर में देश की जनता यह नहीं समझ पाई थी कि बदलाव किस दिशा में हो रहा है, लेकिन आज के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत की आर्थिक और प्रशासनिक तस्वीर बदल चुकी है। 2014-15 में भारत का बजट लगभग 131.14 लाख करोड़ रुपये था, जबकि अब यह बढ़ते-बढ़ते 50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह अंतर केवल संख्याओं में नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता, सरकारी परियोजनाओं और संसाधनों के प्रबंधन में भी झलकता है। इस बदलाव का असर इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण और राजनीतिक निर्णयों की प्रक्रिया में स्पष्ट दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा और विवादास्पद निर्णय लिया। इससे पहले किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का पर्यावरणीय अनुमोदन पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दिया जाता था, चाहे वह सड़क निर्माण हो, पर्वतमाला परियोजना हो या कोई औद्योगिक प्रोजेक्ट। परंतु मोदी सरकार ने इस प्रणाली में बड़ा बदलाव किया। अब कैबिनेट में जब कोई निर्णय लिया जाता है, तो पर्यावरण मंत्रालय उस बैठक का हिस्सा बन जाता है। इसका मतलब यह है कि बहुमत वाले मंत्रियों के निर्णय के सामने पर्यावरण मंत्री की राय को नजरअंदाज किया जा सकता है। इस नीति के तहत चारधाम यात्रा जैसी परियोजनाओं की मंजूरी तुरंत मिल गई, जबकि पर्यावरण संरक्षण की पुरानी प्रक्रिया पीछे छूट गई। प्रकाश जावड़ेकर उस समय पर्यावरण मंत्री थे, लेकिन वर्तमान में भूपेंद्र यादव हैं, जिनकी सक्रियता के बारे में जनता कम जानती है।
इस बदलाव ने देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय निर्णयों में तेजी ला दी। पिछले लगभग 10-11 वर्षों में कैबिनेट ने लगभग 79 ऐसे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है, जिनका पर्यावरण और खनन क्षेत्र पर सीधा प्रभाव पड़ा। इनमें पहाड़ों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसले शामिल थे। इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, क्योंकि इससे पहले भी कई जगह माइनिंग, निर्माण और जंगलों की कटाई होती थी, लेकिन अब यह लूट और संसाधनों का शोषण अधिक व्यापक और व्यवस्थित हो गया है। गुड़गांव और अरावली जैसे क्षेत्रों में भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की बेशुमार मुनाफाखोरी की घटनाओं ने यह साबित किया कि राजनीतिक और आर्थिक नेटवर्क की मदद से प्रकृति के नुकसान का व्यापार तेज हुआ है।
अरावली पहाड़ियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि लगभग ढाई लाख करोड़ का लाभ उन लोगों ने कमाया, जिन्होंने जमीन की खरीद और बिक्री की। इस प्रक्रिया में बड़े उद्योगपति और निजी फार्महाउस मालिक शामिल थे। कमलनाथ जैसी राजनीतिक हस्तियों के व्यक्तिगत हितों के लिए पर्यावरण को प्रभावित करने की घटनाएं भी सामने आईं। हालांकि वर्तमान में चारधाम यात्रा के लिए सड़क निर्माण का कार्य जारी है, लेकिन इसे रोकने की कोशिशें पूर्व नेताओं द्वारा की गई थीं। मुरली मनोहर जोशी और गोविंदाचार्य जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि हिमालय में सड़कों के निर्माण को रोका जाए, क्योंकि इससे प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
देश में जंगलों की कटाई, पहाड़ों की छलनी, और माइनिंग के खेल ने पिछले दशक में लगभग 5 लाख करोड़ रुपये का लाभ कमाया। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में मिनरल्स और जपउइमत मार्केट से करोड़ों का व्यापार हुआ। कर्नाटक के बेलारी क्षेत्र में रेड्डी ब्रदर्स के मामलों से यह साफ दिखता है कि स्थानीय संसाधनों का शोषण किस हद तक पहुंचा। चारधाम यात्रा के लिए देवदार और ओक के पेड़ काटे गए, 600-700 हेक्टेयर जमीन समतल की गई, और प्राकृतिक जल प्रवाह में बदलाव हुआ। इस विनाश का लाभ माफियाओं की जेब में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये पहुंचा।
महाराष्ट्र के गढ़ चिरोली और चंद्रपुर क्षेत्रों में बड़े कॉर्पाेरेट उद्योगों के माध्यम से माइनिंग और सीमेंट व्यवसाय से भी भारी लाभ हुआ। इन क्षेत्रों से निकाले गए खनिजों में कॉपर, जिंक, ग्रेनाइट, और अन्य प्राकृतिक संसाधन शामिल थे, जिनसे 2.5 से 3 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ। अरावली और अन्य क्षेत्रों में भूमि माफिया, बिल्डर और राजनीतिक गठजोड़ ने मिलकर प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाया।
उड़ीसा, मध्य प्रदेश, गोवा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसी राज्यों में अदालतों में दर्ज मामलों के आंकड़े भी बताते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों का शोषण बड़े पैमाने पर हुआ। जब इन आंकड़ों को जोड़ते हैं, तो यह देखा जा सकता है कि लगभग 30-40 लाख करोड़ रुपये का शोषण प्राकृतिक संसाधनों से हुआ है। इस लूट के हिस्से से सरकारों के लिए भी पैसा आता है, जिससे राजनीतिक गतिविधियों और सत्ता परिवर्तन में लाभ मिलता है। यह दिखाता है कि आर्थिक शक्ति और राजनीतिक नेटवर्क कैसे जुड़कर देश के संसाधनों पर नियंत्रण बनाते हैं।
2023 की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के अनुसार देश में टोटल फॉरेस्ट कवर केवल 25.17ः है, जबकि वास्तविक पेड़ और जंगलों का कवरेज मात्र 3.41ः है। पिछले 10 सालों में यह आंकड़ा लगातार गिरता रहा है। 2013 की रिपोर्ट के अनुसार टोटल फॉरेस्ट कवर लगभग 26ः था, लेकिन इस दौरान औद्योगिक, माइनिंग और अवैध कब्जों ने जंगलों की कटाई को और तेज किया। यह संकेत देता है कि विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर प्रकृति की विनाशकारी लूट जारी रही है।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते हुए भी माइनिंग की सौगातें दी गईं। परसा पेंट कोलेरी क्षेत्र में लगभग 1700 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र में खनन हुआ, जिसमें 170 स्क्वायर किलोमीटर जंगल क्षेत्र प्रभावित हुआ। यह केवल एक क्षेत्र का आंकड़ा है, लेकिन पूरे देश में स्थिति समान है। कुल 42 मामले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में दर्ज हैं, जिनमें 92 सांसद और विधायक सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल पाए गए। इनमें विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल हैं।
अरावली श्रृंखला की लंबाई 692 किलोमीटर है, जिसमें राजस्थान में 550 किलोमीटर आती है। जयपुर, भरतपुर, अलवर, अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, झुंझुनू, सीकर, नागौर और अन्य जिले इस श्रृंखला में शामिल हैं। माउंट आबू में भी पहाड़ों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान देखा गया। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बी आर गवई के फैसले के अनुसार 100 मीटर ऊंचाई वाले पहाड़ों की संख्या मात्र 1048 है, जबकि पूरी श्रृंखला में 1281 पहाड़ हैं।
देश में माइनिंग और बिल्डिंग माफिया की गतिविधियों का असर स्पष्ट है। अदालतों में दर्ज मामलों और रिपोर्टों के अनुसार, भूपेश बघेल, रेड्डी ब्रदर्स और अन्य कॉर्पाेरेट और राजनीतिक गठजोड़ों ने संसाधनों का शोषण किया। पुलिस और प्रशासन के डर के बावजूद लूट का खेल चलता रहा। मध्य प्रदेश में बालू माफिया की गतिविधियों में 18 पुलिसकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं। यह स्पष्ट करता है कि कानून और सुरक्षा तंत्र पर माफियाओं का दबदबा है।
संसाधनों और भूमि पर नियंत्रण रखने वाले पॉलिटिशियन, बिल्डर और माइनिंग माफिया की गतिविधियों से देश की अर्थव्यवस्था और जनता प्रभावित हुई है। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक में शामिल ऐसे 92 प्रतिनिधियों की भागीदारी ने यह सुनिश्चित किया कि लूट और माफियाओं का नेटवर्क निर्बाध चले। यह स्थिति बताती है कि भारत का विकास और राजनीति केवल संसाधनों और मुनाफे के इर्द-गिर्द घूमती है।
देश में जंगलों और पहाड़ों के विनाश की वजह से पर्यावरण संकट गहराया है। ट्री कवर और फॉरेस्ट कवर घटने से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। अदालतों में दर्ज मामलों और रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि विकास के नाम पर भूमि, जंगल और खनिज संसाधनों का लूटखसोट जारी रही। यह संकेत है कि राजनीतिक दबदबा और आर्थिक हित प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं।
इस पूरे परिदृश्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ष्मेरा भारत बदल चुका हैष् का कथन अब नए अर्थ में समझ आता है। देश की राजनीतिक प्रणाली, संसाधनों का प्रबंधन और न्यायिक निर्णय सभी अब इस बड़े नेक्सेस के प्रभाव में काम कर रहे हैं। लूट और माफियाओं के नेटवर्क के कारण जनता की जिंदगी प्रभावित हुई है। देश में विकास और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के बीच लगातार संघर्ष जारी है।
अखिरकार, यह स्पष्ट होता है कि पिछले नौ वर्षों में भारत का स्वरूप बदल गया है। बजट, आर्थिक क्षमता, प्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक गठजोड़ ने देश की तस्वीर बदल दी है। लेकिन यह बदलाव केवल आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर है; प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की कीमत पर। यह सवाल उठता है कि जब सिस्टम, न्यायपालिका और सत्ता के निर्णय इस नेक्सेस के प्रभाव में काम करते हैं, तो जनता का हित कैसे सुरक्षित रहेगा।
भारत का यह बदलाव, चाहे आर्थिक रूप से कितना भी शक्तिशाली दिखे, पर्यावरण और सामाजिक संरचना पर भारी बोझ डाल रहा है। अरावली की पहाड़ियों से लेकर छत्तीसगढ़ के जंगलों तक, देश के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण व्यवस्थित और व्यापक रूप में हुआ है। यह दर्शाता है कि राजनीतिक निर्णय और माफियाओं के गठजोड़ ने देश की नींव पर गहरा असर डाला है। जनता और न्यायपालिका के बीच लगातार संघर्ष और जांच की जरूरत है, ताकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाया जा सके। इस प्रकार, नौ वर्षों के इस सफर में भारत ने अपनी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति में कई गुना वृद्धि की है। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में यह बदलाव संतोषजनक नहीं है। देश में माइनिंग, बिल्डिंग और भूमि माफिया का खेल अब भी जारी है। अदालतों में दर्ज मामलों और रिपोर्टों के आधार पर स्पष्ट है कि विकास और लूट के बीच का यह संघर्ष आने वाले वर्षों में और भी चुनौतीपूर्ण होगा।



