काशीपुर। राधे हरि स्नातकोत्तर महाविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. महिपाल सिंह ने “हिन्दी दैनिक सहर प्रजातंत्र” से विस्तृत बातचीत में अरावली पर्वतमाला से जुड़े हालिया निर्णय को लेकर गंभीर और दूरगामी आशंकाएं व्यक्त कीं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना, जिसमें केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले पहाड़ों को ही अरावली पर्वत श्रृंखला की श्रेणी में रखने की बात कही गई है, पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद खतरनाक संकेत है। डॉ. सिंह के अनुसार यह फैसला सिर्फ एक तकनीकी परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक, भौगोलिक और जलवायु संबंधी प्रभाव अत्यंत व्यापक होंगे। उन्होंने बताया कि अरावली पर्वतमाला कोई साधारण पहाड़ी क्षेत्र नहीं, बल्कि पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत की पारिस्थितिकी का मूल आधार है। इस पर्वतमाला ने सदियों से वर्षा के स्वरूप को नियंत्रित किया है, भू-जल स्तर को बनाए रखा है और रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में अहम भूमिका निभाई है। ऐसे में इसकी परिभाषा को सीमित करना प्रकृति के साथ गंभीर खिलवाड़ के समान है।
अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए डॉ. महिपाल सिंह ने कहा कि 100 मीटर ऊँचाई का मानक अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमाला की वास्तविक परिस्थितियों को समझने के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। उन्होंने बताया कि पर्यावरण विशेषज्ञों और भूगोलविदों का स्पष्ट मत है कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊँचाई की हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनका पर्यावरणीय महत्व कम है। यदि केवल ऊँचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित किया गया, तो लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह निर्णय एक तरह से काग़ज़ी परिभाषा बनकर रह जाएगा, जिससे ज़मीनी सच्चाई पूरी तरह ओझल हो जाएगी। अरावली की छोटी-छोटी पहाड़ियां ही असल में जल संरक्षण, वर्षा संतुलन और तापमान नियंत्रण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। ऐसे में उन्हें संरक्षण से बाहर रखना आने वाले समय में विनाशकारी परिणाम लेकर आएगा, जिसे बाद में सुधार पाना लगभग असंभव होगा।
इस फैसले के संभावित दुष्परिणामों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि अरावली पर्वतमाला दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र के लिए एक प्राकृतिक ढाल की तरह कार्य करती है। यह ढाल पश्चिम की ओर से आने वाली शुष्क हवाओं और रेगिस्तानी प्रभाव को रोकने में मदद करती है। यदि यह ढाल कमजोर पड़ती है, तो हवाओं और मानसून के रास्ते में कोई अवरोध नहीं बचेगा। परिणामस्वरूप रेगिस्तान का दायरा बढ़ेगा, तापमान में असामान्य वृद्धि होगी और जल संकट गहराता चला जाएगा। उन्होंने आगाह किया कि यह केवल दिल्ली या राजस्थान की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों तक महसूस किया जाएगा। अरावली के कमजोर होने से मानसूनी बादल बिना किसी रोक-टोक के सीधे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों पर प्रहार करेंगे, जिससे एक ही स्थान पर अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं। यह स्थिति मानव जीवन और प्राकृतिक संसाधनों दोनों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है।
खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों के संदर्भ में डॉ. महिपाल सिंह ने बेहद सख़्त शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय खनन माफिया और भू-माफिया के लिए रेड कारपेट बिछाने जैसा है। अरावली के बड़े हिस्से के संरक्षण से बाहर आते ही अवैध और अंधाधुंध खनन को खुली छूट मिल जाएगी। इससे न केवल पहाड़ों का अस्तित्व खतरे में पड़ेगा, बल्कि भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत भी नष्ट हो जाएगी। डॉ. सिंह के अनुसार जब खनन होता है, तो मिट्टी की वह परत खत्म हो जाती है जिसमें कृषि की वास्तविक क्षमता होती है। इसका सीधा असर अन्न उत्पादन पर पड़ेगा और किसानों की आजीविका खतरे में आ जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि खनन से भू-जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है, जिससे भविष्य में पीने के पानी की समस्या और गंभीर हो सकती है। यह पूरा परिदृश्य विकास के नाम पर विनाश का उदाहरण बन सकता है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल देते हुए डॉ. महिपाल सिंह ने कहा कि असंतुलित विकास हमेशा विनाश को जन्म देता है। यदि पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी कर केवल आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी गई, तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने चेताया कि अरावली के कमजोर होने से वर्षा का स्वरूप पूरी तरह अनियंत्रित हो सकता है। कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ेगा, तो कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी आपदाएं सामने आएंगी। इससे न केवल कृषि प्रभावित होगी, बल्कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। डॉ. सिंह के अनुसार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पहले से ही स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं और अरावली से जुड़ा यह निर्णय स्थिति को और अधिक भयावह बना सकता है। उन्होंने कहा कि तापमान में असामान्य वृद्धि, प्रदूषण का बढ़ता स्तर और जल संकट एक साथ मिलकर समाज के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं।
समाधान के प्रश्न पर डॉ. महिपाल सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि अरावली पर्वतमाला को ‘क्रिटिकल इकोलॉजिकल ज़ोन’ घोषित करना ही इस समस्या का सबसे प्रभावी उपाय है। उनके अनुसार ऐसा करने से विकास और पर्यावरण के बीच आवश्यक संतुलन बना रहेगा। उन्होंने बताया कि यदि अरावली को यह दर्जा दिया जाता है, तो खनन और निर्माण गतिविधियों पर सख़्त नियंत्रण संभव हो सकेगा। इससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों की जलवायु भी स्थिर बनी रहेगी। डॉ. सिंह ने विशेष रूप से उत्तराखंड का उल्लेख करते हुए कहा कि अरावली वहां के लिए प्राकृतिक ‘स्पीड ब्रेकर’ की तरह काम करती है। यह पश्चिम से आने वाली हवाओं और मानसूनी प्रभाव को संतुलित करती है। यदि यह सुरक्षा कवच कमजोर पड़ा, तो उत्तराखंड को गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार, न्यायपालिका और समाज की भूमिका पर बोलते हुए डॉ. महिपाल सिंह ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पर किसी भी तरह की टिप्पणी करना न तो उचित है और न ही आवश्यक, क्योंकि न्यायपालिका लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि लोकतंत्र में नागरिकों और विशेषज्ञों को अपनी आशंकाएं व्यक्त करने का अधिकार है। पर्यावरण से जुड़े संभावित खतरों पर खुली चर्चा होना आवश्यक है, ताकि समय रहते सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें। डॉ. सिंह के अनुसार सरकार को चाहिए कि वह विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों की राय को गंभीरता से सुने। समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर सजग रहे और अल्पकालिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता दे।
जलवायु परिवर्तन के मौजूदा संकेतों पर बात करते हुए डॉ. महिपाल सिंह ने कहा कि हाल के वर्षों में मौसम का असामान्य व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पहले सितंबर-अक्टूबर में ठंड का अहसास होने लगता था, लेकिन अब दिसंबर के अंत तक भी ठंड पर्याप्त नहीं पड़ रही है। इससे गेहूं जैसी रबी फसलों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसी तरह, बरसात के मौसम में कभी बहुत कम बारिश होती है और कभी अत्यधिक वर्षा से तबाही मच जाती है। यह असंतुलन भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकट बन सकता है। डॉ. सिंह के अनुसार अरावली पर्वतमाला इस संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इसके कमजोर होने से स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
उत्तराखंड के संदर्भ में अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए डॉ. महिपाल सिंह ने चेताया कि अरावली पर्वतमाला को केवल नक्शे की एक रेखा या पहाड़ियों का समूह समझना भारी भूल होगी। उनके शब्दों में अरावली एक ऐसा प्राकृतिक सुरक्षा कवच है, जिसने दशकों से पश्चिम की ओर से उठने वाले आक्रामक मानसून, तेज़ हवाओं और मौसमी दबावों की तीव्रता को नियंत्रित कर रखा है। यही पर्वतमाला उत्तराखंड के लिए एक अदृश्य ढाल की तरह काम करती रही है, जो मानसून की सीधी मार को हिमालय तक पहुंचने से पहले ही कमजोर कर देती है। यदि इस ढाल को जानबूझकर कमजोर किया गया या इसके बड़े हिस्से को समाप्त कर दिया गया, तो उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों पर प्रकृति का सीधा प्रहार तय है। इसके परिणाम केवल आशंका नहीं, बल्कि भयावह भूस्खलन, विनाशकारी बाढ़ और बड़े पैमाने पर तबाही के रूप में सामने आ सकते हैं। डॉ. सिंह ने साफ कहा कि अरावली का संरक्षण किसी एक पीढ़ी की जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न है, जिसे टालना अब संभव नहीं रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि उत्तराखंड के लोगों के लिए यह चेतावनी किसी कल्पना की उपज नहीं, बल्कि आने वाले समय की कठोर सच्चाई बनती जा रही है। अब तक अरावली पर्वतमाला एक प्राकृतिक स्पीड ब्रेकर की भूमिका निभाती रही है, जो पश्चिम से उठने वाली तेज़ मानसूनी हवाओं और उग्र मौसमी सिस्टम की रफ्तार को कम कर देती थी। यही वजह रही कि मानसून की पूरी ऊर्जा सीधे हिमालय से नहीं टकराती थी। लेकिन यदि अरावली को कमजोर किया गया, तो यह संतुलन पूरी तरह टूट जाएगा। तब मानसून बिना किसी रुकावट के अपनी पूरी ताकत के साथ उत्तराखंड की पहाड़ियों पर टूट पड़ेगा। इसका नतीजा वही होगा, जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैंकृअचानक आई भीषण बाढ़, लगातार होते भूस्खलन और जन-धन की अपूरणीय क्षति। यह प्रकृति की चेतावनी है, जिसे अनसुना करना विनाश को न्योता देने जैसा होगा।
डॉ. महिपाल सिंह ने तीखे शब्दों में कहा कि जो लोग यह मानते हैं कि पहाड़ काट देने से केवल ज़मीन समतल होती है, वे भूगोल की बुनियादी समझ से भी अनजान हैं। अरावली केवल चट्टानों का ढेर नहीं, बल्कि हवा की दिशा, नमी के दबाव और वर्षा की तीव्रता को संतुलित करने वाली एक विशाल प्राकृतिक दीवार है। जब यह दीवार टूटती है, तो मानसून की ऊर्जा बिना किसी अवरोध के हिमालय से टकराती है और उसकी मार कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में उत्तरकाशी जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि लगभग तयशुदा परिणाम बन सकती है। प्रकृति अपने नियमों से समझौता नहीं करती और जो भी उनसे टकराता है, उसे उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है।
अंततः डॉ. महिपाल सिंह ने यह सवाल छोड़ते हुए कहा कि भविष्य में बहस इस बात पर नहीं होगी कि किसने पहाड़ काटने की अनुमति दी, बल्कि यह पूछा जाएगा कि समय रहते दी गई चेतावनियों को क्यों अनदेखा किया गया। जब भूगोल को नजरअंदाज कर फैसले लिए जाते हैं और वे प्रकृति के नियमों से टकराते हैं, तो उसकी कीमत किसी एक क्षेत्र या वर्ग को नहीं, बल्कि पूरे समाज को चुकानी पड़ती है। अरावली का कमजोर होना केवल राजस्थान या दिल्ली का संकट नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अस्तित्व से जुड़ा सीधा खतरा है। इसे अनदेखा करना न सिर्फ वर्तमान के साथ अन्याय होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी अंधेरे में धकेलने जैसा गंभीर अपराध साबित हो सकता है।



