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गंगेबाबा रोड और कुण्डेश्वरी मरघट भूमि पर साठ दुकानों की योजना पर कानूनी घमासान तेज

हाई कोर्ट में विचाराधीन जनहित याचिका के चलते नगर निगम की नीलामी योजना संदेहों में घिरी, मरघट भूमि और नहर पर प्रस्तावित व्यावसायिक निर्माण पर कानूनी, सामाजिक व प्रशासनिक स्तर पर विरोध तेज, न्यायिक निर्णय तक अनिश्चितता बनी हुई।

काशीपुर। नगर निगम क्षेत्र में प्रस्तावित व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर एक बार फिर विवाद ने जोर पकड़ लिया है और यह मामला अब शहर की प्रमुख चर्चाओं में शामिल हो गया है। कुण्डेश्वरी रोड पर स्थित मरघट भूमि, वार्ड नम्बर 3 जसपुर खुर्द में प्रस्तावित 28 दुकानों के निर्माण तथा आनंद नर्सरी के सामने गंगेबाबा रोड से जुड़े वार्ड नम्बर 37 के खसरा नम्बर 864/3 पर प्रस्तावित 32 दुकानों के निर्माण और नीलामी को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इन दोनों स्थानों पर कुल 60 दुकानों की योजना को लेकर पैदा हुआ विवाद अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने नगर निगम प्रशासन, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। विकास के नाम पर की जा रही इन गतिविधियों की वैधानिकता और पारदर्शिता को लेकर शहर में नई बहस शुरू हो गई है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल साफ दिखाई देने लगी है।

इसी क्रम में मोहल्ला पक्का कोर्ट निवासी गोपाल सिंह पुत्र स्वर्गीय मोतीराम सैनी ने नगर आयुक्त नगर निगम काशीपुर को एक विस्तृत लिखित ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित दुकानों के निर्माण और नीलामी को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की है। ज्ञापन में उन्होंने साफ तौर पर उल्लेख किया है कि कुण्डेश्वरी रोड की मरघट भूमि पर प्रस्तावित दुकानों और आनंद नर्सरी के समीप गंगेबाबा रोड की भूमि से जुड़े मामलों में गंभीर कानूनी पहलू शामिल हैं। गोपाल सिंह का कहना है कि जब तक इन मामलों का निस्तारण न्यायालय स्तर पर नहीं हो जाता, तब तक किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या निर्माण संबंधी कार्रवाई करना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि कानूनी स्थिति स्पष्ट किए बिना आगे बढ़ा गया, तो भविष्य में यह मामला और अधिक जटिल हो सकता है।

मामले की जानकारी देते हुए गोपाल सिंह पुत्र स्वर्गीय मोतीराम सैनी ने बताया कि आनंद नर्सरी के सामने गंगेबाबा रोड से जुड़े वार्ड नम्बर 37 के खसरा नम्बर 864/3 होने वाले निर्माण को लेकर उन्होंने हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड में जनहित याचिका दायर की है। उनके अनुसार यह याचिका 25 नवम्बर 2025 को माननीय न्यायालय में प्रस्तुत की गई थी और फिलहाल विचाराधीन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई प्रकरण उच्च न्यायालय में लंबित हो, तो उस भूमि पर किसी भी तरह की नीलामी या निर्माण गतिविधि को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया और कानून की भावना के खिलाफ माना जाता है। गोपाल सिंह का कहना है कि इस याचिका के माध्यम से केवल भूमि की वैधता ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े व्यापक जनहित के मुद्दों को भी न्यायालय के समक्ष रखा गया है।

अपने ज्ञापन में गोपाल सिंह ने नगर निगम काशीपुर को यह भी अवगत कराया है कि यदि न्यायालय में लंबित वाद के बावजूद 32 दुकानों की नीलामी या निर्माण कार्य आगे बढ़ाया गया, तो यह माननीय हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड के आदेशों की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है। उनका तर्क है कि अदालत में विचाराधीन मामलों के दौरान किसी भी तरह की जल्दबाजी नगर निगम को गंभीर कानूनी संकट में डाल सकती है। ऐसी स्थिति में न केवल नगर निगम प्रशासन को अवमानना जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, बल्कि बाद में इन दुकानों से जुड़े आम नागरिकों और संभावित खरीदारों को भी भारी परेशानी झेलनी पड़ सकती है। इसी कारण उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया है कि अदालत के अंतिम निर्णय तक सभी प्रस्तावित कार्यों पर रोक लगाई जाए।

ज्ञापन के माध्यम से गोपाल सिंह ने यह भी स्पष्ट किया है कि विवादित भूमि से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज, अभिलेख और तथ्य पहले ही हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड के समक्ष प्रस्तुत किए जा चुके हैं। इन दस्तावेजों की विधिवत जांच और सुनवाई के बाद ही किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासनिक स्तर पर बिना पूरी कानूनी पड़ताल के कोई निर्णय लिया गया, तो वह न केवल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करेगा, बल्कि नगर निगम की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करेगा। गोपाल सिंह ने दो टूक कहा कि उनकी जनहित याचिका का उद्देश्य विकास कार्यों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास पूरी तरह वैधानिक, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हो।

इस पूरे विवाद के सामने आने के बाद स्थानीय लोगों के बीच भी अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ नागरिकों का मानना है कि नगर निगम को न्यायालय के निर्णय का इंतजार करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार का कानूनी विवाद उत्पन्न न हो और विकास कार्य निर्विवाद रूप से आगे बढ़ सकें। वहीं कुछ स्थानीय व्यापारी और क्षेत्रवासी यह भी तर्क दे रहे हैं कि प्रस्तावित दुकानों के निर्माण और नीलामी से इलाके में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। हालांकि उनका भी यही कहना है कि यह सब तभी संभव है, जब सभी कानूनी औपचारिकताओं का पूरी तरह से पालन किया जाए। गंगेबाबा रोड और आनंद नर्सरी के आसपास रहने वाले लोग इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

नगर निगम प्रशासन की ओर से फिलहाल इस प्रकरण को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि मामला न्यायालय में लंबित होने के कारण नीलामी और निर्माण प्रक्रिया को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर जहां कुछ प्रारंभिक तैयारियां पहले ही की जा चुकी हैं, वहीं दूसरी ओर जनहित याचिका के चलते आगे की कार्रवाई पर सवालिया निशान लग गया है। नगर निगम के अधिकारियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे न्यायालय के निर्देशों और कानूनी सलाह को ध्यान में रखते हुए ऐसा निर्णय लें, जिससे भविष्य में किसी भी तरह का विवाद या कानूनी अड़चन खड़ी न हो।

यह मामला अब केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि एक गंभीर कानूनी और जनहित से जुड़ा विषय बन चुका है। हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड में दाखिल जनहित याचिका के चलते कुण्डेश्वरी रोड स्थित मरघट भूमि और आनंद नर्सरी के सामने गंगेबाबा रोड की भूमि से जुड़े सभी निर्णयों पर न्यायालय की पैनी नजर बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि यदि नगर निगम ने अदालत के अंतिम निर्णय से पहले नीलामी या निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, तो इससे न केवल कानूनी अवमानना का खतरा पैदा हो सकता है, बल्कि प्रशासन की छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसी वजह से कई लोग यह सलाह दे रहे हैं कि अदालत के फैसले तक यथास्थिति बनाए रखना ही सबसे सुरक्षित और विवेकपूर्ण विकल्प होगा।

समूचे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि शहरी विकास और व्यावसायिक निर्माण से जुड़े मामलों में कानूनी पहलुओं की अनदेखी करना कितना जोखिम भरा साबित हो सकता है। गोपाल सिंह पुत्र स्वर्गीय मोतीराम सैनी द्वारा उठाए गए सवालों के बाद अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड के आगामी रुख पर टिकी हुई हैं। न्यायालय का निर्णय आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वार्ड नम्बर 3 जसपुर खुर्द की मरघट भूमि पर प्रस्तावित दुकानों तथा वार्ड नम्बर 37 के खसरा नम्बर 864 बेट तीन पर प्रस्तावित 32 दुकानों के निर्माण और नीलामी का भविष्य क्या होगा। तब तक नगर निगम काशीपुर के लिए यह प्रकरण एक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण विषय बना हुआ है, जिसमें संतुलन, धैर्य और पूरी तरह कानूनसम्मत फैसले की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

नगर आयुक्त रणविंदर सिंह बिष्ट ने कहा कि नगर निगम काशीपुर विकास कार्यों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन हर कदम कानून और न्यायिक मर्यादाओं के दायरे में ही उठाया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुण्डेश्वरी रोड स्थित मरघट भूमि और गंगेबाबा रोड से जुड़े क्षेत्रों में प्रस्तावित दुकानों के निर्माण एवं नीलामी से संबंधित जो भी आपत्तियां सामने आई हैं, उन्हें गंभीरता से लिया गया है। नगर आयुक्त ने बताया कि जिस भूमि से संबंधित मामला माननीय हाई कोर्ट ऑफ उत्तराखंड में विचाराधीन है, वहां किसी भी प्रकार की जल्दबाजी नहीं की जाएगी। न्यायालय के निर्देश और कानूनी सलाह के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। उन्होंने कहा कि नगर निगम का उद्देश्य केवल राजस्व अर्जन नहीं, बल्कि शहर का संतुलित, पारदर्शी और नियमसंगत विकास सुनिश्चित करना है। यदि किसी परियोजना पर कानूनी असमंजस है, तो उसका समाधान होने तक स्थिति यथावत रखना ही प्रशासन की प्राथमिकता है। नगर आयुक्त ने भरोसा दिलाया कि जनहित, कानून और न्याय—तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

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