काशीपुर। राधेहरी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय परिसर में उस समय हड़कंप मच गया, जब छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा अपने समर्थकों के साथ अचानक पेट्रोल की बोतल लेकर महाविद्यालय की छत पर चढ़ गए। यह दृश्य देखते ही देखते पूरे कॉलेज और आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया। छात्रों, शिक्षकों और प्रशासनिक अमले में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, छात्र संघ अध्यक्ष की यह अप्रत्याशित और उग्र कार्रवाई परीक्षा व्यवस्था को लेकर उपजे विवाद का परिणाम थी। छत पर चढ़ते ही उन्होंने जोर-शोर से नारेबाजी शुरू कर दी और परीक्षा प्रभारी पर गंभीर आरोप लगाए। कॉलेज प्रशासन ने तत्काल स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पुलिस प्रशासन को सूचना दी, जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। इस दौरान छात्र-छात्राओं में भय और असमंजस की स्थिति बनी रही, वहीं अभिभावकों के बीच भी चिंता साफ दिखाई दी।
बाजपुर रोड स्थित राधेहरी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में इतिहास विषय के पांचवें संस्करण की परीक्षा आयोजित की जानी थी। इसी परीक्षा में शामिल होने के लिए छात्र आलम, अनमोल और एक अन्य छात्र महाविद्यालय पहुंचे थे। बताया गया कि किसी कारणवश इन छात्रों को परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में देरी हो गई। इसी देरी को लेकर विवाद की शुरुआत हुई। छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा का आरोप था कि परीक्षा प्रभारी ने नियमों की आड़ में छात्रों के साथ कठोरता बरती और उन्हें परीक्षा में बैठने से वंचित कर दिया। उनका कहना था कि छात्रों की गलती मामूली थी और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें परीक्षा देने का अवसर दिया जाना चाहिए था। इस घटना ने छात्रों के अधिकारों और परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए।
महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ सुमिता श्रीवास्तव ने पूरे मामले पर अपना पक्ष रखते हुए बताया कि कॉलेज में बीते 2 दिसंबर से परीक्षाएं संचालित की जा रही हैं। उनके अनुसार, परीक्षाएं दो पालियों में आयोजित होती हैं, जिनमें पहली पाली प्रातः 9 बजे से 12 बजे तक और दूसरी पाली 1 बजे से 4 बजे तक चलती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परीक्षा नियमों के अनुसार परीक्षार्थियों को परीक्षा प्रारंभ होने से पहले निर्धारित समय पर महाविद्यालय में उपस्थित होना अनिवार्य है। प्राचार्य ने कहा कि यदि कोई छात्र किसी कारणवश 9 बजे तक या विशेष परिस्थिति में 9रू30 बजे तक भी पहुंचता है, तो उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ शब्दों में कहा कि संबंधित छात्र 10 बजे के बाद परीक्षा केंद्र पर पहुंचे थे, जिस कारण नियमों के तहत उन्हें परीक्षा में शामिल नहीं किया जा सका।
दूसरी ओर, छात्र संघ अध्यक्ष जतिन शर्मा ने प्रशासन की इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि परीक्षा प्रभारी के कक्ष के बाहर “बिना अनुमति प्रवेश वर्जित है” लिखा हुआ था, जिसके कारण छात्र सीधे परीक्षा प्रभारी से संपर्क नहीं कर पाए। उनका आरोप था कि यदि छात्रों को समय रहते अपनी बात रखने का मौका मिलता, तो शायद स्थिति इतनी गंभीर न होती। उन्होंने यह भी कहा कि इसी व्यवहार से आहत होकर उन्होंने यह कठोर कदम उठाया, ताकि प्रशासन छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से ले। छात्र संघ की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या महाविद्यालय प्रशासन का दायित्व केवल नियमों का पालन कराना है या छात्रों के भविष्य और मानसिक स्थिति को भी समझना चाहिए।
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब छात्र संघ अध्यक्ष ने यह आरोप भी लगाया कि वार्ता के दौरान प्राचार्य कक्ष में उनके साथ अभद्रता की गई। इस आरोप को लेकर छात्र संघ ने कॉलेज प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि जब छात्र अपनी समस्या लेकर शांतिपूर्वक बातचीत के लिए पहुंचे, तो उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार क्यों नहीं किया गया। छात्र संघ ने यह भी पूछा कि क्या कॉलेज प्रशासन छात्रों के प्रतिनिधियों से संवाद स्थापित करने को तैयार है या फिर हर मुद्दे पर सख्ती ही अपनाई जाएगी। इस घटनाक्रम ने छात्र और प्रशासन के बीच संवाद की कमी को उजागर कर दिया है, जो किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए चिंताजनक विषय माना जा रहा है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मौके पर पुलिस प्रशासन पहुंचा और समझाइश का प्रयास शुरू किया गया। इस दौरान पूर्व छात्र संघ पदाधिकारी जितेंद्र सिंह जीतू और हरदेव सिंह हैरी भी मौके पर पहुंचे और उन्होंने छात्र संघ अध्यक्ष को शांत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। घंटों की मशक्कत, समझाने-बुझाने और वार्ता के बाद आखिरकार जतिन शर्मा छत से नीचे उतरने के लिए राजी हुए। उनके नीचे उतरते ही महाविद्यालय परिसर में मौजूद लोगों ने राहत की सांस ली। पुलिस और प्रशासन की सूझबूझ से किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना टल गई, लेकिन यह घटना कॉलेज की व्यवस्था पर कई सवाल छोड़ गई।
इस पूरे प्रकरण ने एक ओर जहां छात्र संघ की जिम्मेदारी और उसके आंदोलन के तरीके पर प्रश्नचिह्न लगाया है, वहीं दूसरी ओर महाविद्यालय प्रशासन की संवेदनशीलता और संवाद शैली पर भी बहस छेड़ दी है। छात्र संघ की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि क्या नियमों के नाम पर छात्रों के भविष्य के साथ समझौता किया जाना उचित है, जबकि कॉलेज प्रशासन का पक्ष है कि अनुशासन और नियमों के बिना परीक्षा प्रणाली संचालित नहीं की जा सकती। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए कॉलेजों में कोई लचीली और संवादपरक व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि न तो छात्रों को उग्र कदम उठाने पड़ें और न ही प्रशासन को कठोर निर्णय लेने की स्थिति में आना पड़े।



