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सरकारी स्कूल में बच्चों की जान खतरे में शिक्षा व्यवस्था की चौंकाने वाली लापरवाही उजागर

अलीगंज रोड स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय की छत पर खेलते मासूम, सांप की मौजूदगी, शिक्षिका की अनदेखी और प्रशासन की देर से जागी सक्रियता ने पूरे शिक्षा तंत्र की गंभीर पोल खोल दी।

काशीपुर। एक बार फिर काशीपुर का शिक्षा विभाग जनचर्चा के केंद्र में आ गया है, जहां मासूम बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आई है। शहर के एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय से जुड़ी विडियो और प्रत्यक्ष जानकारी ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर जिम्मेदारियां किस स्तर पर निभाई जा रही हैं। विद्यालय जैसे पवित्र और सुरक्षित माने जाने वाले स्थान में यदि बच्चों की जान जोखिम में डाली जाए, तो यह केवल एक घटना नहीं बल्कि व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित माहौल में सीखने का अवसर देना होता है, लेकिन यहां हालात इसके उलट दिखाई दिए। बच्चों के भविष्य को संवारने का दावा करने वाली प्रणाली में सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने अभिभावकों, समाज और प्रशासन तीनों को झकझोर कर रख दिया है। यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं माना जा सकता, बल्कि पूरे तंत्र की सतर्कता और जवाबदेही पर बहस छेड़ने वाला बन गया है।

अलीगंज रोड पर स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय की यह घटना सामने आते ही लोगों में आक्रोश और चिंता दोनों देखने को मिली। बताया जा रहा है कि विद्यालय समय के दौरान कई बच्चे स्कूल की छत पर चढ़कर खेलते नजर आए, जो किसी भी दृष्टि से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। जिस स्थान पर बच्चों को कक्षाओं में होना चाहिए था, वहीं वे ऊंचाई पर खुले में दौड़ते और खेलते दिखे। यह दृश्य किसी भी अभिभावक के लिए डर पैदा करने वाला है, क्योंकि एक छोटी सी चूक बड़े हादसे में बदल सकती थी। विद्यालय परिसर में मौजूद संसाधनों और सुरक्षा प्रबंधों की पोल इस घटना ने खोल दी। सवाल यह भी उठने लगे कि आखिर छत तक बच्चों की पहुंच कैसे बनी और क्यों किसी ने समय रहते उन्हें रोका नहीं।

तस्वीरों में जो दृश्य कैद हुए, वे और भी अधिक चिंता बढ़ाने वाले हैं, क्योंकि उनमें बच्चों के आसपास सांप की मौजूदगी तक दिखाई दी। ऐसे में खतरे की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। छोटे बच्चों के लिए सांप जैसे जीव का आसपास होना जानलेवा साबित हो सकता है, और ऊपर से ऊंची छत पर खेलना जोखिम को और गंभीर बना देता है। यदि किसी भी पल कोई बच्चा फिसल जाता या डर के कारण संतुलन खो देता, तो परिणाम भयावह हो सकते थे। इन दृश्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि विद्यालय में बच्चों की गतिविधियों पर कोई निगरानी नहीं थी। यह भी सामने आया कि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रही, फिर भी किसी जिम्मेदार की नजर इस ओर नहीं गई, जो व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि घटना के दौरान विद्यालय में ड्यूटी पर मौजूद शिक्षिका अपने कक्ष में बैठी रहीं और लगभग आधे घंटे से अधिक समय तक बच्चों के छत पर होने की उन्हें कोई जानकारी नहीं हुई। यह लापरवाही केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि पेशेवर जिम्मेदारी के उल्लंघन के रूप में देखी जा रही है। शिक्षकों पर बच्चों की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी होती है, क्योंकि विद्यालय समय में अभिभावक उन्हें ही भरोसे के साथ सौंपते हैं। यदि शिक्षिका की सतर्कता समय रहते होती, तो शायद यह स्थिति पैदा ही न होती। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या विद्यालय में नियमित रूप से ऐसा ही होता है और इस बार केवल तस्वीरें सामने आने के कारण मामला उजागर हुआ।

सूचना मिलते ही शिक्षा विभाग के अधिकारी विद्यालय पहुंचे और पूरे घटनाक्रम की जानकारी जुटाई। अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया और बच्चों, विद्यालय स्टाफ तथा अन्य संबंधित लोगों से बातचीत कर स्थिति को समझने का प्रयास किया। प्रशासनिक स्तर पर यह माना गया कि मामला गंभीर है और इसमें किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वाेपरि है और इस तरह की घटनाएं दोहराई नहीं जानी चाहिए। निरीक्षण के दौरान विद्यालय की व्यवस्थाओं, भवन की स्थिति और सुरक्षा उपायों की भी समीक्षा की गई, ताकि भविष्य में ऐसे जोखिमों को रोका जा सके।

खंड शिक्षा अधिकारी धीरेंद्र कुमार साहू ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए जल्द कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उनके द्वारा एक जांच टीम के गठन का आदेश भी दिया गया है, जो घटना की पूरी पड़ताल करेगी और यह पता लगाएगी कि लापरवाही किस स्तर पर हुई। खंड शिक्षा अधिकारी धीरेंद्र कुमार साहू ने यह भी संकेत दिए कि यदि किसी की भी गलती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ नियमानुसार सख्त कदम उठाए जाएंगे। जांच का उद्देश्य केवल दोषी को चिन्हित करना ही नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस व्यवस्था बनाना भी है। प्रशासन का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

आखिरकार सवाल फिर वही खड़ा होता है कि कब तक बच्चों के भविष्य के साथ इस तरह का खिलवाड़ होता रहेगा। क्या यह पहली बार हुआ है या विद्यालय में रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है, यह जांच का विषय है। समाज यह जानना चाहता है कि जिन हाथों में बच्चों की सुरक्षा सौंपी गई है, वे अपनी जिम्मेदारी कितनी गंभीरता से निभा रहे हैं। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी लापरवाहियां किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। यह घटना शिक्षा व्यवस्था को आत्ममंथन का अवसर देती है कि कागजी नियमों के साथ-साथ जमीनी सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है।

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