रामनगर(सुनील कोठारी)। समाज की बदलती तस्वीर इन दिनों रिश्तों के ताने-बाने में साफ दिखाई देने लगी है, जहाँ कभी भावनाओं, त्याग और अपनत्व की मजबूत डोर हुआ करती थी, वहाँ अब औपचारिकताएँ, स्वार्थ और दूरी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही हैं। पिछली पीढ़ी ने जिन रिश्तों को जीवन का आधार माना, उन्हें निभाने के लिए संघर्ष किया, त्याग किया और कई बार अपने सपनों को भी पीछे छोड़ दिया, वही रिश्ते आज की पीढ़ी के लिए बोझ या औपचारिक जिम्मेदारी बनते जा रहे हैं। परिवार की चौखट पर बैठकर घंटों बातचीत करने की परंपरा, एक साथ भोजन करने का सुख और बड़े-बुजुर्गों की सीख को सिर-आंखों पर रखने की भावना अब मोबाइल की स्क्रीन और व्यस्त दिनचर्या में कहीं खोती जा रही है। समय के साथ जीवन की गति तेज हुई है, काम का दबाव बढ़ा है और सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, लेकिन रिश्तों के लिए जो मन की जगह होती थी, वह सिकुड़ती जा रही है। पहले घर के आंगन में जो हंसी गूंजती थी, आज वही आवाजें अलग-अलग कमरों में बिखरी दिखाई देती हैं, और यही बिखराव रिश्तों को भी कमजोर कर रहा है।
बीते समय की बात करें तो पिछली पीढ़ी ने परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, रिश्तों की डोर को हाथ से नहीं छोड़ा। संयुक्त परिवार की परंपरा में दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची और भतीजे-भतीजियों के बीच जो भावनात्मक जुड़ाव था, वह एक सुरक्षित संसार का निर्माण करता था। संकट की घड़ी में पूरा परिवार एक दीवार की तरह खड़ा हो जाता था और खुशी के अवसरों पर सब मिलकर जश्न मनाते थे। उस दौर में रिश्ते केवल खून के नहीं, बल्कि दिल के भी होते थे, जहाँ पड़ोसी को भी परिवार का हिस्सा माना जाता था। छोटी-छोटी गलतफहमियों को बड़ों की समझदारी सुलझा देती थी और संवाद कभी समाप्त नहीं होता था। वहीं आज की दुनिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मकेंद्रित जीवनशैली ने रिश्तों की उस गर्माहट को कम कर दिया है, जो कभी हमारी पहचान का अहम हिस्सा हुआ करती थी।
वर्तमान पीढ़ी की स्थिति इससे अलग दिखाई देती है, जहाँ आधुनिकता, करियर की दौड़ और डिजिटल दुनिया ने भावनात्मक संबंधों की जगह ले ली है। लोग अब एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ संवाद कम और संदेश अधिक हो गया है। रिश्तों को निभाने की जगह, सुविधा के अनुसार उन्हें तोड़ने का चलन बढ़ता जा रहा है। विवाह जैसे पवित्र बंधन भी अब कई बार स्वार्थ और अपेक्षाओं के बोझ तले दबकर टूट जाते हैं। भाई-बहन, माता-पिता और संतान के बीच की दूरी भावनात्मक से अधिक मानसिक हो चुकी है, जहाँ बात करने के लिए समय नहीं और समझने के लिए धैर्य नहीं बचा है। तेजी से बदलती इस जीवनशैली में संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है और यही कारण है कि समाज में अकेलेपन, तनाव और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है, जो एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आ रही है।

आने वाली पीढ़ी की कल्पना की जाए तो तस्वीर और भी चिंताजनक लगती है, जहाँ रिश्तों के बिना जीवन को सामान्य समझने की प्रवृत्ति जन्म ले सकती है। तकनीक के इस युग में बच्चे और युवा भावनात्मक संबंधों से अधिक वस्तुओं और आभासी दुनिया से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं। उन्हें रिश्तों की अहमियत समझाने वाला समय और माहौल दोनों कम होते जा रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो वह समय दूर नहीं जब परिवार केवल एक औपचारिक व्यवस्था रह जाएगा और असली दुनिया में इंसान अकेला ही अपनी जंग लड़ता दिखाई देगा। भावनाओं की जगह गणना और स्वार्थ ने ले ली तो इंसानी जीवन केवल एक मशीन की तरह हो जाएगा, जिसमें संवेदनाओं की कोई जगह नहीं होगी। यह स्थिति समाज के संतुलन के लिए खतरनाक संकेत है, जो हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं और किस विरासत को आने वाली नस्लों के लिए छोड़ रहे हैं।
इन हालातों के बीच आवश्यकता है कि समाज एक बार फिर रिश्तों के महत्व को समझे और उन्हें संजोने की ओर कदम बढ़ाए। संवाद की कमी को समाप्त कर, संवाद की संस्कृति को पुनः जीवित करना होगा, ताकि मन की बातें दिल तक पहुँच सकें। परिवार के भीतर समय बिताने की परंपरा, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने की भावना और बड़ों के अनुभवों का सम्मान पुनः स्थापित करना जरूरी है। स्कूल, समाज और परिवार को मिलकर नई पीढ़ी में संबंधों के प्रति आदर, संवेदना और जिम्मेदारी का भाव जगाना होगा, ताकि रिश्तों की यह कमजोर होती कड़ी फिर से मजबूत बन सके। यही प्रयास एक ऐसे भविष्य की नींव रख सकता है, जहाँ तकनीक के साथ-साथ मानवीय भावनाएँ भी जीवित रहें और इंसान इंसान बनकर ही जीवन की राह पर आगे बढ़े।



