नई दिल्ली(स्वाती गुप्ता)। राजधानी की सांस्कृतिक धड़कनों में ऐसे कई पर्व और परंपराएँ शामिल हैं जिनके बिना राजधानी की पहचान अधूरी लगती है, और इन्हीं में से एक है सदियों पुरानी “फूल वालों की सैर”, जिसे हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता का जीवंत प्रतीक माना गया है। लेकिन इस बार हालात ऐसे बने कि इतिहास में पहली बार यह कार्यक्रम मात्र औपचारिकताओं और अनुमति की उलझनों के कारण रुक गया। राजधानी की हवा में मायूसी इस बात को लेकर भी गूंज रही है कि जिस आयोजन को अंग्रेजों के समय भी लोगों ने अपने संकल्प से जीवित रखा, वह आजाद भारत की सरकारी प्रक्रियाओं की देरी में फंसकर रुक गया। हैरानी तो इस बात की है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस घटना को लगभग अनदेखा कर दिया, जैसे मानो यह कोई मामूली बात हो, जबकि इसका असर दिल्ली की साझा सांस्कृतिक विरासत पर गहरा पड़ रहा है।
पुरानी दिल्ली की गलियों से लेकर महरौली के पथरीले रास्तों तक सदियों से चली आ रही इस परंपरा में श्री योगमाया मंदिर से देवी को फूलों का भव्य छत्र अर्पित किया जाता रहा है और साथ ही महरौली के क्षेत्र में बने आमबाग में लगने वाला मेला इस उत्सव को और भी जीवंत रूप देता आया है। झूले, कलात्मक मंडप, पारंपरिक व्यंजन, गीत-संगीतकृइन सबसे मिलकर यह आयोजन हर वर्ष दिल्ली के सांस्कृतिक कैलेंडर की धुरी बन जाता था। पर इस वर्ष जिम्मेदार विभागों की उदासीनता का आलम यह रहा कि महीनों तक की गई कोशिशें भी किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुंच पाईं। परंपरा के संवाहकों का कहना है कि उन्होंने मार्च महीने से ही अनुमतियों की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, लेकिन धक्के खाते-खाते पूरा समय निकल गया। दिल्ली विकास प्राधिकरणकृयानी डीडीएकृसे अनुमति लेने के प्रयास शुरू किए गए, पर उन्हें ठोस आश्वासन देने के बजाय बार-बार नए निर्देशों, नए कागज़ों और अस्पष्ट जवाबों में उलझा दिया गया।

आयोजकों का कहना है कि सबसे बड़ी बाधा दिल्ली सरकार के वन विभाग की तरफ से आई, क्योंकि फूलों के छत्र और जुलूस का मार्ग महरौली के उन हिस्सों से होकर गुजरता है जो वन क्षेत्र की श्रेणी में आते हैं। नियमों की आड़ में विभाग ने साफ-साफ कोई लिखित अनुमति देने से इंकार कर दिया। बार-बार की गई कोशिशों, फॉलो-अप बैठकों और लगातार इंतजार के बाद भी विभाग की चुप्पी और अनिर्णय ने आयोजकों को हताश कर दिया। वे बताते हैं कि उन्हें बार-बार सिर्फ इंतजार करने के लिए कहा गया, न हां मिली, न ना मिलीकृऔर आखिरकार समय इतना आगे बढ़ गया कि उनके पास कार्यक्रम को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। कहा जा रहा है कि परंपरा की रक्षा करने का संकल्प लेकर उन्हें अनुमति प्रक्रिया की भूलभुलैया में इस कदर भटकाया गया कि आयोजन का पूरा ढांचा ही ढह गया।
यह स्थिति इसलिए भी कड़वी लगती है क्योंकि जिस सैर का इतिहास हिंदू-मुस्लिम मेलजोल की मिसाल के रूप में दुनिया भर में सराहा गया, उसे आज आजाद भारत में ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा जिसे सुनकर पुरानी पीढ़ियाँ भी हतप्रभ हैं। गौरतलब है कि “फूल वालों की सैर” वह आयोजन है जिसे कभी अंग्रेजी हुकूमत ने भी रोकने की कोशिश की थी, क्योंकि यह कार्यक्रम हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों की एकता और सहभागिता का अद्वितीय उत्सव माना जाता था। जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया, तो अंग्रेजों को यह डर सताने लगा था कि अगर दिल्ली में यह पारंपरिक सैर जारी रही, तो दोनों समुदायों के बीच बढ़ती एकजुटता स्वतंत्रता आंदोलन को और बल दे सकती है। नतीजतन, औपनिवेशिक शासन के दबाव में इस परंपरा को रोकना पड़ा। लेकिन विडंबना यह है कि जिसे अंग्रेजों की शासन-व्यवस्था ने रोका था, उसे फिर से प्रारंभ करने का श्रेय 1961 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को जाता है।

उस समय यह माना गया था कि आजाद भारत में यह सैर फिर कभी रुकेगी नहीं। दिल्ली की साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक यह उत्सव हर वर्ष न केवल धार्मिक महत्व रखता था, बल्कि सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का भी सबसे शानदार उदाहरण बनकर उभरता था। श्री योगमाया मंदिर और महरौली की दरगाह पर एक साथ फूल चढ़ाए जाने की यह परंपरा दुनिया को यह संदेश देती थी कि दिल्ली की आत्मा भेदभाव से नहीं, बल्कि संगति और समरसता से धड़कती है। लेकिन इस बार की घटना ने वर्षों से बसे-बसाए विश्वास को गहरा धक्का दिया है। लोगों का कहना है कि यह पहली बार है जब तकनीकी कारणों और विभागीय टालमटोल ने इस आयोजन को रुकवा दिया है, और यह टूटन सिर्फ एक कार्यक्रम का रुकना नहीं, बल्कि परंपरा और इतिहास के लिए चोट जैसा महसूस हो रही है।
फूलवालों की सैर को संचालित करने वाले लोग इस बात से बेहद आहत हैं कि इतने लंबे समय से चली आ रही पहचान को वे अपनी आंखों के सामने लुप्त होता नहीं देखना चाहते थे, पर परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उन्हें निर्णय लेना ही पड़ा। वे बताते हैं कि दिल्ली की संपूर्ण व्यवस्था को पता था कि यह आयोजन कितनी गहरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें रखता है, फिर भी विभागों के बीच तालमेल का अभाव इस कदर हावी रहा कि महीनों की मेहनत और धरोहर की रक्षा का जज़्बा सब व्यर्थ चला गया। उनकी व्यथा यह भी है कि पूरे मामले की गंभीरता के बावजूद किसी बड़े अधिकारी ने पहल कर मामले को सुलझाने का प्रयास नहीं किया। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या आज की दिल्ली अपनी ही सांस्कृतिक पहचान को समझने और बचाने में विफल होती जा रही है?

लोगों में यह चर्चा तेज है कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति होती, तो यह आयोजन हर हाल में हो सकता था। फूलवालों की सैर किसी एक संगठन या परिवार की नहीं, बल्कि दिल्ली की जनता की धरोहर है, जो महरौली के इतिहास से लेकर दिल्ली के सामाजिक संतुलन तक को जोड़ती है। अब जबकि कार्यक्रम रद्द हो गया है, तो कई नागरिकों और इतिहासकारों का मानना है कि यह सिर्फ एक साल का नुकसान नहीं है, बल्कि उस भावनात्मक धारणा पर भी असर पड़ेगा जो वर्षों से इस सैर को शहर की आत्मा का हिस्सा बनाती आई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर आने वाले वर्षों में भी ऐसी जटिलताएँ बनी रहीं, तो कहीं यह परंपरा धीरे-धीरे खो न जाए।
दूसरी ओर, जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर के कई समाचार चौनलों ने इस विषय को बिल्कुल कवरेज नहीं दिया, वह भी लोगों को विचलित कर रहा है। जब किसी शहर की आत्मा से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा अचानक रुक जाए, तो यह किसी साधारण घटना की तरह नहीं देखा जा सकता। परंतु मीडिया ने इसे खबर तक नहीं समझा, जबकि बड़े-बड़े पैनल चर्चाओं में अक्सर राष्ट्र, संस्कृति और परंपराओं पर बहसें की जाती हैं। इस चुप्पी ने भी सवाल खड़े किए हैं कि आखिर क्यों दिल्ली की इस साझा धरोहर को अनदेखा कर दिया गया? क्या यह विषय इतना महत्वहीन था या फिर मीडिया की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं?

आयोजकों की यह बात भी गहरी चोट पहुंचाती है कि जिस परंपरा को अंग्रेजों ने भय के कारण दबाया था, वही आज अपनी ही जमीन पर निर्णायक सहयोग न मिलने से रुक गई। यह घटना सिर्फ महरौली या दिल्ली की बात नहीं है, बल्कि यह देश की उस सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी है जिसने सौहार्द की राह दिखाई है। अधिकारियों द्वारा “लटकाने-अटकाने-भटकाने” का जो सिलसिला महीनों चलता रहा, उसने न केवल आयोजन को प्रभावित किया बल्कि लोगों की उस भावनात्मक आस्था को भी चोट पहुंचाई जो इस उत्सव से गहराई से जुड़ी हुई थी।



