नई दिल्ली। देश की राजनीति में आज उस समय बड़ा मोड़ देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक तंत्र द्वारा लंबे समय से गढ़े गए दो बड़े आरोप एक ही दिन में पूरी तरह धराशायी हो गए। वर्षों से जिन मुद्दों को आधार बनाकर विपक्षी नेताओं को कठघरे में खड़ा किया जा रहा था, वही आरोप अब अदालत और संसद के आधिकारिक जवाबों के सामने टिक नहीं पाए। एक ओर नेशनल हैरल्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को अदालत ने सुनवाई योग्य तक नहीं माना, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय से पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी सामग्री के गायब होने के आरोप भी सरकार के लिखित जवाब के बाद पूरी तरह झूठे साबित हो गए। इन दोनों घटनाओं ने न सिर्फ राजनीतिक बहस को नई दिशा दी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि पिछले एक दशक से देश की जनता के सामने जो कथानक परोसा जा रहा था, उसकी सच्चाई क्या थी और उसे किस उद्देश्य से आगे बढ़ाया गया।
लगभग दस वर्षों से नेशनल हैरल्ड मामले को लेकर देश की राजनीति गरमाई हुई थी। प्रवर्तन निदेशालय ने इस केस में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी सहित अन्य नेताओं के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज किया था। इस मामले को बार-बार सार्वजनिक मंचों पर उठाया गया और इसे बड़े भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। लेकिन अब एक निचली अदालत ने इस पूरे प्रकरण को सुनने लायक तक नहीं माना और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में एजेंसी की भूमिका और जांच प्रक्रिया पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी कीं, जिससे यह संकेत मिला कि आरोपों के पीछे ठोस कानूनी आधार नहीं था। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया कि जिस केस को वर्षों तक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया, वह न्यायिक कसौटी पर टिक ही नहीं पाया।
अदालत के इस निर्णय ने उन तमाम दावों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिनके जरिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को बार-बार घेरने की कोशिश की जाती रही। नेशनल हैरल्ड मामले को लेकर यह कहा जाता रहा कि इसमें बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं और यह राष्ट्रीय स्तर का घोटाला है। मगर न्यायालय ने जब इसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया, तो यह संदेश भी गया कि कानून के दायरे में इन आरोपों की विश्वसनीयता बेहद कमजोर थी। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या जांच एजेंसियों का उपयोग केवल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि जिन आरोपों के सहारे एक दशक तक माहौल बनाया गया, उनके निराधार साबित होने की जिम्मेदारी कौन लेगा।
इसी दिन दूसरा बड़ा झटका उन आरोपों को लगा, जो प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय से पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित दस्तावेजों और सामग्री के गायब होने को लेकर लगाए जा रहे थे। लंबे समय से यह प्रचारित किया जाता रहा कि संग्रहालय से नेहरू जी से जुड़ी अहम फाइलें और वस्तुएं गायब कर दी गई हैं। यहां तक कि यह आरोप भी लगाया गया कि 51 बक्सों में भरकर सामग्री को बाहर ले जाया गया और इसके लिए सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया। इन दावों को तथाकथित राष्ट्रवादी विमर्श और मीडिया की बहसों में बार-बार दोहराया गया। लेकिन अब केंद्र सरकार के आधिकारिक जवाब ने इन सभी आरोपों की हवा निकाल दी है और यह साफ कर दिया है कि संग्रहालय से एक भी सामग्री गायब नहीं हुई है।
लोकसभा में पूछे गए एक तारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से बताया कि प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय से पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई भी दस्तावेज या सामग्री न तो गायब हुई है और न ही अवैध रूप से हटाई गई है। इस प्रश्न को भारतीय जनता पार्टी के सांसद डॉ संबित पात्रा ने स्वयं उठाया था, जिसके जवाब में संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने वर्ष 2025 के वार्षिक निरीक्षण का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की। मंत्री ने सदन को बताया कि निरीक्षण के दौरान नेहरू जी से जुड़ी किसी भी वस्तु के लापता होने की पुष्टि नहीं हुई। सरकार के इस आधिकारिक वक्तव्य के बाद उन तमाम आरोपों पर विराम लग गया, जिन्हें लंबे समय से सच्चाई के रूप में पेश किया जा रहा था।
सरकार के इस जवाब के सामने आने के बाद यह भी उजागर हुआ कि किस तरह बिना तथ्यात्मक आधार के गंभीर आरोप गढ़े गए और उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार दोहराया गया। प्रधानमंत्री संग्रहालय से जुड़े इस मुद्दे पर न केवल राजनीतिक बयानबाजी हुई, बल्कि कई टीवी चौनलों पर लंबी बहसें भी चलीं, जिनमें नेहरू परिवार को निशाने पर लिया गया। अब जब खुद केंद्र सरकार ने संसद में लिखित रूप से यह स्वीकार किया है कि कोई भी सामग्री गायब नहीं है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि गलत सूचना फैलाने वालों की जवाबदेही कैसे तय होगी। इस घटनाक्रम ने यह भी दिखा दिया कि आधिकारिक दस्तावेज और निरीक्षण रिपोर्टें उन अफवाहों से कहीं अधिक मजबूत होती हैं, जिन्हें प्रचार के जरिए स्थापित करने की कोशिश की जाती है।
इन दोनों घटनाओं ने एक साथ मिलकर उस राजनीतिक रणनीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिसमें आरोपों और शंकाओं के सहारे जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की जाती रही। नेशनल हैरल्ड मामले में अदालत का फैसला और प्रधानमंत्री संग्रहालय के मुद्दे पर सरकार का स्पष्ट जवाब यह संकेत देते हैं कि सत्य अंततः सामने आता ही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन खुलासों के बाद न केवल विपक्ष को नैतिक बल मिला है, बल्कि जनता के बीच भी यह संदेश गया है कि हर आरोप को तथ्यों और कानून की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। अब देखना यह होगा कि इन दोनों मुद्दों के धराशायी होने के बाद राजनीतिक विमर्श किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या भविष्य में ऐसे आरोप लगाने से पहले अधिक सावधानी बरती जाएगी।



