उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)। कभी जहां हवा की सरसराहट दिल को सुकून देती थी, वहां अब प्लास्टिक की खड़खड़ाहट और गंदगी का शोर सुनाई देता है। उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में फैले ये बुग्याल — यानी पहाड़ों की सांसें — अब इंसानी लालच और लापरवाही के नीचे दम तोड़ रहे हैं। जहां कभी मखमली घास के कालीन पर बादलों की छांव खेला करती थी, अब वहां बिखरे हैं चिप्स के पैकेट, पानी की बोतलें और प्लास्टिक का अंबार। यह दृश्य किसी चेतावनी से कम नहीं। देवभूमि के ये स्वर्गिक स्थल अब धीरे-धीरे नर्क जैसे दृश्य पेश कर रहे हैं, और दोष सिर्फ पर्यटकों का नहीं बल्कि व्यवस्था की चुप्पी का भी है।
तुंगनाथ, चौकता और चंद्रशिला जैसे पवित्र और मनमोहक स्थल आज मानव की लापरवाही का प्रतीक बन चुके हैं। जहां कभी ट्रैकर्स के कदम पड़ते ही हरियाली मुस्कुरा उठती थी, अब वहीं हर कदम पर टूटी मिट्टी, बंजर भूमि और गंदगी के ढेर नज़र आते हैं। पर्यटन के नाम पर प्रकृति से की जा रही खिलवाड़ ने इन बुग्यालों को बुरी तरह घायल कर दिया है। हर साल हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु और साहसिक पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन उनके पीछे रह जाता है कचरे का पहाड़। गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आर.के. मैखरी कहते हैं कि उत्तराखंड में ट्रैकिंग को लेकर कोई ठोस नीति नहीं है। “नेपाल जैसे देशों में हर ट्रैकर पर सख्त निगरानी होती है, वहां सीमित प्रवेश होता है और पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाता है, पर उत्तराखंड में जो चाहे जहां तक पहुंच जाता है,” वे कहते हैं। नीति किताबों में है, ज़मीन पर नहीं।
पहले ये बुग्याल स्थानीय चरवाहों के संरक्षण में सुरक्षित रहते थे। भेड़-बकरी पालक न सिर्फ इन्हें चरागाह के रूप में इस्तेमाल करते थे बल्कि इनकी रक्षा भी करते थे। लेकिन बीते तीन दशकों में इनकी संख्या आधी से भी कम रह गई है। चरवाहों के पलायन से निगरानी तंत्र पूरी तरह टूट चुका है। अब न तो सीमित चराई होती है, न कचरा साफ करने की कोई व्यवस्था। औषधीय पौधों का अंधाधुंध दोहन नई समस्या बनकर उभरा है। लोग आर्थिक लाभ के लिए दुर्लभ जड़ी-बूटियों को बिना सोचे समझे खोद रहे हैं। नतीजतन, मिट्टी का अपरदन और भू-क्षरण बढ़ रहा है। नीति, चमोली और पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में पहाड़ों की त्वचा अब छिलने लगी है, जिससे पारिस्थितिकी असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है।

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुदीप सेनवाल का मानना है कि अब वक्त है जब हर बुग्याल के लिए ecological carrying capacity तय की जाए — यानी यह निर्धारित किया जाए कि किसी समय में वहां कितने पर्यटक सुरक्षित रूप से जा सकते हैं। “अगर यह तय नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में ये बुग्याल सिर्फ इतिहास बन जाएंगे,” वे चेतावनी देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार इन चेतावनियों को गंभीरता से ले रही है? क्या नीति-निर्माता उन पर्वतीय इलाकों की पुकार सुन पा रहे हैं जो हर दिन कचरे और कार्बन के बोझ तले दब रहे हैं?
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जगतसिंह जंगली साफ कहते हैं — “अगर हिमालय बीमार पड़ गया तो पूरा देश प्यासा रह जाएगा।” उनके शब्द चेतावनी नहीं, भविष्य की झलक हैं। हिमालय की गोद में जन्मी गंगा और यमुना जैसी नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं। यदि यही पहाड़ असंतुलन और प्रदूषण की चपेट में आ गए तो नदियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि पहले लोग केवल तुंगनाथ धाम तक जाते थे, लेकिन अब ‘एडवेंचर’ के नाम पर चंद्रशिला की चोटियों तक भीड़ पहुंच रही है, जिससे पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है। हर ट्रिप एक नए घाव की तरह है जो हिमालय के सीने पर लग रहा है।
इन बुग्यालों की मिट्टी में छिपी हरियाली अब धीरे-धीरे मर रही है। वैज्ञानिक और स्थानीय दोनों मानते हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है। पर्वतीय पारिस्थितिकी को समझे बिना विकास की बात करना खुद विनाश को बुलावा देना है। उत्तराखंड में पर्यटन को नियंत्रित करने वाली कोई एकीकृत नीति नहीं है। प्रशासन की निगरानी सीमित है, और नियमों का पालन न के बराबर। वहीं स्थानीय लोगों में भी अब अपने पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता घट रही है। जहां कभी लोग स्वयं सफाई करते थे, अब वही लोग खुद कचरा छोड़ रहे हैं।

अब ज़रूरत है ठोस नीति और सामूहिक ज़िम्मेदारी की। अगर सरकार हर बुग्याल की सीमित क्षमता तय करे, ट्रैकिंग एजेंसियों को जवाबदेह बनाए और स्थानीय युवाओं को निगरानी में जोड़े, तो हालात बदल सकते हैं। स्कूल-कॉलेज स्तर पर भी ‘इको-ट्रैकिंग अवेयरनेस प्रोग्राम’ शुरू किया जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी इन धरती की सांसों को बचाने के लिए जागरूक हो सके। साथ ही, बुग्यालों में पर्यटक गतिविधियों को मौसमी सीमा तक सीमित रखा जाए ताकि प्राकृतिक संतुलन कायम रहे।
क्योंकि सवाल सिर्फ हरियाली का नहीं, अस्तित्व का है। जब जनता बोलेगी, तभी शासन सुनेगा। अगर आज हमने कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां इन बुग्यालों को सिर्फ तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएंगी। पर्यटन और विकास दोनों ज़रूरी हैं, लेकिन प्राकृतिक मर्यादा के भीतर। वरना वह दिन दूर नहीं जब मखमली धरती की जगह केवल बंजर चट्टानें रह जाएंगी। हिमालय अब मौन नहीं, घायल है। और उसकी कराह सुनाई दे रही है — बस हमें उसे सुनने की ज़रूरत है।



