- हर की पैड़ी पर कचरा कांड ने गंगा की पवित्रता पर भारी सवाल खड़े किए
- गंगा में कचरा फेंकते कर्मचारी देख देशभर में आस्था और व्यवस्था पर गुस्सा भड़का
- हर की पैड़ी की मर्यादा टूटी गंगा सफाई व्यवस्था की हकीकत वीडियो में सामने आई
- हरिद्वार में गंगा की गोद में कचरा गिरा प्रशासनिक जिम्मेदारी पर तीखे प्रश्न उभरे
- गंगा में बहता कचरा देख श्रद्धालु आहत हरिद्वार की छवि पर गंभीर चोट
हरिद्वार। धर्मनगरी के हृदय में बसे पवित्र हर की पैड़ी की छवि को झकझोर देने वाला एक वीडियो इन दिनों पूरे देश में सनसनी की तरह फैल रहा है। यह वही स्थान है जहां हर सुबह और शाम लाखों श्रद्धालु गंगा मैया के दर्शन कर अपने मन, कर्म और विचारों को शुद्ध करने आते हैं। यह वही ब्रह्मकुंड है, जिसकी पवित्रता और निर्मलता की मिसाल पूरे विश्व में दी जाती है। लेकिन हाल ही में सामने आए इस वायरल दृश्य ने लोगों के विश्वास को अंदर तक डगमगा दिया है। वीडियो में दिखाई देता है कि सफाई व्यवस्था को संभालने वाले ही लोग बड़े-बड़े कट्टों में भरा कचरा सीधे गंगा में धकेल रहे हैं। इस विडंबना पर जनता आक्रोशित भी है और स्तब्ध भी कि जिन हाथों को पवित्र धारा को स्वच्छ रखना था, वही हाथ उसकी निर्मलता को तार-तार कर रहे हैं।
देश भर में उथल-पुथल इसी वजह से मची है क्योंकि गंगा को मां मानने वाली हमारी संस्कृति में ऐसा अपराध सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि भावनाओं की अनदेखी भी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह महज लापरवाही है, या फिर हमारी व्यवस्था की इतनी बड़ी खामी है कि पवित्र धारा की गोद को कूड़ेदान समझ लिया गया। यह वीडियो कार्तिक पूर्णिमा के बाद का बताया जा रहा है जब हरिद्वार में भारी भीड़ उमड़ी थी और कूड़ा भी अधिक इकठ्ठा हुआ। लेकिन क्या यह समाधान था कि जमीन पर पड़े कचरे को एकत्रित कर सुरक्षित निस्तारण करने की जगह उसे उस नदी में बहा दिया जाए जिसे संसार मोक्षदायिनी के रूप में पूजता है।

गंगा जिसे जीवनदायिनी समझा गया है, गंगा जिसे सदियों से देश की सांस्कृतिक आत्मा माना जाता है, उसी नदी में इस तरह कचरा फेंकने की घटना किसी त्रासदी से कम नहीं लगती। हरिद्वार के घाटों पर आने वाले वे श्रद्धालु जो हजारों किलोमीटर दूर से सिर्फ इस विश्वास के साथ आते हैं कि मां गंगा के स्पर्श से उन्हें पुण्य मिलेगा, वे इस दृश्य को देखकर क्या महसूस करेंगे। आस्था पर चोट कैसी होती है, यह घटना बिल्कुल वैसा ही एहसास कराती है। घाटों पर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं दृ “गंगा में कूड़ा फेंकना मना है”, “स्वच्छ गंगादृनिर्मल गंगा” दृ पर वीडियो का वास्तविक दृश्य इन नारों को खोखला साबित करता सा दिखता है। यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर इस पवित्र स्थल की शुचिता बचाने की वास्तविक ज़िम्मेदारी किसकी है।
मुख्य नगर आयुक्त ने बयान जारी कर कहा है कि हर की पैड़ी ब्रह्मकुंड क्षेत्र नगर निगम के नियंत्रण में नहीं बल्कि गंगा सभा के अधिकार क्षेत्र में आता है। उनका कहना है कि वीडियो उनके संज्ञान में है और वे गंगा सभा से कार्रवाई की अपेक्षा कर रहे हैं। लेकिन इससे एक नई बहस जन्म ले चुकी हैकृजब इतने संवेदनशील स्थान पर सफाई का काम होता है तो उसकी निगरानी कौन करता है, किसकी जवाबदेही तय की जाती है, और कैसे व्यवस्था इस हद तक ढह जाती है कि कर्मचारी खुलेआम कचरा नदी में उड़ेल दें। जनता यह समझना चाहती है कि प्रशासन, नगर निगम, स्थानीय संस्थाएं और गंगा सभा जैसे संगठनों में विभाजित यह जिम्मेदारी आखिर किसके कंधों पर टिकती है।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही लोगों ने मुख्यमंत्री को टैग कर जवाब मांगा है कि गंगा वास्तव में स्वच्छ हुई है या सिर्फ रिपोर्टों और कागजों में उसे स्वच्छ घोषित कर दिया गया है। यह भी सच है कि वर्षों से गंगा सफाई पर सरकारों ने भारी भरकम बजट खर्च किया, अनेकों परियोजनाएं शुरू कीं, अदालतों के दिशा-निर्देश आए और कर्मचारियों की तैनाती भी हुई। लेकिन जमीन पर दिखाई देने वाली यह तस्वीर उन सभी दावों को खोखली करने के लिए काफी है। यह सवाल और भी तीखा इसलिए लगता है क्योंकि यह घटना सामान्य जगह की नहीं बल्कि हरिद्वार जैसी आध्यात्मिक राजधानी की है, जहां हर दिन हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ती है।
हर सुबह होने वाली भव्य गंगा आरती दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है, लेकिन उसी आरती स्थल के पास कचरे से भरे कट्टे सीधे गंगा में गिरते दिखे, यह दृश्य व्यवस्था का वह चेहरा दिखाता है जिस पर शायद ही कोई पर्दा डाल सके। प्लास्टिक की बोतलें, फूल-मालाएं, सीवर कचरा और पूजा सामग्री के ढेरकृये सब पहले भी गंगा के लिए चुनौती थे, लेकिन अब जब कचरे को कर्मचारी खुद नदी में डालते नजर आए हैं, तो सवाल और गहरे हो गए हैं। निगरानी कहां थी? सुपरवाइजर कहाँ थे? किसने यह निर्देश दिया था? या फिर सबकी आंखों के सामने यह सब होता रहा और किसी ने ध्यान नहीं दिया?

हरिद्वार की पहचान केवल धार्मिक नहीं, यह देश की आध्यात्मिक छवि का भी प्रतीक है। विदेशी यात्री यहां सिर्फ पर्यटन के लिए नहीं आते, बल्कि भारत की संस्कृति का अनुभव लेने पहुंचते हैं। उनका पहला सामना यदि ऐसे वीडियो से होगा तो यह देश की छवि को भी नुकसान पहुंचाएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह वीडियो न केवल गंगा की पवित्रता पर प्रश्न खड़ा करता है, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी पर भी सवाल करता है। यदि यह वीडियो सामने न आता तो क्या प्रशासन कोई कार्रवाई करता? क्या किसी को यह तक मालूम पड़ता कि यहां क्या हो रहा है? यही वह पहलू है जो सबसे बड़ा सिस्टम फेलियर उजागर करता है।
आज जो बहस चल रही है, वह किसी एक कर्मचारी की गलती तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक ढांचे पर सवाल उठा रही है जो रोज़ गंगा की स्वच्छता का डेटा भेजता है, रिपोर्ट में बढ़िया सफाई का दावा करता है और कागजों पर सबकुछ उत्तम बताया जाता है। लेकिन यदि व्यवस्था सच में इतनी पारदर्शी होती तो यह वीडियो सामने कैसे आता? गंगा की सफाई क्या सिर्फ योजना, पोस्टर और बजट खर्च का मुद्दा रह गई है, या वास्तव में उसकी पवित्रता की चिंता अब पीछे छूट गई है? गंगा जैसी संवेदनशील धारा पर निगरानी इतनी कमज़ोर क्यों है? क्या सिस्टम जानबूझकर जिम्मेदारी से बच रहा है?
इन सभी सवालों के बीच लोगों का असली दर्द यह है कि उनकी आस्था सुरक्षित है या नहीं। गंगा सिर्फ नदी नहीं है दृ यह हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति, हमारी भावनाओं की धारा है। यदि उसके संरक्षण में हम विफल रहे तो सिर्फ एक जलस्रोत नहीं खोएंगे, बल्कि अपनी पहचान भी खो देंगे। समाज और प्रशासन दोनों को मिलकर ही इस संकट का समाधान करना होगा। वीडियो को वायरल करने की अपील की जा रही है ताकि जागरूकता बढ़े और सख्त कार्रवाई हो सके, क्योंकि जागरूक समाज ही अपनी विरासत की रक्षा कर सकता है।

वही गंगा सभा के महामंत्री तन्मय वशिष्ठ ने इस वीडियो को लेकर कहा कि सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल रहा यह दृश्य अत्यंत चिंताजनक है, जिसमें हर की पैड़ी पर कुछ स्वयंसेवक जले हुए दीयों को मां गंगा में प्रवाहित करते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा कृत्य न सिर्फ पूर्णत: अनुचित है, बल्कि गंगा की पवित्रता के साथ सीधा अनादर भी है, जिसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। तन्मय वशिष्ठ ने स्पष्ट किया कि जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, गंगा सभा ने तत्काल उन स्वयंसेवकों को उनके कार्य से हटा दिया है और उन्हें चेतावनी देते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की गई है।
उन्होंने आगे बताया कि भविष्य में इस प्रकार की किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए गंगा सभा ने सख़्त निर्देश जारी कर दिए हैं। हर की पैड़ी परिसर में अब किसी भी स्वयंसेवक को बिना अनुमति ऐसी गतिविधि करने की इजाज़त नहीं होगी। इसके लिए एक विशेष मॉनिटरिंग टीम गठित की गई है, जो प्रतिदिन घाटों की निगरानी करेगी ताकि गंगा की धारा में मिट्टी के दीये, फूल, प्लास्टिक अथवा किसी भी प्रकार का पदार्थ प्रवाहित होने से पूरी तरह रोका जा सके।
तन्मय वशिष्ठ ने आश्वासन दिया कि हर की पैड़ी की गरिमा, गंगा की पवित्रता और श्रद्धालुओं की भावनाओं की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और भविष्य में यदि कोई भी व्यक्ति या स्वयंसेवक ऐसा करते पाया जाता है, तो उसे बिना किसी देरी के सेवा कार्य से हटा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि गंगा हमारी आस्था, संस्कृति और पहचान हैं—उनकी निर्मलता को बनाए रखना हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है, और गंगा सभा इस दिशा में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगी।



