हरिद्वार। मनसा देवी मंदिर मार्ग पर रविवार की सुबह घटित हृदय विदारक भगदड़ की घटना ने संपूर्ण उत्तराखंड सहित देश को झकझोर कर रख दिया है। श्रद्धा और आस्था का केंद्र माने जाने वाले इस पवित्र स्थल पर उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब वीकेंड होने के कारण भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन हेतु उमड़ पड़े। सीढ़ी मार्ग पर अचानक भीड़ के संतुलन से बाहर होते ही तीर्थयात्रियों के बीच आपाधापी शुरू हो गई, जिसमें लोग एक-दूसरे पर गिर पड़े और हालात इस कदर बिगड़े कि देखते ही देखते वहां चीख-पुकार का मंजर बन गया। छह लोगों की जान इस हादसे में चली गई, जबकि दर्जनों श्रद्धालु घायल हो गए। मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस की ओर से मौके पर पहुंचकर राहत और बचाव कार्यों को तुरंत शुरू किया गया, लेकिन तब तक कई परिवारों पर मातम छा चुका था। इस हादसे ने राज्य की प्रशासनिक तैयारियों और भीड़ नियंत्रण व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दर्दनाक घटना पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार इस कठिन घड़ी में पीड़ितों और उनके परिजनों के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से संदेश जारी करते हुए लिखा कि मनसा देवी मंदिर मार्ग पर जो त्रासद स्थिति बनी, वह अत्यंत पीड़ाजनक है। उन्होंने इस घटना की मजिस्ट्रियल जांच के निर्देश देते हुए प्रशासन को आदेशित किया कि हादसे के कारणों की विस्तृत समीक्षा करते हुए जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाए। इसके साथ ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार प्रशासनिक अधिकारियों के संपर्क में हैं और राहत कार्यों की प्रगति पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए माता रानी से प्रार्थना की है।
दुर्घटना के तुरंत बाद सरकार ने राहत के तौर पर मुआवजे की भी घोषणा की। पुष्कर सिंह धामी ने जानकारी दी कि हादसे में जिन श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई है, उनके परिजनों को ₹2-2 लाख की सहायता राशि प्रदान की जाएगी। वहीं, जो लोग घायल हुए हैं, उन्हें ₹50-50 हजार की आर्थिक मदद दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने इस घटना को राज्य के लिए एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण क्षण बताते हुए कहा कि यह सरकार की प्राथमिकता है कि ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए सुरक्षा मानकों की समीक्षा के साथ भीड़ प्रबंधन की नीति को और अधिक प्रभावशाली बनाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि पीड़ित परिवारों के दुख में राज्य सरकार पूरी संवेदना के साथ भागीदार है और हर संभव सहायता दी जाएगी।
रविवार की सुबह जब यह हादसा घटित हुआ, उस समय मनसा देवी मंदिर मार्ग पर भीड़ अपने चरम पर थी। उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों से हजारों श्रद्धालु मनसा माता के दर्शन के लिए पहुंचे थे। मंदिर के मुख्य पैदल मार्ग पर जैसे-जैसे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई, सुरक्षा व्यवस्था लड़खड़ाती नजर आने लगी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं की भीड़ अचानक असंतुलित हो गई और कुछ श्रद्धालु एक-दूसरे से टकरा गए। यही टकराव बड़ी भगदड़ में तब्दील हो गया। इस दौरान कुछ श्रद्धालु जमीन पर गिर गए और उनके ऊपर अन्य लोग चढ़ते चले गए, जिससे मौके पर ही कई लोगों की जान चली गई। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के मुताबिक, इस मार्ग पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश या मार्गदर्शन नहीं था, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
इस भयावह स्थिति के सामने आने के बाद राज्य प्रशासन की ओर से राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाई गई। पुलिस, फायर ब्रिगेड, आपदा राहत बल और मंदिर प्रशासन के कर्मचारियों ने मिलकर घायलों को अस्पताल पहुंचाया और क्षेत्र को खाली कराया। हालांकि, यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि वीकेंड और सावन मास जैसे भीड़भाड़ वाले दिनों में प्रशासन ने अग्रिम व्यवस्था क्यों नहीं की? क्या सुरक्षा मानकों और भीड़ नियंत्रण की योजना पहले से नहीं बनाई गई थी? इस हादसे ने साफ कर दिया है कि धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा और व्यवस्थापन को लेकर एक ठोस और दीर्घकालिक रणनीति की सख्त आवश्यकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा मजिस्ट्रियल जांच का आदेश दिया जाना इस दिशा में एक सकारात्मक कदम कहा जा सकता है, किंतु यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष हो और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो।
इस त्रासदी के बाद प्रदेश में शोक की लहर है। सोशल मीडिया पर लोगों ने मृतकों के प्रति संवेदना प्रकट की है और सरकार से दोषियों को सख्त सजा देने की मांग की है। तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं और आम जनमानस अब यह जानना चाहता है कि धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा के लिए क्या दीर्घकालिक कदम उठाए जाएंगे। मनसा देवी मंदिर जैसी जगहों पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं, ऐसे में यह हादसा एक चेतावनी है कि भावनाओं और आस्था के स्थानों को महज धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि उन्हें सुनियोजित और सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए निर्णयों से एक उम्मीद बनी है कि राज्य सरकार अब तीर्थ स्थलों पर भीड़ प्रबंधन की दिशा में प्रभावी कदम उठाएगी और भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस प्रणाली तैयार करेगी।



