रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है, जब यह ख़बर सामने आई कि धामी सरकार ने मीडिया प्रचार और सरकारी चेहरा चमकाने के लिए करीब एक हजार करोड़ रुपये खर्च करने का निर्णय लिया है। यह रकम सरकार के विज्ञापन, छवि निर्माण और जनसंपर्क के लिए तय की गई बताई जा रही है। लेकिन इसी के समानांतर जब राज्य के अस्पतालों से हृदयविदारक दृश्य और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की बदहाली सामने आती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जनता के टैक्स से जमा की गई इतनी बड़ी राशि का उपयोग क्या वास्तव में जनता के हित में हो रहा है? एक ओर सरकार मीडिया प्रबंधन के ज़रिए यह साबित करने में लगी है कि उसने प्रदेश में विकास की नई गाथा लिख दी है, वहीं दूसरी ओर किसी बेटी की गोद में पिता की मौत जैसी घटनाएं राज्य की हकीकत को उजागर कर रही हैं, जो हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर देती हैं।
विचार करने वाली बात यह है कि यह कोई पहली बार नहीं जब ऐसी विसंगतियाँ सामने आई हैं। हाल ही में कई अखबारों में छपी रिपोर्टों ने इस बात को और गहराई से उजागर किया। चोखटिया क्षेत्र की घटना, जिसमें एम्बुलेंस न मिलने के कारण एक पिता ने बेटी की गोद में दम तोड़ दिया, किसी भी समाज के लिए शर्मसार कर देने वाली है। उत्तराखंड के स्वास्थ्य ढांचे में इस तरह की लापरवाही अब आम होती जा रही है, और जनता भी इसे मानो सामान्य मान चुकी है। सरकार के प्रशासनिक दावों के बावजूद पहाड़ी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत जस की तस है। सवाल यह भी उठता है कि जब प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं लगातार गिर रही हैं, तो क्या सरकार की प्राथमिकताएं सही दिशा में हैं या सब कुछ केवल इवेंट और प्रचार की चमक में ढक दिया गया है।
राज्य के प्रशासनिक रवैये पर सवाल तब और गहराते हैं जब नकल विरोधी कानून जैसे बड़े निर्णयों के बावजूद पेपर लीक जैसे मामले सामने आते हैं। उस समय लाखों विद्यार्थी सड़कों पर उतरे, अभिभावक विरोध में खड़े हुए, पर सरकार ने विरोध करने वालों को “नकल जिहादी” कहकर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश की। अंततः जब आंदोलन ने पूरे प्रदेश में व्यापक रूप ले लिया, तब जाकर धामी सरकार ने CBI जांच की घोषणा की। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी कई कर्मचारी महीनों से अपनी तनख्वाह के इंतज़ार में हैं। छह महीने से वेतन रुके रहने के बाद जब एक दिन सरकार का कोई मंत्री फोटो खिंचवाकर यह दिखाता है कि अब भुगतान हो गया, तो यह किसी उपलब्धि की तरह पेश किया जाता है। जिन घटनाओं पर सरकार को माफी मांगनी चाहिए, उन्हीं को इवेंट में बदल दिया जाता है और जनता को भ्रमित किया जाता है।
प्रदेश के कर्मचारियों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। अनेक विभागों में न केवल बोनस रुका हुआ है, बल्कि तीन-चार महीने से वेतन तक अटका पड़ा है। दिवाली जैसे पर्व के समय जब लोग खुशियां मनाने की तैयारी में रहते हैं, वहीं हजारों सरकारी कर्मचारी वेतन न मिलने से परेशान हैं। दूसरी तरफ खबर आती है कि सरकार अपने प्रचार अभियानों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है। यह विरोधाभास जनता के मन में गहरा आक्रोश पैदा करता है। सवाल उठता है कि आखिर यह पैसा किसका है और किसके लिए खर्च हो रहा है? क्या जनता का टैक्स केवल सरकार की छवि सुधारने के लिए है या फिर राज्य के विकास और जरूरतमंदों की सहायता के लिए?
सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी उत्तराखंड की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कैग की रिपोर्टों ने बार-बार यह दर्शाया है कि राज्य की शैक्षणिक गुणवत्ता देश में सबसे निचले स्तरों में है। पहाड़ी इलाकों के कई विद्यालय या तो बंद हो चुके हैं या शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिन स्कूलों में बच्चे अब भी पढ़ते हैं, वहाँ बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कहीं छत टपक रही है तो कहीं जर्जर दीवारें बच्चों के जीवन के लिए खतरा बन चुकी हैं। कुछ समय पहले एक विद्यालय में बाथरूम की दीवार गिरने से छात्राओं की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया वही पुरानी रही — घटना के बाद फोटो सेशन, बयान और फिर खामोशी।
कभी जनरल खंडूरी के शासनकाल में लागू किया गया “गुड गवर्नेंस” का नारा अब केवल पोस्टरों में रह गया है। उस समय यह वादा किया गया था कि राज्य के 75 प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को दिए जाएंगे, लेकिन आज हालात यह हैं कि छोटे-छोटे ठेके तक बाहर के ठेकेदारों को दिए जा रहे हैं। दो-तीन करोड़ के कामों में भी स्थानीय ठेकेदारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय युवाओं में निराशा बढ़ी है बल्कि बेरोजगारी की समस्या भी गहराती जा रही है। जनता के हिस्से का अधिकार दूसरों को सौंपा जा रहा है, और सवाल करने वाले या तो अनसुने रह जाते हैं या “विरोधी” कह दिए जाते हैं।
चुनावी घोषणापत्रों में जो वादे किए जाते हैं, वे अब केवल कागज़ों तक सीमित लगते हैं। जब चुनाव नज़दीक आते हैं, तो वादों और विज़न का अंबार लगा दिया जाता है। कोटद्वार की विधायक रितु खंडूरी का उदाहरण ही लें — उनके चुनावी वादों में विकास की जो बातें की गई थीं, वे आज धरातल पर कहीं नहीं दिखतीं। विडंबना यह है कि जब पेपर लीक जैसे मुद्दों पर छात्र सड़कों पर थे, तब वही विधायक उन्हें “जिहादी” कहकर संबोधित कर रही थीं। जिन लोगों ने स्वयं कभी कोई परीक्षा नहीं दी, वे युवाओं के भविष्य पर बयान देने लगे। यह सब इसलिए संभव हो पाया क्योंकि जनता सवाल नहीं पूछती, क्योंकि जनता अब भी मौन है।
अगर उत्तराखंड की जनता आने वाले समय में भी चुप रही, तो हालात और भयावह हो सकते हैं। राज्य को यह तय करना होगा कि उसे किस दिशा में जाना है — एक ऐसे रास्ते पर जहाँ इवेंट कल्चर और विज्ञापन की चमक हो, या उस राह पर जहाँ अस्पतालों में इलाज हो, स्कूलों में पढ़ाई हो और युवाओं को रोजगार मिले। यह प्रश्न अब केवल विपक्ष या सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। यह वही समय है जब जनता को अपने हक की आवाज़ उठानी होगी, क्योंकि जिस दिन जनता सवाल पूछना बंद कर देती है, उसी दिन लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। उत्तराखंड के लोग अगर अब भी नहीं जागे, तो आने वाले वर्षों में यह इवेंट और प्रचार की राजनीति ही इस पहाड़ी प्रदेश की असल पहचान बन जाएगी — एक ऐसी पहचान, जहाँ सवालों की जगह तालियों से जवाब दिए जाते हैं और हकीकत पर पर्दा डाल दिया जाता है।



