काशीपुर। नगर निगम की कार्यशैली पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। बीते कुछ समय से महापौर दीपक बाली के नेतृत्व में शहर की सफाई व्यवस्था और विकास कार्यों की जमकर सराहना हो रही थी, लेकिन पिछले 48 घंटों में सामने आई कुछ तस्वीरों ने इन प्रशंसाओं को हिला कर रख दिया है। टांडा उज्जैन, कोर्ट परिसर और उदय राज हिन्दू इंटर कॉलेज के पास कूड़े के ढेरों ने न केवल शहर की सुंदरता को प्रभावित किया है, बल्कि नगर निगम की सफाई व्यवस्था की पोल भी खोल दी है। इन जगहों पर जमा गंदगी और बदबू से स्थानीय लोग परेशान हैं, और अब नगर निगम प्रशासन तथा सफाई ठेकेदार दोनों ही जनता के सवालों के घेरे में हैं। महापौर के प्रयासों और ठेकेदार की जिम्मेदारियों के बीच यह अंतर अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जिससे यह साबित होता है कि दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा फर्क है।
शहर के कई प्रमुख इलाकों में कचरे के ढेर देखकर साफ महसूस होता है कि सफाई का काम केवल कागजों पर हो रहा है। टांडा उज्जैन और कोर्ट परिसर जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर गंदगी का फैलाव यह बताता है कि सफाई ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा रहे। उदय राज हिन्दू इंटर कॉलेज के पास की स्थिति तो और भी चिंताजनक है, जहां कूड़ा नालियों में बहने की कगार पर है। बरसात के मौसम में अगर समय रहते इसे साफ नहीं किया गया, तो यह गंदगी नालियों को जाम कर देगी, जिससे जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। यह दृश्य न केवल स्वास्थ्य संबंधी खतरे को बढ़ाता है, बल्कि महापौर दीपक बाली द्वारा चलाए गए नालों की सफाई अभियान पर भी सवाल खड़े करता है। लोगों का कहना है कि जब नालियां साफ की जा रही थीं, तब उन पर दोबारा कूड़ा जमा होना यह दर्शाता है कि सफाई व्यवस्था में निरंतरता की भारी कमी है।

स्थानीय नागरिकों के बीच चर्चा है कि नगर निगम खुद सफाई करने के बाद अनजाने में गंदगी फैलाने का कारण भी बन रहा है। एक ओर महापौर की छवि एक सक्रिय और जनहितैषी नेता के रूप में बनी हुई है, वहीं इसके विपरीत, सफाई ठेकेदार की लगातार लापरवाही और ढिलाई ने नगर निगम की पूरी टीम की साख पर गहरा आघात पहुंचाया है। नागरिकों का मानना है कि अगर निगम प्रशासन और सफाई ठेकेदार के बीच कार्य के दौरान बेहतर तालमेल, पारदर्शिता और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाती, तो शहर में फैली यह गंदगी इतनी भयावह रूप नहीं ले पाती। लोगों का कहना है कि सफाई जैसे बुनियादी कार्य में जरा सी चूक भी न केवल शहर की छवि को धूमिल करती है, बल्कि स्वास्थ्य और स्वच्छता पर गंभीर असर डालती है। मौजूदा हालात इस बात का प्रमाण हैं कि व्यवस्था में सही समन्वय और जिम्मेदारी के बिना किसी भी अभियान की सफलता अधूरी रह जाती है, चाहे दावे कितने ही बड़े क्यों न किए जाएं। फिलहाल निगम की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और नागरिकों की नाराजगी इस बात का सबूत हैं कि जमीनी स्तर पर सफाई व्यवस्था उतनी प्रभावी नहीं है जितना दावा किया जा रहा है।
बरसात के इस मौसम में सफाई और जल निकासी की व्यवस्था को बेहतर बनाने की सख्त जरूरत है। नालियों में जमा कचरा न केवल पानी के बहाव को रोकता है, बल्कि मच्छरों और अन्य कीटों के पनपने का कारण भी बनता है, जिससे डेंगू, मलेरिया और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में, कचरे के ढेर सिर्फ एक सफाई की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकते हैं। टांडा उज्जैन, कोर्ट परिसर और उदय राज हिन्दू इंटर कॉलेज जैसे स्थानों पर रोजाना सैकड़ों लोग आते-जाते हैं, और इन जगहों पर फैली गंदगी शहर की छवि को भी धूमिल कर रही है। यह स्थिति महापौर दीपक बाली के लिए भी एक बड़ी चुनौती है कि वह जनता के भरोसे को बनाए रखते हुए निगम प्रशासन और ठेकेदारों से सख्ती से काम करवाएं।

निगम की कार्यशैली पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस बार तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे जनता का गुस्सा और असंतोष खुलकर सामने आ रहा है। लोग साफ-साफ कह रहे हैं कि महापौर चाहे कितनी भी मेहनत करें, अगर सफाई ठेकेदार जिम्मेदारी से काम नहीं करेंगे, तो सारी कोशिशें बेकार हो जाएंगी। इस मुद्दे पर पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों की जरूरत है। निगम को यह सुनिश्चित करना होगा कि ठेकेदार समय पर और सही तरीके से सफाई का काम करें, और अगर इसमें कोई चूक होती है, तो उस पर तुरंत कार्रवाई हो।
इन हालात में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सफाई व्यवस्था को लेकर निगम प्रशासन कितनी गंभीरता से काम कर रहा है। बरसात के मौसम में शहर को स्वच्छ और सुरक्षित रखना सिर्फ महापौर या ठेकेदार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में जलभराव, बीमारियों और शहर की साख दोनों पर असर पड़ेगा। महापौर दीपक बाली को न केवल ठेकेदारों पर सख्ती करनी होगी, बल्कि यह भी देखना होगा कि सफाई का काम नियमित और गुणवत्तापूर्ण तरीके से हो।

काशीपुर जैसे बढ़ते शहर में सफाई व्यवस्था का मजबूत और टिकाऊ होना बेहद जरूरी है। यह सिर्फ दिखावे की सफाई से नहीं, बल्कि सतत प्रयास और निगरानी से संभव है। मौजूदा हालात ने साबित कर दिया है कि दावे चाहे जितने बड़े हों, अगर जमीन पर उनका पालन नहीं होता, तो जनता का भरोसा टूटना तय है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि महापौर दीपक बाली और उनकी टीम इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं और क्या निगम प्रशासन जनता को यह भरोसा दिलाने में सफल होता है कि शहर को गंदगी से मुक्त करना सिर्फ एक वादा नहीं, बल्कि एक स्थायी हकीकत है।



