काशीपुर। सीडब्ल्यूसी सदस्य करन माहरा ने “हिन्दी दैनिक सहर प्रजातंत्र” से विशेष बातचीत में मौजूदा संसद और देश की राजनीति पर तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि लोकसभा में असल जनसमस्याओं को पीछे धकेल दिया गया है। उनका कहना था कि महंगाई, बेरोज़गारी और आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय सत्ता पक्ष ने बहस की दिशा बदल दी है। संसद में वंदे मातरम जैसे विषयों को उछालकर जनता का ध्यान भटकाया जा रहा है, जबकि रसोई की आग, युवाओं की नौकरियों और किसानों की परेशानियों पर कोई ठोस बात नहीं हो रही। करन माहरा ने आरोप लगाया कि भाजपा एक ऐसी पार्टी बन गई है जो नीतियों और कामकाज के बजाय केवल नैरेटिव तय करने में विश्वास रखती है। उन्होंने कहा कि सरकार का पूरा जोर मुद्दों को बदलने और प्रतीकों की राजनीति करने पर है, जिससे असली सवाल दबकर रह जाते हैं और जनता को भ्रमित किया जाता है।
बातचीत के दौरान करन माहरा ने नाम परिवर्तन की राजनीति को लेकर भी सरकार पर गंभीर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि योजना आयोग का नाम बदलना, विभिन्न आयोगों और योजनाओं के नामों में फेरबदल करना किसी वास्तविक परिवर्तन का संकेत नहीं है। उनके अनुसार सरकार विकास के नए मॉडल या ठोस योजनाएं लाने के बजाय पुरानी व्यवस्थाओं के नाम बदलकर उपलब्धियां गिनाने में लगी है। उन्होंने मेजर ध्यानचंद का उदाहरण देते हुए कहा कि देश के लिए स्वर्ण पदक दिलाने वाले महान खिलाड़ी के नाम से जुड़े संस्थानों का नाम बदलकर जीवित व्यक्तियों के नाम पर रखना आत्ममुग्धता को दर्शाता है। करन माहरा ने यह भी कहा कि अगर सरकार को अपने नेताओं के नाम पर कुछ करना ही है तो नए स्टेडियम, नई सड़के या नए शहर बनाए, लेकिन देश की ऐतिहासिक धरोहरों और महापुरुषों के नामों से छेड़छाड़ कर कोई सकारात्मक संदेश नहीं जाता।
आर्थिक मोर्चे पर सरकार को घेरते हुए करन माहरा ने रुपये और डॉलर के संदर्भ में पुराने बयानों की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि जब गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए वर्तमान प्रधानमंत्री यह कहते थे कि रुपये के गिरने से देश की साख गिरती है, तब आज की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 65 पर था, जो अब करीब 90 तक पहुंच चुका है। उस समय जो बातें कही जाती थीं, आज उन्हीं परिस्थितियों को अलग नजरिये से पेश किया जा रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अब कहा जा रहा है कि रुपया नहीं गिर रहा बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है, जबकि आम जनता की जेब पर असर साफ दिख रहा है। करन माहरा ने वित्त मंत्री की समझ पर भी सवाल उठाए और कहा कि जब बुनियादी महंगाई की समझ नहीं होगी तो देश की अर्थव्यवस्था को सही दिशा कैसे मिलेगी।
लोकसभा में जवाहरलाल नेहरू और वंदे मातरम को लेकर चल रही बहस पर प्रतिक्रिया देते हुए करन माहरा ने कहा कि जेएनयू जैसी संस्थाओं को बदनाम करने का अभियान सुनियोजित है। उन्होंने बताया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश योग्यता और परीक्षा के आधार पर होता है, जहां गरीब और अमीर सभी वर्गों के मेधावी छात्र पढ़ने का मौका पाते हैं। देश को सबसे अधिक अफसर देने वाले संस्थानों में से एक जेएनयू को केवल नाम के कारण कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का नाम बदलने के पीछे भी वही मानसिकता काम कर रही है, क्योंकि उनमें गांधी का नाम जुड़ा है। करन माहरा ने कहा कि जिन लोगों के भीतर राजनीति में जलन और द्वेष है, वे कभी भी राष्ट्रहित में निर्णय नहीं ले सकते।
प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की संसद में भूमिका पर बोलते हुए करन माहरा ने कहा कि इस बार जनता ने राहुल गांधी को एक अलग रूप में देखा है। प्रधानमंत्री द्वारा लगातार किए गए हमलों का जवाब राहुल गांधी ने मजबूती और तथ्यों के साथ दिया। उन्होंने राहुल गांधी के जीवन संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि बचपन में दादी की हत्या और युवावस्था में पिता को खोने के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक जीवन चुना। पढ़ाई के दौरान उन्हें नाम बदलकर पढ़ना पड़ा, फिर भी उन्होंने देश की सच्चाई को समझने के लिए भारत जोड़ो यात्रा जैसी पहल की। चीन के मुद्दे पर वर्षों पहले दी गई चेतावनियां आज सच साबित हो रही हैं। करन माहरा ने कहा कि राहुल गांधी ने किसानों, मजदूरों, छात्रों और बुद्धिजीवियों से मिलकर जमीन से जुड़े मुद्दों को समझा है, यही वजह है कि आज उन्हें एक परिपक्व और संवेदनशील नेता के रूप में देखा जा रहा है।
उत्तराखंड के आपदा प्रभावित इलाकों का जिक्र करते हुए करन माहरा ने धराली और आसपास के क्षेत्रों की स्थिति का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि गम तपो टूरिज्म जैसे बयानों ने पहले ही लोगों के मन में आशंका पैदा कर दी थी और इसके बाद आई आपदा ने सब कुछ उजाड़ दिया। खीर गंगा से आए पानी ने दर्जनों मकान, होटल और होम स्टे बहा दिए, सैकड़ों एकड़ जमीन नष्ट हो गई और कई लोग आज भी मलबे में दबे बताए जाते हैं। करन माहरा ने खुद 52 किलोमीटर पैदल चलकर मजदूरों और गरीब ग्रामीणों को सुरक्षित बाहर निकाला। उन्होंने एसडीआरएफ की मदद की सराहना की, लेकिन यह भी कहा कि सरकार की ओर से अपेक्षित सहायता नदारद रही।
इसके अलावा करन माहरा ने प्रधानमंत्री के आचरण और प्रतीकात्मक राजनीति को लेकर भी तीखी टिप्पणी की, जो मौजूदा हालात में पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक बनती है। उन्होंने केदारनाथ यात्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस समय उत्तराखंड के कई नेता वहां जाने से डर रहे थे, उस समय राहुल गांधी बिना किसी दिखावे के पैदल यात्रा कर केदारनाथ पहुंचे थे, जबकि प्रधानमंत्री तब आए जब हालात सामान्य हो चुके थे। करन माहरा ने कृष्णा माई की गुफा का नाम बदलकर मोदी गुफा रखे जाने को शर्मनाक बताते हुए कहा कि किसी जीवित व्यक्ति द्वारा अपने नाम पर ऐसे स्थानों का नामकरण करना अस्वस्थ मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कोविड काल का जिक्र करते हुए कहा कि जब देश महामारी से जूझ रहा था, तब खाली थाली और शंख बजवाने जैसे प्रतीकात्मक उपाय किए गए। गैस से नाली, बादलों में रडार काम न करने और इसी तरह के बयानों को उन्होंने देश की गंभीरता से खिलवाड़ बताया। साथ ही प्रधानमंत्री की बैठक के दौरान पार्किंग के लिए काटी गई जमीन का मुआवजा आज तक न मिलने और होटल पंजीकरण की वेबसाइट एक साल से बंद रहने जैसे मुद्दों को उठाते हुए उन्होंने कहा कि ये छोटे नहीं बल्कि आम लोगों के जीवन से जुड़े बड़े सवाल हैं, जिन पर सरकार पूरी तरह चुप है।
आपदा के महीनों बाद भी हालात नहीं सुधरे, यह बताते हुए करन माहरा ने कहा कि पीने का पानी, स्कूलों में शिक्षक और अस्पतालों में डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं हैं। सड़के टूटी हुई हैं, मुआवजा नहीं मिला और लोगों को अपने ही पैसों से जेसीबी लगाकर मलबा हटाना पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक पत्थर और लकड़ी से बने मकानों को गलत तरीके से कच्चा घोषित कर मुआवजा कम दिया जा रहा है, जबकि वही निर्माण भूकंप और मौसम के अनुकूल होता है। बादल फटने की घटनाएं बड़कोट, नौगांव और धराली सहित कई गांवों में हुईं, लेकिन सरकार ने पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया। करन माहरा ने कहा कि पर्यटन और होटल पंजीकरण जैसी व्यवस्थाएं भी ठप हैं, जिससे लोगों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा है। उनके अनुसार यह हालात शासन की संवेदनहीनता को उजागर करते हैं और जनता अब जवाब चाहती है।



