रुद्रपुर। शहर के दिल में फैला यह कूड़े का पहाड़ किसी पर्यावरणीय संकट से कम नहीं, बल्कि एक ऐसे घोटाले की कहानी है जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की नीयत दोनों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। साल 2020 में नगर निगम रुद्रपुर ने किच्छा रोड स्थित डंपिंग ग्राउंड में बीस से पच्चीस वर्षों से जमा हुए लगभग पचास हज़ार मीट्रिक टन कूड़े का आकलन किया था। तत्कालीन मेयर रामपाल सिंह और उपनगर आयुक्त रिंकू बिष्ट के आदेश पर इसका निस्तारण करने के लिए ढाई करोड़ रुपए का टेंडर जारी किया गया, जो आठ महीने की अवधि के लिए था। लेकिन गजब यह हुआ कि यह ठेका सत्रह महीने तक बढ़ा दिया गया और ठेकेदार राजेश अग्रवाल की फर्म मेंसर राम सिंह अग्रवाल को पांच करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया। नगर निगम के कुछ अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से सरकारी धन की यह बंदरबांट जारी रही और शहर की जनता उसी बदबूदार कूड़े के पहाड़ के नीचे कराहती रही।

शहर की सड़कों पर फैली गंदगी और डंपिंग ग्राउंड से उठती सड़ांध के बीच जनहित की लड़ाई उठाई पूर्व सभासद रामबाबू ने, जिन्होंने भ्रष्टाचार की परतें खोलने के लिए नैनीताल हाईकोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का दरवाज़ा खटखटाया। उनकी याचिका के बाद एनजीटी ने जिलाधिकारी से जवाब मांगा, तब जाकर पूरे शहर का ध्यान इस मुद्दे पर गया। दूसरी ओर नगर निगम के अधिकारियों ने उसी कूड़े के लिए नए टेंडर जारी कर एक के बाद एक करोड़ों रुपए का खेल रचा। जनवरी 2023 में IAS विशाल मिश्रा के कार्यकाल में 33 हज़ार मीट्रिक टन कूड़े के निस्तारण के लिए एक नया टेंडर निकाला गया, जिसकी कीमत डेढ़ करोड़ तय की गई, लेकिन भुगतान हुआ लगभग दो करोड़ का। यहां भी वही फर्में सक्रिय थीं, जिनका रिश्ता पहले ठेकेदारों से जुड़ा था। आशीष मित्तल ने अपनी पत्नी की फर्म एसएसएस इंजीनियर्स एंड कंसल्टेंट्स के नाम से ठेका दिलाने के लिए दस्तावेज़ों में हेरफेर की, जबकि जॉइंट वेंचर का नोटरीकरण टेंडर की तारीख के बाद कराया गया, जिससे साफ ज़ाहिर हुआ कि पूरा खेल पहले से तय था।

भ्रष्टाचार के इस जाल में अधिकारियों की साजिश और भी गहरी थी। जुलाई 2023 में नगर निगम ने फिर छब्बीस हज़ार मीट्रिक टन कूड़े का आकलन करते हुए चार करोड़ से अधिक का एक और टेंडर निकाला, जिसे बाद में तत्कालीन जिलाधिकारी उदयराज सिंह ने निरस्त कर दिया। हालांकि भ्रष्टाचार पर प्रहार करने का श्रेय इन्हें मिला, पर जल्द ही वही डीएम उदयराज सिंह अपने चहेते ठेकेदार होराइजन सॉल्यूशन को नया ठेका देकर चार करोड़ अस्सी लाख का अनुबंध जारी कर बैठे। नतीजा यह हुआ कि कूड़ा शहर से हटाने के बजाय कर्टारपुर मार्ग सेक्टर 17 के सामने किसान की आठ एकड़ ज़मीन में डाल दिया गया और ऊपर मिट्टी की परत चढ़ाकर पूरा मामला छिपा दिया गया। यही नहीं, रुद्रपुर के पूर्वी क्षेत्र की चार एकड़ ज़मीन में भी पंद्रह फीट तक खुदाई कर कूड़ा भरा गया, ताकि अधिकारियों के “साफ-सुथरे काम” की पोल न खुले। यह भी खुलासा हुआ कि दिल्ली की एक फर्म ने उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बिलासपुर क्षेत्र में दो एकड़ भूमि पर अवैध रूप से रुद्रपुर का कचरा फेंका था, जिसकी पुष्टि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने की।
गौर करने वाली बात यह है कि यह गंदगी केवल डंपिंग ग्राउंड तक सीमित नहीं रही। कूड़ा निस्तारण का जिम्मा संभालने वाली फर्में शहर से बाहर केलाखेड़ा, मॉडल कॉलोनी और कृषि विभाग के ट्रेनिंग सेंटर CNG प्लांट के पास दो से तीन एकड़ में अवैध रूप से कचरा डालती रहीं। नगर निगम के अधिकारियों की आंखें मूंदे बैठी रहीं, मानो सब कुछ नियमों के अनुसार चल रहा हो। साल 2020 से 2025 तक जय भारत सिंह, IAS विशाल मिश्रा, नरेश चंद्र दुर्गा पाल, रिंकू बिष्ट और राजू नबियाल जैसे अधिकारी अलग-अलग समय पर नगर आयुक्त और सहायक आयुक्त रहे, और इन्हीं के कार्यकाल में कागज़ों पर कूड़े का निस्तारण बार-बार होता रहा। फाइलों में शहर स्वच्छ दिखाया गया, लेकिन ज़मीनी हकीकत में सड़ांध और भ्रष्टाचार ही मिला।

अब सवाल यह है कि जब पूरा शहर इस गंदगी से त्रस्त था, तब इतने वर्षों तक इन अधिकारियों और ठेकेदारों पर कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई। डीएम उदयराज सिंह, जिन्हें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निकट माना जाता है, न केवल इस पूरे विवाद में केंद्रीय भूमिका में रहे बल्कि रिटायरमेंट के बाद भी छह महीने का सेवा विस्तार और फिर राजस्व परिषद में न्यायिक सदस्य के पद से नवाज़े गए। यही नहीं, NH-74 के बहुचर्चित घोटाले के आरोपी DP सिंह को क्लीन चिट देने का विवाद भी इन्हीं के कार्यकाल से जुड़ा रहा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि रुद्रपुर का यह कूड़ा केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि राजनीतिक संरक्षण में पनपा एक महाघोटाला था, जिसमें नियम, पारदर्शिता और जनता के पैसे – तीनों की बलि चढ़ी।
शहर आज भले कूड़े के पहाड़ से मुक्त दिखता हो, लेकिन उसकी दुर्गंध अब भ्रष्टाचार के रूप में हवा में घुल चुकी है। नगर निगम की इस कहानी ने यह साबित कर दिया कि जब अधिकारी और ठेकेदार मिलकर स्वच्छता को कारोबार बना दें तो जनता की जेब से निकला हर रुपया किसी फाइल की धूल में दब जाता है। जिन चेहरों को जनता ने ‘हीरो’ कहा, वही अपने पद की आड़ में जनहित योजनाओं को निजी लाभ की सीढ़ी बना बैठे। जांचें कागज़ों पर हुईं, रिपोर्टें फाइलों में दबी रहीं और शहर के नाम पर करोड़ों की लूट एक बार फिर “डबल इंजन सरकार” की ताकत तले दबकर रह गई। जनता ने तो बस यही देखा कि कूड़ा हटा या नहीं, मगर सच्चाई यह है कि गंदगी सिर्फ ज़मीन पर नहीं, सिस्टम की आत्मा में फैल चुकी है।



