काशीपुर। बेहद असामान्य दृश्य इन दिनों काशीपुर ब्लॉक कार्यालय के बाहर देखा जा रहा है, जहाँ राशन कार्ड KYC अपडेट की अनिवार्यता ने आम नागरिकों की साँसें तक अटका दी हैं। सुबह पड़ने से पहले लोग अपना स्थान सुरक्षित करने के लिए लंबी कतारों में खड़े हो जाते हैं, लेकिन भीड़ इतनी विकराल है कि कई व्यक्तियों का नंबर पूरे दिन में भी नहीं आ पाता। महिलाओं, बुजुर्गों और अपने बच्चों को गोद में संभाले खड़े माता–पिता की परेशानी देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह प्रक्रिया लोगों पर किस तरह का मानसिक और शारीरिक दबाव डाल रही है। जो लोग मजदूरी करते हैं या दैनिक काम पर निर्भर हैं, वे भी मजबूरी में अपनी रोज़ी छोड़कर लाइन में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। परेशान नागरिकों का कहना है कि सरकारी आदेश तो आ गया, लेकिन जनता की सुविधा के लिए उचित प्रबंध न होने से हालात किसी बड़े संकट की तरह बन गए हैं और प्रशासन की तैयारी इस उमड़ रही भीड़ के मुकाबले बेहद अपर्याप्त दिखाई दे रही है।
भीड़ और अव्यवस्था के बीच खड़े लोगों के मन में सबसे बड़ी शिकायत यह है कि ज़रूरी कागज़ों की जाँच और अपडेट की प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि कोई भी व्यक्ति आसानी से समझ नहीं पाता कि अगला कदम क्या होगा। कतार में खड़े कई लोग यह कहते सुने गए कि “पहले आधार अपडेट कराओ, फिर नया आधार बनवाओ, फिर KYC कराओ… ऐसे में जनता कागज़ पूरे करते–करते ही थक जाएगी।” लोगों में यह नाराज़गी भी साफ दिख रही है कि रोज़ाना कई घंटों की मेहनत के बाद भी काम अधूरा रह जाना अब रोज़मर्रा की समस्या बन चुका है। सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हो रही है जो तीन–चार दिनों से लगातार आ रहे हैं, फिर भी उन्हें किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं दिखती। सुबह 8 बजे से खड़ी एक महिला ने भावुक स्वर में कहा कि बच्चों को भूख लग रही है और परिवार बिना खाना खाए केवल इस उम्मीद में खड़ा है कि आज शायद नंबर आ जाए। इन हालातों में यह स्पष्ट होता है कि KYC अपडेट ने सिर्फ कागज़ों का बोझ नहीं बढ़ाया, बल्कि आम नागरिकों के जीवन में भारी अस्त-व्यस्तता भी पैदा कर दी है।
ब्लॉक कार्यालय के अंदर काम कर रहे आधार अपडेट ऑपरेटर बताते हैं कि चारों काउंटर पूरे दिन लगातार चल रहे हैं, लेकिन बढ़ती भीड़ के सामने यह संख्या नगण्य साबित हो रही है। कर्मचारियों की मानें तो एक KYC अपडेट करने में सामान्यत: 3 से 4 मिनट का समय लगता है, लेकिन बुजुर्गों और छोटे बच्चों के फिंगरप्रिंट सफलतापूर्वक दर्ज न होने पर यह समय 7 मिनट तक भी पहुँच जाता है। कई बुजुर्गों के हाथों की त्वचा पतली होने के कारण मशीनें बार–बार फिंगरप्रिंट पढ़ने से इनकार कर देती हैं, जिस पर स्टाफ को ‘वैल’ यानी लोशन का उपयोग करना पड़ता है ताकि स्कैनिंग ठीक से हो सके। इसी अतिरिक्त समय में रोज़ाना सैकड़ों लोगों की लाइन धीमी पड़ जाती है। स्टाफ का कहना है कि वे अपनी क्षमता के अनुसार हर नागरिक की मदद कर रहे हैं और किसी को निराश नहीं भेजना चाहते, लेकिन बढ़े हुए दबाव के कारण काम की गति पर असर होना स्वाभाविक है।
हालांकि इन कठिन परिस्थितियों में भी कुछ लोग स्टाफ की तारीफ़ करते नज़र आए। एक व्यक्ति ने स्पष्ट रूप से कहा कि चारों काउंटर लगातार संचालित हो रहे हैं और कर्मचारी हर व्यक्ति से विनम्रता से व्यवहार कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि असल दिक्कत स्टाफ की नहीं, बल्कि भीड़ के अनियंत्रित आकार और सीमित संसाधनों की है। दूसरी ओर, लाइन में खड़े लोग यह भी बताते हैं कि घंटों खड़े रहने के बाद जब काउंटर बंद होने का समय आता है, तो नंबर से पहले ही उनकी उम्मीद टूट जाती है। एक युवक ने गुस्से और निराशा भरी आवाज़ में बताया कि वह लगातार तीन दिनों से प्रतिदिन दो–दो घंटे लाइन में खड़ा होने आता है, लेकिन काउंटर बंद होते ही कर्मचारी उसे अगले दिन आने को कह देते हैं।
भीड़ में मौजूद छोटे बच्चे सबसे ज्यादा बेचैन नज़र आते हैं। घंटों खड़े रहने से वे थक जाते हैं और कई बार रोने लगते हैं, जिससे उनके माता–पिता की परेशानी और बढ़ जाती है। हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि अंदर–बाहर की आवाजाही नियंत्रित करने के लिए कर्मचारियों को बार–बार यह कहना पड़ रहा है, “जिसका काम हो वही अंदर आए, बाकी बाहर रहें… भीड़ न बढ़ाएं।” लेकिन भीड़ इतनी बड़ी है कि व्यवस्था बनाए रखना अपने आप में एक चुनौती बन गया है। कतारों में खड़े नागरिक यह भी कह रहे हैं कि रोज़–रोज़ काम छोड़कर KYC करवाने आने से उनके परिवार की दिनचर्या बिगड़ गई है, और लगातार खड़े रहने से बुजुर्गों की तबीयत तक खराब होने लगी है। कई लोग यह भी प्रश्न कर रहे हैं कि जब KYC अनिवार्य थी, तो क्या प्रशासन को पहले से उचित प्रबंधन नहीं करना चाहिए था?
राशन कार्ड KYC की अनिवार्यता ने व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार का उद्देश्य तो अवश्य रखा होगा, लेकिन बिना सक्षम संसाधनों के लागू किए गए आदेश का सबसे भारी बोझ जनता को ढोना पड़ रहा है। सीमित काउंटर, फिंगरप्रिंट की तकनीकी समस्याएँ, अव्यवस्थित भीड़ और कड़ी धूप में खड़े नागरिकों का संघर्ष—यह सब मिलकर स्थिति को किसी प्रशासनिक आपातकाल की तरह बना रहे हैं। लोग प्रशासन से उम्मीद कर रहे हैं कि या तो काउंटरों की संख्या बढ़ाई जाए, या समय सीमा का विस्तार किया जाए, ताकि हर नागरिक को राहत मिल सके और उन्हें बार–बार इस कष्टदायी लाइन में न खड़ा होना पड़े। फिलहाल उम्मीदों का भार जनता के कंधों पर है, और पूरी व्यवस्था इस बात के इंतज़ार में है कि प्रशासन किसी ठोस कदम के साथ आगे आए।



