रामनगर। ब्लॉक प्रमुख और जेष्ठ-कनिष्ठ प्रमुख पदों के लिए नामांकन प्रक्रिया का अंतिम चरण आज पूरी तरह संपन्न हो गया, जिसमें चुनावी माहौल खासा गर्म नजर आया। इस बार की प्रक्रिया में सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह रही कि यहां किसी भी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के प्रत्याशी मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। अंतिम दिन तक की गहमागहमी में कुल छह उम्मीदवारों ने अपने-अपने पर्चे दाखिल किए, लेकिन न कांग्रेस का कोई चेहरा सामने आया और न ही भाजपा का कोई प्रतिनिधि नामांकन दाखिल करने पहुंचा। चुनाव अधिकारी प्रमोद कुमार ने पुष्टि करते हुए बताया कि नॉमिनेशन प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्तर के दल पूरी तरह अनुपस्थित रहे, जिससे मुकाबला पूरी तरह निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच सिमट गया और चुनाव का समीकरण पूरी तरह बदल गया।
ब्लॉक प्रमुख चुनाव में इस बार एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। नामांकन की अंतिम तारीख तक न तो कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी मैदान में उतारा और न ही भाजपा ने कोई उम्मीदवार खड़ा किया। यहां तक कि अन्य दलों के दावेदार भी पूरी तरह नदारद रहे, जिससे मुकाबला अप्रत्याशित रूप से स्वतंत्र उम्मीदवारों के बीच सिमट गया है। ब्लॉक प्रमुख पद की दौड़ में अब केवल हंसी जलाल और मंजू नेगी आमने-सामने हैं। दोनों ही लंबे समय से राजनीति और समाजसेवा में सक्रिय हस्तियां हैं और क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखती हैं। राजनीतिक चर्चा का विषय यह भी है कि हंसी जलाल भले ही भाजपा समर्थक छवि के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उन्होंने पार्टी का टिकट लेने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया, जिससे इस बार का मुकाबला पूरी तरह अलग अंदाज में होने वाला है।
जेष्ठ प्रमुख पद की प्रतिस्पर्धा भी कम दिलचस्प नहीं है। इस पद के लिए पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी और कंचन चौधरी ने अपना-अपना नामांकन दाखिल किया है। संजय नेगी, जो पहले भी इस पद पर रह चुके हैं, ने दावा किया है कि उनके पास कुल 32 क्षेत्र पंचायत सदस्यों में से 19 का समर्थन पहले से ही मौजूद है। इस मजबूत समर्थन आधार के कारण उनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। संजय नेगी की क्षेत्र में गहरी पकड़ और वर्षों से जनता के बीच की सक्रियता उन्हें इस चुनाव में एक प्रबल उम्मीदवार बनाती है। वहीं कंचन चौधरी भी स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं और उन्हें भी अच्छे खासे समर्थकों का साथ प्राप्त है। इस पद पर होने वाला मुकाबला क्षेत्रीय राजनीति के समीकरणों को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।
कनिष्ठ प्रमुख पद के लिए भी दिलचस्प मुकाबले के संकेत मिल रहे हैं। इस श्रेणी में मीना रावत और बसंती आर्य ने नामांकन किया है। दोनों ही अपने-अपने वार्ड में लंबे समय से सक्रिय हैं और स्थानीय जनता से गहरा जुड़ाव रखती हैं। मीना रावत जहां अपने विकास कार्यों और जनहित में उठाए गए कदमों के लिए जानी जाती हैं, वहीं बसंती आर्य भी सामाजिक मुद्दों पर मुखर रही हैं और उनके पास समर्पित समर्थकों का एक मजबूत आधार मौजूद है। इस पद की प्रतिस्पर्धा में व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय मुद्दे अहम भूमिका निभाने वाले हैं, और दोनों प्रत्याशी अपने-अपने तरीके से जनता को प्रभावित करने की पूरी कोशिश कर रही हैं।
इस पूरे चुनावी परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यहां से भाजपा विधायक दीवान सिंह बिष्ट की बहू श्वेता बिष्ट ने नामांकन दाखिल नहीं किया। चुनाव से पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि मंजू नेगी और श्वेता बिष्ट के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। लेकिन श्वेता बिष्ट के चुनाव मैदान से हटने के साथ ही यह संभावना खत्म हो गई। स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि मंजू नेगी के सामने कोई भी राष्ट्रीय दल का उम्मीदवार मैदान में उतरने का साहस नहीं जुटा सका। इस स्थिति ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस बार रामनगर में सत्ता समीकरण पूरी तरह से निर्दलीय प्रत्याशियों के पक्ष में झुक गए हैं और चुनावी जंग में पार्टी का नाम नहीं, बल्कि प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता निर्णायक होगी।
अब रामनगर की जनता के सामने स्पष्ट तस्वीर हैकृब्लॉक प्रमुख पद पर हंसी जलाल और मंजू नेगी के बीच सीधा और रोचक मुकाबला होगा। जेष्ठ प्रमुख पद के लिए संजय नेगी और कंचन चौधरी आमने-सामने होंगे, जबकि कनिष्ठ प्रमुख पद पर मीना रावत और बसंती आर्य के बीच टक्कर होगी। इन तीनों ही पदों पर चुनावी माहौल पूरी तरह से व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, स्थानीय मुद्दों और वर्षों की सामाजिक सक्रियता के इर्द-गिर्द घूम रहा है। राष्ट्रीय दलों के नदारद रहने से यह भी तय है कि इस बार के नतीजे पारंपरिक राजनीतिक धारणाओं को बदल सकते हैं। क्षेत्र के मतदाता अब इस स्थिति को लेकर उत्सुक हैं कि बिना पार्टी के समर्थन के मैदान में उतरे ये उम्मीदवार अपनी छवि, कार्यशैली और जनसंपर्क के बल पर जनता का भरोसा जीत पाते हैं या नहीं। चुनावी पृष्ठभूमि और बदलते समीकरणों को देखते हुए यह मुकाबला न केवल स्थानीय बल्कि राज्य स्तर की राजनीति में भी चर्चित होने वाला है।



