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राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान संग्राम सरकार की उदासीनता पर भड़का आक्रोश

खटीमा की तरह सम्मान की मांग पर काशीपुर के आंदोलनकारी सड़कों पर उतरे बोले — हमने राज्य बनाया, अब सरकार हमारी पहचान लौटाए

काशीपुर। एसडीएम कार्यालय के बाहर शुक्रवार को राज्य निर्माण सक्रिय आंदोलनकारी समिति से जुड़े लोगों का धरना पूरे जोश और जोशपूर्ण नारों के बीच शुरू हुआ। सुबह से ही दर्जनभर आंदोलनकारी अपने झंडे और बैनर लेकर कार्यालय के सामने जुटने लगे। इनका कहना था कि उत्तराखंड राज्य के निर्माण में जिन लोगों ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जिन्होंने लाठियां खाईं, जेल गए और अपने घर-परिवार की परवाह किए बिना संघर्ष किया, आज वही लोग पहचान और सम्मान के लिए दर-दर भटक रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार ने खटीमा की तर्ज पर चिन्हीकरण तो किया, लेकिन काशीपुर के सैकड़ों आंदोलनकारियों को अब तक उस सूची में शामिल नहीं किया गया।

धरना स्थल पर मौजूद आंदोलनकारी एक स्वर में कह रहे थे कि यह आंदोलन केवल पेंशन या किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के लिए है। उनका कहना था कि जिस तरह देश के स्वतंत्रता सेनानियों को स्वतंत्रता के बाद सम्मान पत्र और दर्जा दिया गया, उसी तरह उत्तराखंड के लिए लड़ने वालों को भी सक्रिय राज्य आंदोलनकारी का दर्जा मिलना चाहिए। आंदोलनकारियों ने बताया कि काशीपुर में अब तक मात्र चौदह लोगों को यह दर्जा मिला है, जबकि दो सौ से अधिक लोग आज भी वंचित हैं। इनमें से कई ऐसे भी हैं जिन्होंने उस दौर में जेल यात्राएं कीं, लाठियां खाईं और आंदोलन का नेतृत्व किया, लेकिन आज तक उन्हें मान्यता नहीं मिली।

महिलाओं की भागीदारी भी इस धरने में उल्लेखनीय रही। कई महिला आंदोलनकारियों ने कहा कि उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं कि उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला, परंतु यह तकलीफ है कि जिनके बलिदान से राज्य बना, उन्हें आज पहचान तक नहीं मिली। एक महिला आंदोलनकारी ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने अपने राज्य के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया, अब बस इतना चाहती हैं कि उन्हें राज्य निर्माण में उनके योगदान का प्रमाण पत्र मिले। उन्होंने कहा, “हमारा कोई राजनीतिक या व्यावसायिक मकसद नहीं, बस सम्मान की भावना है – और यही हमारे आंदोलन की आत्मा है।”

धरने में मौजूद वक्ताओं ने बताया कि खटीमा में जहां सैकड़ों आंदोलनकारियों को चिन्हित किया गया है, वहीं काशीपुर में प्रशासन की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। वक्ताओं ने कहा कि जब एक ही जिले के भीतर दो कस्बों में अलग-अलग मानक अपनाए जा रहे हैं, तो यह न्यायसंगत नहीं है। वक्ताओं ने मांग की कि पूरे उधम सिंह नगर जिले में एक ही मानक लागू किया जाए ताकि किसी के साथ भेदभाव न हो। उनका कहना था कि खटीमा में आठ सौ लोगों को चिन्हित किया जा चुका है, जबकि काशीपुर में अब तक केवल चौदह नाम ही तय किए गए हैं, वह भी तब जब उनमें से तीन या चार लोग अब इस दुनिया में नहीं रहे।

अधिवक्ताओं और वरिष्ठ आंदोलनकारियों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार प्रमाणपत्र, शपथ पत्र और दस्तावेज जिला प्रशासन को सौंपे जा चुके हैं, लेकिन हर बार केवल जांच और वादों का सिलसिला चलता रहा। वक्ताओं ने बताया कि कई आंदोलनकारियों ने जेल से प्रमाण पत्र, अखबार की कतरनें, और पुराने फोटो तक पेश किए, बावजूद इसके कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। एक अधिवक्ता ने कहा कि अगर सरकार सच में राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान चाहती है, तो उसे जल्द से जल्द चिन्हीकरण प्रक्रिया पारदर्शी और समान रूप से लागू करनी होगी।

धरने में मौजूद कई बुजुर्ग आंदोलनकारी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए। उन्होंने कहा कि रजत जयंती वर्ष मनाया जा रहा है, लेकिन उन्हीं के संघर्षों की बदौलत बने इस राज्य के सिपाही आज भी अनदेखे हैं। उनका कहना था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार राज्य की उपलब्धियों का जश्न मना रही है, जबकि वे लोग, जिन्होंने इस राज्य के लिए अपना खून-पसीना बहाया, आज भी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना था कि यह रजत जयंती वर्ष तभी सार्थक होगा जब सरकार उनके योगदान को औपचारिक रूप से स्वीकार करेगी और उन्हें सम्मानपत्र प्रदान करेगी।

धरना अभी सांकेतिक रूप में चलाया जा रहा है, लेकिन आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया तो इसे अनशन और व्यापक विरोध में बदला जाएगा। उन्होंने कहा कि अब यह केवल धरना नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की लड़ाई है। आंदोलनकारियों का यह भी कहना था कि वे अब और आश्वासनों पर भरोसा नहीं करेंगे। हर सरकार ने केवल वादे किए लेकिन नतीजा शून्य रहा।

जैसे-जैसे दिन बढ़ता गया, धरना स्थल पर लोगों की भीड़ बढ़ती गई। राहगीरों ने भी रुककर आंदोलनकारियों की बातें सुनीं और कई लोगों ने उनके समर्थन में आवाज़ उठाई। एक आंदोलनकारी ने कहा, “यह राज्य हम सबने मिलकर बनाया है, अब इसकी पहचान में हमारा नाम भी होना चाहिए।” वहीं कुछ आंदोलनकारियों ने बताया कि उन्होंने इस मसले पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी कई बार संवाद किया, लेकिन हर बार केवल “विचार किया जाएगा” जैसे जवाब ही मिले।

धरने के अंत में आंदोलनकारियों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को चुनौती देना नहीं, बल्कि अपने योगदान का सम्मान पाना है। “हम चाहते हैं कि जब इतिहास लिखा जाए तो उसमें यह दर्ज हो कि हमने अपने राज्य के लिए संघर्ष किया और राज्य ने हमारे संघर्ष को पहचाना।”

काशीपुर के एसडीएम कार्यालय के बाहर बैठे ये आंदोलनकारी भले ही संख्या में कम थे, लेकिन उनके मन की आग अब भी उतनी ही प्रज्वलित है जितनी 25 साल पहले थी जब उन्होंने उत्तराखंड राज्य के लिए संघर्ष का बिगुल फूंका था। अब यह धरना केवल एक मांग नहीं, बल्कि एक स्मरण है – उस इतिहास का, जो अब भी अधूरा है, और उस सम्मान का, जो अब तक दिया नहीं गया।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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