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रजत जयंती पर हुंकार भरते राज्य आंदोलनकारियों ने सरकार को याद दिलाई शहीदों की अधूरी कसमें

स्थापना के 25वें वर्ष में राज्य की अवधारणा और मूल निवास जैसे सुलगते मुद्दों पर आंदोलनकारियों ने मुख्यमंत्री को भेजा चेतावनी भरा पत्र और 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण सहित अन्य लंबित मांगों पर तुरंत कार्रवाई की मांग की।

रामनगर। देवभूमि की अस्मिता और पृथक राज्य की संकल्पना को साकार करने वाले वीर सेनानियों की आवाज एक बार फिर हल्द्वानी की वादियों में गूंजी, जब राज्य आंदोलनकारियों के एक प्रखर प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी के हल्द्वानी स्थित कैंप कार्यालय में दस्तक दी। यह मुलाकात मात्र एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि उन अनसुलझे सवालों और दबी हुई आकांक्षाओं का ज्वार थी, जो पिछले ढाई दशकों से राज्य के नीति-निर्धारकों की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं। प्रभात ध्यानी, भुवन जोशी, पुष्कर दुर्गापाल, शेर सिंह लटवाल, बृजमोहन सिजवाली, पान सिंह नेगी और रईस अहमद जैसे जुझारू व्यक्तित्वों से सजे इस शिष्टमंडल ने जिलाधिकारी के माध्यम से सूबे के मुखिया मुख्यमंत्री को एक विस्तृत मांग पत्र प्रेषित किया। इस ज्ञापन में न केवल आंदोलनकारियों के स्वाभिमान की रक्षा की पुकार थी, बल्कि उन मूलभूत समस्याओं का कच्चा चिट्ठा भी शामिल था, जो आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों और मैदानों के बीच संघर्षरत हैं। जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर का वातावरण उस समय गंभीर और वैचारिक विमर्श से सराबोर हो गया जब इन आंदोलनकारियों ने राज्य के वर्तमान स्वरूप और भविष्य की चुनौतियों पर अपनी बेबाक राय रखी।

इतिहास के झरोखों में झांकें तो 9 नवंबर 2000 का वह दिन सहज ही याद आता है, जब दमन, उत्पीड़न और क्रूरता की पराकाष्ठा के बाद उत्तराखंड का जन्म हुआ था। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को भेजे संदेश में अत्यंत भावुकता और आक्रोश के साथ स्मरण कराया कि यह राज्य खैरात में नहीं मिला, बल्कि इसके पीछे 42 से अधिक अमर शहीदों की शहादत का लहू और खटीमा, मसूरी तथा मुजफ्फरनगर जैसे काले अध्यायों की टीस छिपी है। आंदोलन के दौरान हमारी माताओं-बहनों ने अपनी इज्जत और आबरू तक की बाजी लगा दी थी, जबकि सैकड़ों नौजवानों ने जेल की सलाखों के पीछे अमानवीय यातनाएं सहीं। आज जब उत्तराखंड अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर रजत जयंती वर्ष के उत्सवों में डूबा हुआ है और सरकार जगह-जगह भव्य आयोजनों के माध्यम से अपनी उपलब्धियों का ढोल पीट रही है, तब उन शहीदों के सपनों का क्या हुआ? क्या वाकई वह उत्तराखंड बन पाया जिसके लिए मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर गोलियां खाई गई थीं? यह प्रश्न आज हर उस व्यक्ति के जहन में है जिसने उत्तराखंड की मशाल को अपने हाथों में थामा था।

प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन के माध्यम से सरकार को आईना दिखाते हुए कहा कि उत्तराखंड के इस विशाल जन आंदोलन में केवल चंद लोग नहीं, बल्कि समाज का हर वर्ग शामिल था। चाहे वे जोश से लबरेज छात्र हों, सड़कों पर उतरीं महिलाएं हों, अपनी सेवा पूरी कर लौटे पूर्व सैनिक हों या फिर छोटे-बड़े व्यापारी और सरकारी कर्मचारी; हर धर्म, जाति और समुदाय के व्यक्ति ने इस उम्मीद में आहुति दी थी कि राज्य बनने के बाद ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ यहीं के काम आएगी। लोगों का मानना था कि अपनी सरकार होगी, अपने कानून होंगे और पहाड़ की विकट परेशानियों का समाधान स्थानीय स्तर पर सुगमता से हो जाएगा। किंतु आज रजत जयंती के इस पड़ाव पर खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो मंथन की आवश्यकता महसूस होती है कि क्या हम उन उद्देश्यों की प्राप्ति के करीब भी पहुँच पाए हैं? सत्तारूढ़ सरकारों ने विकास के बड़े-बड़े दावे तो किए, लेकिन पहाड़ के असली दर्द और उन सपनों का क्या हुआ जिन्हें संजोकर पृथक राज्य की नींव रखी गई थी?

ज्ञापन में उन ज्वलंत और अनसुलझे मुद्दों पर तीखा प्रहार किया गया है जो आज भी उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिकता के केंद्र में बने हुए हैं। प्रतिनिधिमंडल ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों आज तक गैरसैंण को प्रदेश की स्थाई राजधानी का दर्जा नहीं मिल सका? वह कौन सी बाधाएं हैं जो पहाड़ से हो रहे अनियंत्रित पलायन को रोकने में सरकारों के हाथ बांध रही हैं? परिसीमन का जिन्न, बदहाल होती स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा के गिरते स्तर ने आज भी आम जनमानस को परेशान कर रखा है। भ्रष्टाचार का दीमक तंत्र को खोखला कर रहा है, जबकि सत्ता के गलियारों में माफियाओं का दखल दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली राज्य की आंतरिक सीमा के भीतर स्थित कंडी सड़क का मुद्दा हो या फिर गांवों तक अपनी जड़ें फैला चुका अवैध नशे का काला कारोबार; ये सभी विषय आज रजत जयंती वर्ष में सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं। रोजगार की तलाश में भटकते युवा, मूल निवास की परिभाषा और सख्त भू-कानून की मांग आज भी सड़कों पर गूंज रही है, जिनका समाधान समय की मांग है।

राज्य आंदोलनकारियों की व्यक्तिगत पीड़ा को स्वर देते हुए प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से अपील की कि वे उन लोगों की सुध लें जिन्होंने इस राज्य की नींव में अपनी जवानी खपा दी। ज्ञापन की प्रमुख मांग यह है कि समस्त राज्य आंदोलनकारियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की तर्ज पर ही सभी सरकारी सुविधाएं और सम्मान प्रदान किया जाए, क्योंकि उनका संघर्ष भी किसी आजादी की जंग से कम नहीं था। इसके अतिरिक्त, एक बड़ा मुद्दा 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का है। यद्यपि सरकार ने आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों के लिए इस कानून की घोषणा की है, लेकिन धरातल पर इसका लाभ अभी भी पात्र लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा है। प्रशासनिक पेचीदगियों और देरी के कारण पात्र अभ्यर्थी इस अवसर से वंचित रह रहे हैं, जिस पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। यह केवल एक मांग नहीं, बल्कि उन परिवारों के प्रति राज्य का कर्तव्य है जिन्होंने आंदोलन की आग में अपने भविष्य की चिंता किए बिना कूदना स्वीकार किया था।

एक और गंभीर समस्या जो इस ज्ञापन के जरिए उठाई गई, वह है राज्य आंदोलनकारियों के चिह्निनीकरण की प्रक्रिया। आंदोलनकारियों ने बताया कि सरकार द्वारा बार-बार घोषणाएं किए जाने के बावजूद आज भी कई जनपदों में चिह्निनीकरण के आवेदन धूल फांक रहे हैं। कई ऐसे वास्तविक आंदोलनकारी हैं जिन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई, लेकिन किन्हीं कारणों से वे अब तक सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। उनके द्वारा दिए गए आवेदन लंबित पड़े हैं, जो प्रशासनिक उदासीनता का जीता-जागता प्रमाण है। प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी से मांग की कि इन लंबित आवेदनों पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करवाई जाए ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति अपने सम्मान और अधिकार से वंचित न रहे। प्रभात ध्यानी और अन्य साथियों ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार इन मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती, तो आंदोलनकारी फिर से अपनी आवाज बुलंद करने को मजबूर होंगे। जिलाधिकारी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि उनकी भावनाओं और मांगों को यथाशीघ्र मुख्यमंत्री तक पहुँचाया जाएगा, जिसके बाद आंदोलनकारी वहां से विदा हुए।

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